द लास्ट सपर... बार-बार क्यों विवादों में घिर जाती है ईसा मसीह की 500 साल पुरानी रहस्यमय पेंटिंग

कोच्चि के मुजिरिस बिएनाले में प्रदर्शित लियोनार्डो दा विंची की प्रसिद्ध पेंटिंग 'द लास्ट सपर' के एक विवादित वर्जन को लेकर ईसाई समुदाय ने आपत्ति जताई है. यह पेंटिंग टॉम वट्टाकुझी द्वारा बनाई गई है, जिसने धार्मिक भावनाओं को छेड़ा है.

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इटालवी विचारक और पेंटर लियोनार्ड दा विंची की रहस्यमय पेंटिंग 'द लास्ट सपर' आज भी बड़ी बहस का विषय बन जाती है इटालवी विचारक और पेंटर लियोनार्ड दा विंची की रहस्यमय पेंटिंग 'द लास्ट सपर' आज भी बड़ी बहस का विषय बन जाती है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 03 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 7:11 AM IST

कोच्चि (केरल) के मुजिरिस बिएनाले में एक प्रदर्शनी के दौरान प्रख्यात चित्रकार लियोनार्डो दा विंची की प्रसिद्ध कृति 'द लास्ट सपर' के एक अलग ही वर्जन को प्रदर्शित किया गया. ये आर्टवर्क केरल के कलाकार, टॉम वट्टाकुझी का बनाया हुआ था, जिसे लेकर विवाद हो गया. ईसाई समुदाय ने इसे लेकर सवाल उठाए और आपत्ति जताई.

केरल में सामने आया था विवाद
एक दिन पहले सामने आया ये विवाद बताता है कि, इटैलियन विचारक और मशहूर पेंटर लियोनार्डो दा विंची की कृति 'द लास्ट सपर' आज लगभग 500 साल बाद भी इतनी मशहूर क्यों है? और अपने आर्टवर्क की खूबसूरती के बजाय रहस्यों और व्याख्याओं की ओर क्यों ध्यान खींचती है.

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हो न हो कि यह विंची की अन्य कृतियों की तरह ही सामान्य पेंटिंग भर ही रही हो, लेकिन विंची की एक और मशहूर कृति 'मोनालिसा' भी कहां ही सामान्य है. उस पेंटिंग को लेकर भी इतनी कहानियां, इतने रहस्य हैं कि 'मोनालिसा' आज भी रिसर्च मैटिरियल बनी हुई है. खैर, द लास्ट सपर पर लौटते हैं.

कोच्चि में 'द लास्ट सपर' 

ये बात तो माननी होगी कि 'द लास्ट सपर' समय, समुद्र और संस्कृति की सीमाओं को लांघकर दुनिया भर में प्रभावी बनी हुई है. यह सिर्फ एक धार्मिक चित्र नहीं है और इसे बनाने में सिर्फ रंग नहीं लगे हैं, बल्कि इस पेंटिंग को इंसानी मन, भावनाओं, विश्वास और विश्वासघात की बेहद पैनी कूची से पेंट किया गया है.

लियोनार्डो दा विंची की बनाई ये पेंटिंग ईसा मसीह के जीवन की उस ऐतिहासिक और भावनात्मक घड़ी को सामने ले आती है, जब वह अपने बारह शिष्यों के साथ अंतिम भोजन कर रहे थे. यही वह पल है जब मसीह भविष्य की बात बताते हैं कि उनमें से कोई एक धोखा देगा.

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क्यों खास है पेंटिंग?

‘द लास्ट सपर’ आकार में भी उतनी ही भव्य है जितनी इसकी वैचारिक मान्यताएं. ये पेंटिंग लगभग 4.60 मीटर ऊंची और 8.80 मीटर चौड़ी है. इसे पारंपरिक फ़्रेस्को तकनीक से नहीं, बल्कि 'जिप्सम की सूखी सतह पर टेम्परा और ऑयल पेंट' के प्रयोग से बनाया गया. यही कारण है कि आगे चलकर पेंटिंग को बचाए रखना लगातार चुनौती भरा होता गया.

ये पेंटिंग साल 1495 से 1498 के बीच इटली के मिलान शहर में मौजूद डोमिनिकन मठ 'सांता मारिया देल्ले ग्रात्सिये' के भोजनालय (Refectory) की दीवार पर बनाई गई थी. ईसा उस समय मठों और कॉन्वेंट्स में भोजन कक्ष की दीवारों पर ‘लास्ट सपर’ की पेंटिंग एक आध्यात्मिक प्रेरणा थी. अध्यात्मिक इसलिए, ताकि भोजन करते हुए जब यह पेंटिंग सामने हो, जिसमें मसीह के आखिरी भोजन का दृश्य हो तो वह भोजन की पवित्रता की याद दिला सके. ईसाई मंक और नन इस भोजन को परमात्मा की कृपा के तौर पर समझें.

पेंटिंग में इंसानी भावनाओं के कई रंग

लियोनार्डो का मानना था कि किसी भी व्यक्ति की मुद्रा, हाव-भाव और चेहरे की अभिव्यक्ति उसके मन की स्थिति को प्रकट करनी चाहिए. उन्होंने इसे “understandings of the mind” कहा. इसी फिलॉस्फी के आधार पर उन्होंने बारहों शिष्यों को अलग-अलग मानसिक अवस्थाओं में पेंट किया.

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इनमें कोई आश्चर्य से भरा है, कोई क्रोध में, कोई भयभीत, कोई संशय में और कोई आत्ममंथन करता हुआ. यह पेंटिंग केवल धार्मिक कथा नहीं है, बल्कि मानव भावनाओं का एक जीवंत नाटक भी है. नाटक जो मंच पर नहीं है, बल्कि उस दीवार पर है जो कैनवस बन चुकी है.

पेंटिंग में ईसा मसीह बीच में बैठे हैं और उनके दोनों ओर शिष्य समूहों में बंटे हैं. मसीह के अलावा ये 12 शिष्य 3-3 के समूहों में साथ दिखते हैं. यह व्यवस्था न केवल बैलेंस बनाती है, बल्कि देखने वाली की नजर को स्वाभाविक रूप से ईसा की ओर खींचती है.

ईसा का शरीर Equilateral Triangle का आकार बनाता है, जो स्थिरता और संतुलन का प्रतीक है. उनके पीछे बना हुआ मेहराब और खिड़की से आता प्रकाश Halo यानी प्रभामंडल की फीलिंग गढ़ता है, लेकिन दिलचस्प ये है कि विंची ने ईसा के चारों ओर कोई प्रभामंडल नहीं बनाया जैसा कि अक्सर ईसा की सामान्य तस्वीरों और पेंटिंग में दिखाई देता है.

ब्रेड और वाइन का क्या है संकेत?

लियोनार्डो ने इस चित्र में 'Linear Perspective' का अद्भुत प्रयोग किया है. सभी रेखाएं ईसा के दाहिने गाल पर जाकर मिलती हैं, जिससे वही चित्र का 'vanishing point' बन जाता है. इसके साथ ही ईसा के हाथों की स्थिति और मेज पर रखे ब्रेड और वाइन 'Golden Ratio' के अनुसार हैं. पुनर्जागरण काल में यह अनुपात सौंदर्य और दैवी पूर्णता का प्रतीक माना जाता था.

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कुछ आलोचकों का मानना है कि बेंच के सिरों पर बने सजावटी स्फिंक्स और संगमरमर की दीवारें चित्र की आध्यात्मिकता को विचलित करती हैं. लेकिन लियोनार्डो ने जानबूझकर अतिरिक्त सजावट को सीमित रखा, ताकि दृश्य का केंद्र भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव ही रहे. मेज को उन्होंने एक 'सीमा रेखा' की तरह प्रयोग किया है, जो दर्शक की भौतिक दुनिया और चित्र के आध्यात्मिक संसार के बीच अंतर पैदा करती है.

विश्वासघात की बात, जो ईसा मसीह ने खुद बताई

अब बात करते हैं उस विश्वासघात की, जो इस कहानी से खासतौर पर जुड़ा हुआ है. पेंटिंग में यहूदा को बाकी शिष्यों से थोड़ा पीछे और छाया में दिखाया गया है. वह ईसा के साथ ही ब्रेड की ओर हाथ बढ़ाता है. यह उसी भविष्यवाणी का संकेत है, जिसमें ईसा कहते हैं कि जो उनके साथ भोजन करेगा, वही उन्हें धोखा देगा. यहूदा के चेहरे पर अपराधबोध, भय और आश्चर्य का मिला-जुला भाव है.

मिलान के शासक 'लुडोविको स्फोर्ज़ा' के संरक्षण में यह पेंटिंग बनाई गई थी. लियोनार्डो ने इस पर बहुत धीमी गति से काम किया. फ्रेस्को तकनीक से अलग होने के कारण पेंटिंग अपने बनने के साथ ही समय की मार भी झेलने लगी और इस पर सीलन का असर दिखाई देने लगा. बीते पांच सौ वर्षों में पेंटिंग कई बार संरक्षित की गई है और आज इसमें मूल पेंटिंग का बहुत थोड़ा सा ही हिस्सा नजर आता है.

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‘द लास्ट सपर’ केवल ईसा मसीह के अंतिम भोजन की कहानी भर नहीं है. यह इंसानी स्वभाव, विश्वास, भय, करुणा और विश्वासघात की कहानी भी है. लियोनार्डो दा विंची ने इसमें कला, विज्ञान, गणित और दर्शन को इस तरह पिरोया है कि यह पेंटिंग आज भी अपने जिस स्वरूप में मौजूद है, उसमें भी एक रहस्य ही गढ़ती है.

यही कारण है कि पांच सौ वर्षों बाद भी ‘द लास्ट सपर’ न केवल देखी जाती है, बल्कि अनुभव की जाती है.

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