हिंदी पंचांग का बारहवां महीना है फाल्गुन. लोक में वह फागुन है. नाम से लगता है जैसे साल का आखिरी पन्ना पलट रहा हो, लेकिन मिजाज ऐसा कि जैसे जीवन का पहला गीत शुरू हो रहा हो. फिर आप सोचते हैं कि क्या अंत ऐसा भी होता है? जिसमें दुख नहीं, शोक नहीं, बल्कि उल्लास हो. जिसमें सन्नाटा नहीं, अकेलापन नहीं बल्कि हुजूम और हुड़दंग हो. ढोलक की थाप हो. ये कैसा अंत है?
जब तब इस सवाल से मन जूझता है, डोलता है तब सरसों के खेत से उठी बयार आकर मन पर ठंडक डाल जाती है. भारतीय चिंतन कहता है – 'अंतः अस्ति प्रारंभः'. यानी हर अंत के भीतर एक शुरुआत छिपी होती है. होली इसी छिपी हुई शुरुआत का उत्सव है.
आप होली के मौसम में आस-पास निगाहें डालिए. आप रंग में डूबें इससे पहले ही प्रकृति आपको रंगने की पूरी प्लानिंग कर चुकी होती है. सरसों के पीले फूल, आग की तरह दहकते टेसू और पलाश, बौर से लदे हुए आम, टपकते महुआ. इन सबको देखकर महसूस करते ही मन में एक उमंग सी छाने लगती है. लोग समझ जाते हैं कि बसंत राजा दस्तक दे चुके हैं.
फागुन का पहला साथी है फाग
चौराहे पर सम्मत रखी जाती और उसी दिन से रंग हवा में घुलने लगता. फागुन का पहला साथी है, फाग. यह सिर्फ गीत नहीं, दिलों की धड़कन भी है. माघ की पंचमी के बाद से ही टोली बनने लगती है, ढोलक-ढपली बजने लगती है और इन्हीं की थाप पर फाग के सुर गूंज उठते हैं. फाग की खूबी यही है कि वह नियम से ज्यादा रस पर चलता है. सुर थोड़ा डोल जाए तो भी चलेगा, लेकिन ताल नहीं टूटनी चाहिए. वैसे ही जैसे जीवन में लय बची रहे तो असंतुलन भी सुंदर लगने लगता है.
भोजपुरी के बड़े लोककवि महेंदर मिसिर (महेंद्र मिश्र) ने फाग को सिर्फ गाया नहीं बल्कि जिया है. उनके गीतों को शारदा सिन्हा की आवाज मिली तो ये गीत अमर हो गए. उनके फाग में राम हैं, कृष्ण हैं, राधा हैं, शिव-पार्वती हैं लेकिन वे देवता बनकर नहीं हमारे जैसे रंग में भीगते मनुष्य बने नजर आते हैं.
अब महेंदर की यही रचना देखिए, कितनी कमाल है. कितनी मुंहलगी के साथ वे शिव को बूढ़ूा, अजीब दुलहा और करामाती कह रहे हैं.
ई त बूढ़वा दुलहवा बड़ा मजेदार।
अटपट बोले मगर बाटे होसियार।।
पूरी कचवरी अउर हलुआ खिलाइबों,
चीनी के नीमकी अउर आम के अचार।
ई त बूढ़वा दुलहवा बड़ा मजेदार।
डिमिक-डिमिक ई त डमरू बजावेलन,
सोहली गंगाजी उनका जटवा के हार।
ई त बूढ़वा दुलहवा बड़ा मजेदार।
असल में फागुन लोक लाज को थोड़ी देर के लिए ढीला कर देता है. उम्र की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं. बूढ़ा, बच्चा, जवान सब एक रंग में दिखते हैं. यही होली का पहला संदेश है कि सारी बाहरी पहचानों को रंग में बहा दो और मन को खुलने दो. आज त्योहार एक दिन में सिमट गए हैं, लेकिन असली होली धीरे-धीरे चढ़ती है. पहले मन पर, फिर समाज पर और जब फाग गूंजता है, तब लगता है, यह अंत नहीं, जीवन का ही कोई नया पन्ना खुल रहा है.
फाग के बाद होली का दूसरा रंग है. जोगीरा. जैसे ही कोई आवाज लगाता है 'जोगीरा सा रा रा रा', माहौल बदल जाता है. यह सिर्फ टेक नहीं, सामूहिक उन्मुक्ति का उद्घोष है. जोगीरा की जड़ें नाथ परंपरा में मानी जाती हैं. योगियों के प्रश्नोत्तर भजन लोक में आए और मस्ती का रूप ले बैठे. पहले चेतावनी थी, फिर तंज बना, फिर फागुन की खुली हंसी में घुल गया.
पूर्वांचल की लोक परंपरा पर काम करने वाली लेखिका आकृति विज्ञा अर्पण बताती हैं कि गांवों में शाम को मंदिरों पर टोली जुटती थी. ढोलक, झांझ और करताल के साथ रात भर फाग, जोगीरा, धमार गाए जाते थे. धीरे-धीरे पूरा गांव उस महफिल का हिस्सा बन जाता. जोगीरा का असली कमाल है उसका लोकतंत्र. यहां राजा पर भी तंज है, व्यवस्था पर भी चोट है और समाज की बुराइयों पर खुलकर हंसने की छूट भी है.
एक बानगी देखिए...
केकर खातिर पान बनल बा, केकरे खातिर बांस
केकरे खातिर पूड़ी पूआ, केकर सत्यानास
जोगीरा सा रा रा रा………………….
नेतवन खातिर पान बनल बा, पब्लिक खातिर बांस
अफसर काटें पूड़ी पूआ, सिस्टम सत्यानास
जोगीरा सा रा रा रा………………….
पहले खूब खुलकर लानत-मलानत कर ली जाती है, फिर हंसकर जोड़ दिया जाता है 'बुरा न मानो होली है.' यह बात असल सामाजिक तनाव को घटा-मिटा देने का तरीका है. जोगीरा में भी आध्यात्म और समाज साथ-साथ चलते हैं. यहां सवाल भी हैं और जवाब भी. व्यंग्य भी है, विनम्रता भी. होली का यह रंग हमें सिखाता है कि समाज में बातचीत, संवाद कितना जरूरी है. अगर शिकायत है तो उसे गीत बना दो. अगर गुस्सा है तो उसे ठिठोली में बदल दो. यही लोक की बुद्धिमानी है, वह विस्फोट नहीं करता, बल्कि पानी में रंग मिलाकर सबकुछ तरल कर देता है. सब बहा ले जाता है.
फिर आता है होली का तीसरा रंग, असली रंग जो त्वचा पर नहीं आत्मा और चेतना पर चढ़ता है. पहले रंग टेसू, पलाश और गुड़हल से बनते थे. फूल भिगोए जाते, उबाले जाते, पीसे जाते. रंग बनाना भी एक रस्म थी. बनारस की बैठकी होली ने इसे शास्त्रीय ऊंचाई दी. पंडित साजन मिश्र-राजन मिश्र और छन्नूलाल मिश्र जैसे गायकों ने फगुआ को मंच से घर-घर तक पहुंचाया.
कबीर, जो कहते हैं कि हर दिन होली
लेकिन होली की सबसे गहरी आवाज संत परंपरा से आती है. कबीर कहते हैं – धरती और आकाश के बीच हर दिन फाग मची है. हर दिन होली जल रही है. कबीर की होली में ज्ञान का गुलाल है, प्रेम का अबीर है और आत्मा-परमात्मा का मिलन है. वे कहते हैं, अगर उस होली में हरि नहीं तो वह सिर्फ धूल है.
होली हमें याद दिलाती है कि जीवन भी रंगों का खेल है. आना-जाना लगा है. एक दिन सब कुछ राख हो जाएगा. इसलिए जब तक समय है, मन के भीतर के रंग को पहचानो.
होली के दो-तीन दिन बाद देह का रंग उतर जाता है, लेकिन जो आनंद मन में उतर गया, वह पीढ़ियों तक रहता है. फाग, राग, रंग, मस्ती और मल्हार – ये पांचों मिलकर हमें बताते हैं कि जीवन कोई बोझ नहीं, एक उत्सव है और इसी समझ का नाम है, होली.
विकास पोरवाल