भारत में किसी भी त्योहार को बहुत बारीकी से समझें तो उनका सीधा जुड़ाव प्रकृति से मिलता है. प्रकृति ही हमारे सर्वाइवल की साथी है. इसलिए आग, नदी, पेड़, सूर्य-चंद्रमा ये सभी हमारे त्योहारों में शामिल रहते हैं. फिर चाहे छठ हो, दिवाली हो, लोहड़ी-बैसाखी हो या फिर अन्नकूट जैसे त्योहार हों सभी में अंतिम संदेश प्रकृति की पूजा, प्रकृति का सम्मान ही है.
मकर संक्रांति एक खगोलीय घटना यानी सूर्य के राशि परिवर्तन पर आधारित है और यह एक ऐसा त्योहार है जिसे भारत के 28 राज्यों में थोड़े बहुत ही अलग नामों से लेकिन लगभग एक जैसी परंपरा के साथ मनाया जाता है. थोड़ा बहुत अंतर अगर हो भी तो भी इस उत्सव के मूल में सूर्य की पूजा, नदी में स्नान और दान की जो मान्यता है वह लगभग एक जैसी है और उत्तर से दक्षिण को एक धागे में बांधती है.
हर संस्कृति में मकर संक्रांति
मकर संक्रांति हर संस्कृति में है और कश्मीर से कन्याकुमारी और बंगाल से गुजरात तक इसकी मान्यता है. यह पंजाब में लोहड़ी है, उत्तर प्रदेश में खिचड़ी है, बिहार में संक्रांत हैं. असम में माघ बिहू है तो तमिलनाडु में पोंगल है.
संक्रांति से एक दिन पहले हर साल 13 जनवरी को लोहड़ी मनाई जाती है. लोहड़ी सीधे तौर पर अग्नि से जुड़ा त्योहार है. जहां आग पुरानी बुरी यादों, बुरे विचारों और नकारात्मक ताकतों को जला देने की प्रतीक बन जाती है. इस आग में नई फसल के लावे भूने जाते हैं, जो नवीनता को अपनाने का प्रतीक है. लोहड़ी का अर्थ है, लौ (लकड़ी), ओह (उपले) और ड़ी यानी रेवड़ी. लौ जो सकारात्मकता लाती है, उपले जो बीते दिनों के गुजर जाने के प्रतीक हैं और रेवड़ी जो खुशियां लाती हैं. फसलों के घर आने से खुशियां आती हैं और इस खुशी में जुड़ जाती हैं लोककथाएं.
लोहड़ी और दुल्ला भट्टी की कहानी
लोहड़ी में दुल्ला भट्टी की कहानी गीत बनकर गूंजती है, दुल्ला भट्टी नाम के इस बांके नौजवान ने सत्ता की गलत ताकतों के खिलाफ आवाज उठाई. तब बादशाह अकबर के राज में पंजाब में लड़कियां बेची जा रही थीं. दुल्ला ने उन्हें बचाया और लोहड़ी के दिन उनकी शादी कराई. सामाजिक ताने-बाने में दुल्ला ने ऐसी जगह बनाई कि लोहड़ी की पारंपरिकता में वह हर बार के लिए शामिल हो गया. आज दुल्ला की बातें न हो तो लोहड़ी हो ही नहीं सकती.
हरियाणा, उत्तर प्रदेश समेत मध्य भारत में संक्रांति
ज्योतिष कहता है कि जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाता है और राशि परिवर्तन करते हुए मकर राशि में पहुंचता है तो इस सूर्य की मकर संक्रांति कहते हैं. मकर संक्रांति धरती के अंडाकार परिक्रमा पथ पर चलते हुए सूर्य के निकट पहुंचने का प्रतीक है. ग्रहों की चाल के आधार पर मध्य भारत मकर संक्रांति मनाता है. सूर्य का राशि परिवर्तन, एक राशि से दूसरी राशि में जाना साथ ही पृथ्वी का दिशा परिवर्तन ऐसी खगोलीय घटना है जो कि लोगों के रहन-सहन पर सीधे तौर पर असर डालती है.
मकर संक्रांति पर गंगा स्नान, तिल का दान और खिचड़ी
मकर संक्रांति पर गंगा स्नान और फिर दान आदि की परंपरा उसी जड़ता को हटा देने का जरिया है. चेतना की और लौटा व्यक्ति जब दोबारा समाज में पहुंचता है तो तिल-गुड़ के लड्डू इसे फिर से समाज में घुलना-जुड़ना सिखाते हैं. त्योहारों की मूल सिद्धांत भी यही है कि वह सामाजिकता को बचाए रखे.
राजस्थान में मकर संक्रांति का मतलब है पतंगों से भरा आसमान।. जयपुर और जोधपुर जैसे शहरों में यह दिन रंगों और प्रतिस्पर्धा से भर जाता है. हरियाणा में इसे संक्रांत कहा जाता है और जहां बहुओं द्वारा बुजुर्गों को उपहार देने की परंपरा है.
खिचड़ी का महत्व, क्यों खाते हैं खिचड़ी
मकर संक्रांति के इस मौके को खिचड़ी भी कहा जाता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में इस दिन खिचड़ी चढ़ाने, दान करने, बनाने और सहभोज करने का बहुत महत्व है. खिचड़ी भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण व्यंजन और प्रतीकात्मक भोजन है, जिसका महत्व धार्मिक, सांस्कृतिक और पोषण के दृष्टिकोण से है. खिचड़ी विभिन्न सामग्रियों से तैयार की जाती है, जिनमें चावल, दाल, सब्जियां और मसाले शामिल होते हैं. इसे सादगी और संतुलित आहार का प्रतीक माना जाता है. सनातन में इसे साधु भोज, देव अन्न और ऋषिभुक्तम (ऋषियों के भोग लगाने हेतु) कहा गया है.
तमिलनाडु में पोंगल
फसलें कटकर घर आ चुकी हैं और उत्साह का माहौल है. फिर जब सूर्य देव आकाश में नजर आते हैं तो तमिल समाज इसे एक नए वर्ष के तौर पर लेता है और पोंगल मनाता है. दरवाजों पर रंग-रोगन आंगन में खूबसूरत पूक्कलम (रंगोली) सजाए गए हैं. गाय-बैलों को नहला-धुला कर सजाया गया है. इस बीच घर की बड़ी-बूढ़ी अलग-अलग मटकों धान को दूध में भिगोकर शक्कर के साथ उबाल रही हैं.
वह इसे इतना उबालेंगी कि जब तक यह उफन कर किनारों पर न आ जाए. इसी के साथ उनकी स्थानीय भाषा में एक गीत भी हिलोरे लेता रहेगा. इसका मतलब है कि जैसे सागर का पानी उफन कर तट पर आया है, जैसे मेरी मटकी में उफान आया है, बस मेरे घर के बच्चों में खुशी भी ऐसी उफान पर आए. समृद्धि और साथ-साथ मिलकर हंसने-गाने का यह त्योहार पोंगल है.
पोंगल आमतौर पर जनवरी के महीने में मकर संक्रांति के समय चार दिनों तक मनाया जाता है. भोगी पोंगल जो सफाई और पुराने सामान और पुराने विचारों को छोड़ने का दिन है. लोग अपने घरों की सफाई करते हैं और पुराने सामान को जलाकर नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक मानते हैं. दूसरा दिन, थाई पोंगल है जो इसका मुख्य दिन है.
लोग सूर्य देव की पूजा करते हैं और धन्यवाद देते हैं. इस दिन पोंगल नामक विशेष मिठाई पकाई जाती है, जो चावल, दूध और गुड़ से बनाई जाती है. इसे मिट्टी के बर्तन में पकाकर सूर्य देव को अर्पित किया जाता है. घरों के आंगन में सुंदर रंगोली (कोलम) बनाई जाती है.
मट्टू पोंगल का दिन मवेशियों (गाय और बैल) को समर्पित होता है. मवेशियों को सजाया जाता है, उनके सींग रंगे जाते हैं और उन्हें फूलों की मालाएं पहनाई जाती हैं. मवेशियों की पूजा की जाती है क्योंकि वे कृषि कार्यों में मदद करते हैं. फिर आता है कन्नम पोंगल, सूर्य पूजा के साथ कन्याओं को उपहार दिए जाते हैं. यह दिन परिवार और समाज के साथ बिताने के लिए होता है. लोग रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने जाते हैं.
आंध्र प्रदेश, केरल और तेलंगाना
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में संक्रांति तीन दिन मनाई जाती है. भोगी, संक्रांति और कनुमा. गो-पूजा, हरिदासु की टोलियां और रंगोली (मुग्गुलु) इसकी पहचान हैं. वहीं, कर्नाटक में यह पर्व सुग्गी कहलाता है. यहां एलु-बेला (तिल, गुड़) नारियल और मूंगफली का मिश्रण, आपसी सौहार्द का प्रतीक है. केरल में मकर संक्रांति का केंद्र सबरीमला मंदिर है, जहां मकरविलक्कु और मकर ज्योति के दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं.
उत्तराखंड में उत्तरायणी
उत्तराखंड में मकर संक्रांति के दिन उत्तरायणी मनाया जाता है. यह पर्व खासतौर पर गढ़वाली और कुमाऊं दोनों ही क्षेत्रों में मनाया जाता है. यहां भी तिल-गुड़ का महत्व है और लोग एक-दूसरे को यह बांटते हैं, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण एक पकवान है घुघुतिया. ये पकवान मकर संक्रांति की एक लोककथा से जुड़ा हुआ है. यहां छोटे बच्चों को गुड़-आटे-दूध मिलाकर और तलकर बनाई गई घुघुतिया नाम की मिठाई दी जाती है और इसकी माला पिरोकर छोटे बच्चों को पहना दी जाती है.
लोककथा में है कि इसी घुघुतिया ने एक बार राजा के बच्चे की न सिर्फ जान बचाई थी बल्कि उत्तराधिकार के बहुत बड़े मसले का हल भी किया था. उत्तरैणी के दिन यहां लोग आटे-गुड़ मिलाकर उसकी माला बनाते हैं और कौवों को खिलाते हैं.
पश्चिम भारत: पतंग, तिल-गुड़ और सामाजिक सौहार्द
गुजरात में मकर संक्रांति का नाम ही बदल जाता है और यहां यह उत्तरायण कहलाता है. अहमदाबाद से सूरत तक पतंगों का उत्सव अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है. आसमान एक तरीके से सामाजिक एकता का कैनवास बन जाता है. महाराष्ट्र में मकर संक्रांत के लिए कहा जाता है, 'तिळगुळ घ्या, गोड गोड बोला. 'यानी तिल-गुड़ खाओ और मीठा-मीठा बोलो.' यह केवल मिठास का नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द का संदेश है. महिलाएं हल्दी-कुमकुम के कार्यक्रम आयोजित करती हैं. उधर, गोवा में यह पर्व नदी-स्नान और ग्रामीण मेलों से जुड़ा है. यहां भी तिल-गुड़ और पारंपरिक भोजन का महत्व है.
बिहार में दही-चूड़ा
सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है तो बिहार और झारखंड में दही-चूड़ा के भोज का आयोजन किया जाता है. इस वक्त नया धान आया होता है और इससे ही बनता है नर्म-मुलायम चिवड़ा. दही-चूड़ा (चिवड़ा) ऐसा भोजन है जो प्राचीन फास्ट फूड है और नूडल्स से भी तेज बनता है. इसकी शुरुआत कैसे हुई इस पर कोई पौराणिक दावा नहीं किया जा सकता है, लेकिन दंतकथाओं में दर्ज है समुद्र मंथन के समय जब देवता भूख से व्याकुल हुए तब ऋषियों ने तुरंत ही भोजन का प्रबंध करने के लिए दही-चूड़ा का भोजन कराया.
शास्त्रों में दही को भी शुभ माना गया है और धान को समृद्धि का प्रतीक. दही-चूड़ा जब मिलकर एक हो जाते हैं तो शुभता और समृद्धि दोनों का प्रभाव पड़ता है. दही हमारे नकारात्मक प्रभाव को हटाता है और चूड़ा या चिवड़ा ऊर्जा देता है.
झारखंड में 'तुसु परब'
झारखंड में मकर संक्रांति का लोक रूप 'तुसु परब' के रूप में सामने आता है. तुसु गीतों के साथ युवतियां लोक परंपराओं को जीवित रखती हैं. नदी-स्नान और मेले इसका अहम हिस्सा हैं. वहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह पर्व कृषि से जुड़ा है. छत्तीसगढ़ में इसे पूस परब कहा जाता है, जहां नई फसल के स्वागत में लोकनृत्य और सामूहिक भोज होते हैं.
गंगा से ब्रह्मपुत्र तक कैसी है संक्रांति
पश्चिम बंगाल में मकर संक्रांति को पौष संक्रांति कहा जाता है. यहां गंगासागर मेला इस पर्व का केंद्र बन जाता है जहां देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं. घरों में पिठे-पुली जैसे पारंपरिक व्यंजन बनते हैं.
ओडिशा में यह पर्व मकर चौला के लिए जाना जाता है. सूर्य को अर्पित किए जाने वाले विशेष भोग में कृषि संस्कृति की झलक मिलती है. असम में मकर संक्रांति भोगाली बिहू या माघ बिहू के रूप में मनाई जाती है. यह फसल कटाई के बाद का उत्सव है, जिसमें सामूहिक भोज और मेजी जलाने की परंपरा है. सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और मेघालय जैसे राज्यों में यह पर्व स्थानीय जनजातीय परंपराओं में ढलकर सामने आता है. जहां सूर्य और प्रकृति की आराधना इसका मूल भाव है.
असम में माघ बिहू
असम में माघ बिहू को भोगाली बिहू और माघर दोमाही के नाम से भी जाना जाता है. माघ बिहू से पहले के दिन को उरुका होता है, जो अग्नि देव को समर्पित माना जाता है. इस मौके पर लोक व्यंजन जैसे आलू पितिका, जाक और मसोर टेंगा बनाया जाता है और सब मिलकर भोज करते हैं. इसी के साथ पहली फसल अपने आराध्य देव को अर्पित की जाती है और यह कामना की जाती है कि आने वाले समय में भी अच्छी फसल पैदा हो.
संक्रांति के कहां पर क्या है नाम
1. उत्तर प्रदेश – खिचड़ी पर्व
2. बिहार – तिल संक्रांति / खिचड़ी / दही चूड़ा
3. झारखंड – तुसु परब
4. मध्य प्रदेश – मकर संक्रांति
5. छत्तीसगढ़ – पुस परब
6. राजस्थान – मकर संक्रांति
7. हरियाणा – संक्रांत
8. पंजाब – लोहड़ी (एक दिन पहले)
9. हिमाचल प्रदेश – माघी
10. उत्तराखंड – घुघुतिया- उत्तरैणी
11. गुजरात – उत्तरायण
12. महाराष्ट्र – मकर संक्रांत
13. गोवा – संक्रांत
14. पश्चिम बंगाल – पौष संक्रांति
15. ओडिशा – मकर चौला संक्रांति
16. असम – भोगाली बिहू / माघ बिहू
17. सिक्किम – माघे संक्रांति
18. अरुणाचल प्रदेश – माघे संक्रांति
19. नागालैंड – सेक्रेनी (मकर संक्रांति जैसा, पर अलग)
20. मणिपुर – याओसांग के आसपास (संक्रांति पर सूर्य पूजा)
21. मेघालय – माघीर
22. मिजोरम – संक्रांति
23. त्रिपुरा – पौष संक्रांति
24. आंध्र प्रदेश – भोगी संक्रांति
25. तेलंगाना – कनुमा संक्रांति
26. तमिलनाडु – पोंगल
27. कर्नाटक – सुग्गी / मकर संक्रांति
28. केरल – मकरविलक्कु / मकर ज्योति
एक जैसी हैं त्योहारों की परंपराएं
त्योगहारों की यह परंपराएं एक जैसी हैं. यह उस बात को साबित करती है कि सभ्यताओं के अलग-अलग खांचे में बसे हम अलग नहीं हैं, बल्कि रंगोली के रंग हैं. जो अपने ही खांचे में है तो रंगोली सुंदर है. अलग-अलग उन रंगों का कोई मोल नहीं. हमारे त्योहार हमारी मानवीय इच्छाओं का प्रदर्शन होते हैं और मानवता की इच्छा यही है कि वह तिलगुड़ की तरह एक-जुट हो. उसमें सूरज के किरणों जैसी गर्मजोशी हो और हम एकजुट रहें.
विकास पोरवाल