किन्नौर घाटी की सांगला होली... जहां गुलाल के साथ बिखरती है दशहरा-दिवाली की रंगत

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले की सांगला घाटी में मनाई जाने वाली होली, जिसे फागली या फागुली भी कहा जाता है, 800 साल पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं और लोकगीतों का अनूठा संगम है.

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सांगला की होली चार दिन तक चलने वाला खास उत्सव होता है.  सांगला की होली चार दिन तक चलने वाला खास उत्सव होता है.

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 02 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 1:37 PM IST

उत्तर भारत के मैदानी इलाकों से ऊपर की ओर चढ़िए. हिमालयी ऊंचाई तय करने में आप पाते हैं कि बदलते जा रहे हैं खान-पान, पहनावा, बोली-भाषा, पूजा का तरीका और बदल रहे हैं त्योहारों के तरीके भी. हालांकि इन बदले हुए त्योहारी तरीकों के भीतर खुश्बू वही रहती है, जो इन परंपराओं की शुरुआत मानी जाती है, बस उसमें जरा सा लोकल टच आ जाता है. 

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ये लोकल टज रायते में छौंक की तरह काम करता है, जिसकी एक घूंट मुंह में जाते ही वो चटकारे वाला अहसास होता है कि इसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता, लेकिन अहा और वाह के अनुभवों में बयां किया जा सकता है. हिमाचल के सांगला में आजकल ऐसा ही माहौल है. 

हिमालय की ऊंचाइयों में रंगों की बौछ
किन्नौर घाटी की खूबसूरत वादियों में धूम मची है, रंग है-गुलाल है. लोकगीत हैं और है घाटी की मस्ती जो ठंडी बयार में झूम-झूमकर सांगला होली देखने के लिए पुकार रही है. जिस तरह उत्तर भारतीय इलाके में लोग ब्रजमंडल और बरसाना की होली देखने दूर-दूर से पहुंचते हैं वैसे ही हिमाचल की सांगला होली भी पर्यटकों के लिए आस्था के साथ उमंग और रोमांच का त्योहार बन जाती है. 

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में है सांगला या बस्पा घाटी, लाहौल-स्पीति और शिमला जिले की सीमाओं से सटी हुई, समुद्र तल से लगभग 8,900 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के लिए जानी जाती है. यहां की होली सामान्य शहरी रंगोत्सव से बिल्कुल अलग है. यहां रंगों के साथ बर्फ में खेलना, रामायण के पात्रों का मंचन और आठ सौ वर्षों से चली आ रही जनजातीय परंपराएं इस उत्सव को खास बनाती है.

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फागली: 800 साल पुरानी जनजातीय परंपरा
इस होली को करीब से महसूस करने वाले प्रोफेशनल फोटोग्राफर कौशल आर्या बताते हैं कि, सांगला घाटी का नाम है और असल में इसे यहां ‘फागली’ या ‘फागुली’ कहा जाता है. वह कहते हैं कि इसकी हिस्ट्री में अगर जाएं तो इस फोक कल्चर की जड़ें 800 साल पहले तक ले जाती हैं, जहां ये सिर्फ होली नहीं बल्कि अपनी पौराणिक कहानियों की घटनाओं का रिक्रिएशन है. इससे ये फेस्टिव हिमालयन एरिया के सबसे पुराने त्योहारों में से एक बन जाता है. इस फेस्टिवल में किन्नौरी कल्चर में रचे-बसे हिंदू और बौद्ध प्रभावों का सुंदर मेलजोल नजर आता है और यही इसे यूनिक भी बनाता है. लोग यही देखने तो दूर-दूर से आते हैं.

यह फेस्ट असल में शीत की विदाई और वसंत-गर्मी के आनंद के आने का सिंबल है. यह नई फसलों की शुरुआत, फलों से लदे पेड़ों के खुशी और किन्नू से लदे-फंदे पेड़ की नारंगी छटा इस फेस्टिवल को और भी रंगीन बना देती है. लोग इसके लिए प्रकृति को धन्यवाद देते हैं और नाचते-गाते हुए उनके प्रति आभार जताते हैं. स्थानीय लोग अपने ग्राम देवताओं को याद करते हैं और उनसे घाटी की रक्षा और समृद्धि की कामना करते हैं. 

‘मास्क फेस्टिवल’ की पहचान
सांगला की होली को ‘फेस्टिवल ऑफ मास्क्स’ भी कहा जाता है. यहां ग्रामीण लोग मुखौटे पहनकर पौराणिक और लोक कथाओं के किरदारों का अभिनय करते हैं. पुरुष खास तौर पर रामायण के पात्रों, भगवान राम, लक्ष्मण, हनुमान और रावण की भूमिकाएं निभाते हैं. इन नाट्य प्रस्तुतियों के जरिये धर्म की अधर्म पर विजय का संदेश दिया जाता है.

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फागली का ये उत्सव मुख्य रूप से 3 से 4 दिनों तक चलता है. इसमें स्थानीय लोग पारंपरिक किन्नौरी नाटी नृत्य करते हैं. जिसमें एक खास तरह की चपटी और छोटी ढोल बजाई जाती है. इसके साथ ही किरदारों में सजे कलाकार गुलाल भी उड़ाते हैं. इस दौरान लोकल डिश सिद्दूछांग खाया जाता है औरस्थानीय देवी-देवताओं की पूजा होती है. 

पहले और दूसरे दिन त्योहार की शुरुआत पारंपरिक किन्नौरी वाद्य यंत्रों (ढोल,करनाल,शहनाई) के साथ होती है. लोग पकवानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं. तीसरे दिन सांगला चौक पर मुख्य रंगारंग उत्सव मनाया जाता है. लोग जो पारंपरिक पोशाक पहनते हैं (पुरुष ऊनी टोपी और जैकेट, महिलाएं शॉल और पारंपरिक गहने) गुलाल लगाते हैं और संगीत के साथ जश्न मनाते हैं. इस दिन पारंपरिक फागली नृत्य भी होता है. ये गोल घेरे में और समूह में किया जाता है.

मास्क पहनकर पौराणिक कहानियों का अभिनय सांगला होली की जान है. तस्वीर में रामकथा का मंचन करते कलाकार.

फिर चौथा दिन रामायण अभिनय के साथ अंतिम दिन बनता है. स्थानीय कलाकार रामायण के दृश्यों विशेष रूप से राक्षस राजा रावण पर भगवान राम की जीत का मंचन करते हैं. इस उत्सव की तस्वीर शेयर करते हुए कौशल आर्य बताते हैं कि इस दिन सामुदायिक भोज का आयोजन होता है और आने वाली फसल के लिए एक-दूसरे को शुभकामनाएं और बधाई दी जाती है.

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सांगला की होली प्रकृति और मनुष्य के बीच संतुलन और सम्मान का संदेश देती है. बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच रंगों की बौछार इस सामंजस्य को जीवंत करती है. गांवों के घरों और विशेष रूप से नाग मंदिर परिसर को दीपों और रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया जाता है. यह परंपरा दीपावली की झलक भी प्रस्तुत करती है, जो अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है.

ग्रामीण प्रसिद्ध बेरीनाग मंदिर में इकट्ठा होते हैं. उत्सव के दौरान ‘सिड्डू’, जौ और कुट्टू से बने व्यंजन, मांसाहारी पकवान और स्थानीय पेय ‘चांग’ परोसे जाते हैं. ‘टोटू’ नामक प्रसाद, जो मट्ठे और भुने जौ के आटे से तैयार होता है, सभी को बांटा जाता है.

प्रकृति, आस्था और सामूहिक उत्सव का संगम
सांगला की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है. यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है. इसमें होलिका दहन की परंपरा भी निभाई जाती है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है. रामायण के प्रसंगों का मंचन विशेष आकर्षण होता है, जिसमें भगवान राम की रावण पर विजय को दर्शाया जाता है. लोक संगीत, नाटी नृत्य और सामूहिक उत्सव इस पर्व को जीवंत लोककथा में बदल देते हैं.

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