सिर साठे रुख रहे... खेजड़ी बचाने के लिए क्यों जान की बाजी लगा देता है बिश्नोई समाज

राजस्थान में खेजड़ी वृक्ष को बचाने के लिए बिश्नोई समाज और संत समाज ने सड़कों पर प्रदर्शन और आमरण अनशन शुरू कर दिया है। सौर ऊर्जा कंपनियों द्वारा सोलर पैनल लगाने के लिए खेजड़ी के पेड़ काटे जाने के विरोध में यह आंदोलन चल रहा है.

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खेजड़ी का पेड़ बिश्नोई समाज के लिए देवता के बराबर है खेजड़ी का पेड़ बिश्नोई समाज के लिए देवता के बराबर है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 06 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:38 PM IST

राजस्थान में 'खेजड़ी' वृक्ष को बचाने के लिए सड़कों पर भीड़ उतर आई है. आमरण अनशन हो रहे हैं और बड़े पैमाने पर सरकार की विकास योजनाओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहा है. असल में सौर ऊर्जा कंपनियां सोलर पैनल लगाने के लिए बड़े पैमाने पर जमीन ले रही थीं. पैनल लगाने के लिए उन जमीनों पर लगे 'खेजड़ी' के पेड़ों को काटा जा रहा था. बिश्नोई समाज के लोग और यहां तक की संत समाज भी एकजुट होकर इन योजनाओं के खिलाफ आ गया. 

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राजस्थान का कल्पवृक्ष है खेजड़ी
खेजड़ी, जिसे 'राजस्थान का कल्पवृक्ष' कहा जाता है. इसे यहां का राज्य वृक्ष होने का दर्जा भी मिला हुआ है. पश्चिमी राजस्थान की पहचान ये पेड़ सूखे-जलते रेगिस्तान में हरियाली की अकेली उम्मीद है. इसके अलावा बिश्नोई समाज के लिए ये पेड़ जीता-जागता रक्षक देवता है. यानी उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में जो मान्यताएं बरगद और पीपल को लेकर हैं, राजस्थान के बिश्नोई समाज के लिए खेजड़ी वैसा ही पूजनीय है. क्योंकि ये अकेला ऐसा पेड़ है जो रेगिस्तान की लाइफ लाइन है और मरुस्थल में भोजन-पानी दोनों की उम्मीद भी बचाए रखता है. 

खेजड़ी की लोककथा
खेजड़ी बिश्नोई समाज के लिए देवता क्यों है? इस सवाल का जवाब इस लोककथा में मिलता है. कहते हैं कि समंदर से उठे बादल जब सारी धरती पर बरसते, उन्हें हरा-भरा करते रेगिस्तान पहुंचे तबतक काफी देर हो चुकी थी. वहां दूर-दूर तक सिर्फ तपिश ही तपिश, लू ही लू थी. इस भयंकर सूखे में भी दूर कहीं खेजड़ी के एक पेड़ पर हरियाली थी. बादल को घमंड था कि वो जहां न बरसे वहां के लोग तरसें... लेकिन हरे-भरे खेजड़ी को देख उसके घमंड को चोट लगी. 

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उसने खेजड़ी से कहा, क्यों रे भाई! सब सूखे, तू क्यों न सूखा? खेजड़ी न कहा, मैं क्यों सूखूं? लोग मेरे पास आते हैं, बैठते हैं, छांव पाते हैं, सुस्ताते हैं, सांगरी पाते हैं तो मैं कैसे सूखती? बादल ने कहा- अच्छा, तो तू इन सबको बचा लेगी, ले फिर मैं नहीं बरसता. ऐसा कहकर बादल आगे बढ़ गया. खेजड़ी ने अपनी पत्तियां समेट लीं. तनों को फैला लिया और फूलों को सुखाकर बीजों में बदल दिया.

इस तरह पानी न जाने कितने दिन न बरसा, लेकिन खेजड़ी ने सबके प्राण बचाए और अकाल में भी किसी को भूखों न मरने दिया. कहते हैं कि पश्चिमी राजस्थान में खेजड़ी इतना उपयोगी है कि वे जड़ से लेकर फूल तक हर हिस्से को इस्तेमाल में लाते हैं. घाव, फोड़े, गर्मी के छाले में खेजड़ी की मोटी छाल घिस कर लेप लगा तो खेजड़ी मरहम भी बन जाती है. 

इसलिए खेजड़ी जल-जंगल-जमीन में देवताओं को देखने वाले बिश्नोई समाज के लिए भी जीता-जागता, सांस लेता और छांव देता देवता ही है. 

पौराणिक कथाओं में खेजड़ी
खेजड़ी इतना पुराना है कि इसका जिक्र पौराणिक कथाओं में भी मिलता है. पीपल, बरगद, केला, आम और अमलताश के बाद खेजड़ी ही ऐसा पेड़ है जो पौराणिक कथाओं में किरदारों की तरह शामिल होता है. उत्तर भारतीय खेजड़ी से रिलेट नहीं कर पाते हैं तो वह 'समी' या 'शमी' के बारे में सोचें. इसे कई जगहों पर छोंकर भी कहा जाता है. शमी और खेजड़ी एक ही जाति के पेड़ हैं. 

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महाभारत में लिखा मिलता है कि अज्ञातवास के समय में पांडवों ने अपने अस्त्र-शस्त्र इसी खेजड़ी यानी शमी में छिपाए थे. विराट युद्ध के बाद अर्जुन ने इसकी आड़ में छिपकर ही अपने वृहन्नला रूप से निजात पाई थी. खेजड़ी, रेगिस्तान में थके-मांदे राहगीर के लिए सुख की छांव भी है. अपने गले और कूबड़ में ढेर सारा पानी भर लेने के लिए मशहूर ऊंट भी जब दूर-दराज के सफर पर होते हैं तो रास्ते में खेजड़ी के पेड़ में ही उन्हें अपना भोजन नजर आता है.  

खेजड़ी... जिस पर भूत-प्रेत भी रहते हैं
खेजड़ी से रेतीले रेगिस्तानियों का इतना अपनापन है कि उनके तो भूत-प्रेत भी इसी पेड़ पर रहते हैं. याद है शाहरूख खान की फिल्म पहेली... जिसमें दुल्हन की पालकी खेजड़ी के नीचे सुस्ताने के लिए रखी जाती है और खेजड़ी के पेड़ पर बसा भूत इस दुल्हन के रूप में उलझ जाता है. ये फिल्म बिज्जी की फेमस कहानी 'दुनिया' पर बेस्ड थी. 

राजस्थान के कल्पना लोक में खेजड़ी ने ऐसा समां बांध रखा है कि इसे राजस्थान का कल्पतरु ही कह दिया गया है. इसके और भी नाम हैं, जिनमें कहीं इसे जोंटा, कहीं झाटी, कहीं बोझी तो कहीं सिमरू भी कहा जाता है. नाम भले कई हैं, लेकिन खेजड़ी एक और खेजड़ी से प्रेम भी एक जैसा. 

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खेजड़ी वृक्ष को बचाने के लिए राजस्थान में बड़ा आंदोलन किया गया

चूल्हे की आग से लेकर भोजन की थाली तक
खेजड़ी न जाने कितने बरसों से चूल्हों की आग बचाए हुए है. इसकी सख्त लकड़ी में वही राजस्थानी ठेठ बसता है. इसकी पत्तियां भेड़, बकरी और गधों और ऊंटों को बहुत पसंद हैं. वन्य पशु जैसे हिरण, नीलगाय, खरगोश भी खेजड़ी की फली और पत्तियों को खूब खाते हैं, खेजड़ी का एक पेड़ दस साल के बाद पत्ती के साथ फलियों और फलों को देने वाला बन जाता है और फिर तो दो-ढाई सौ बरस तक खूब फल देता है, यानी एक किसान की छह पीड़ी को तार देने की क्षमता इस खेजड़ी में है. इसलिए ही किसानों के लिए तो खेजड़ी अनमोल बन जाता है और वह पुराने खेजड़ी के पेड़ों को अपने बुजुर्गों जैसा मानते हैं. 

बिश्नोई समाज के लिए पूर्वज भी है खेजड़ी
ऐसे खेजड़ी को कोई काटने की बात करे तो ये क्यों न मरने-मारने वाली बात बन जाए. इसीलिए बिश्नोई समाज कहता है कि 'सिर साठे रुख रहे तो भी सस्ता जान' यानी एक पेड़ को बचाने के लिए अपनी जान भी देनी पड़े तो भी ये सौदा सस्ता है. बिश्नोई समाज आज अपनी इसी कहावत को सच करने के लिए सामने आया है. क्योंकि पर्यावरण बचाओ की बातें सिर्फ कागज पर करने से पर्यावरण नहीं बचता, इसे बचाने के लिए पेड़ों के पास उनके इर्द-गिर्द पहुंचना ही होता है.
 

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