एक बच्चे पर क्रूरता की पूरी कहानी... होलाष्टक के 8 दिन इसलिए माने जाते हैं अशुभ

होली से पहले के आठ दिन जिन्हें होलाष्टक कहा जाता है, अशुभ माने जाते हैं और इस दौरान कोई शुभकार्य नहीं किया जाता. यह परंपरा दैत्य हिरण्यकश्यप और उनके पुत्र प्रह्लाद की पौराणिक कथा से जुड़ी बताई जाती है.

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Holashtak (file photo) Holashtak (file photo)

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 23 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:09 PM IST

होली के त्योहार पर फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होलिका दहन किया जाता है. इसके ही अगले दिन चैत्र प्रतिपदा को होली खेली जाती है. लेकिन होली से पहले के आठ दिन बहुत अशुभ और अमंगली बताए जाते हैं. इस दौरान किसी भी तरह के शुभकार्य नहीं किए जाते हैं, बल्कि आग वगैरह जलाने का काम भी बड़े ध्यान से किया जाता है. क्योंकि इस वक्त आग हादसे का भी रूप ले सकती है. यह वजह है कि होली से पहले के आठ दिनों में यज्ञ, हवन, अनुष्ठान, मुंडन, गृहप्रवेश आदि नहीं कराया जाता है. 

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होलाष्टक की मान्यताएं
होली के पहले आठ दिन होलाष्टक की परंपरा क्यों है और इसके पीछे का क्या कारण है, इसे लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं. जो मान्यता सबसे अधिक चर्चित है वह दैत्य हिरण्यकश्यप की कहानी से निकलती है. यह कहानी स्कंद पुराण, श्रीमद्भागवत पुराण और नारद पुराण में कही गई है. हालांकि होलाष्टक की मान्यताएं पौराणिक न होकर लोक आधारित मान्यता पर अधिक हैं, जिनमें भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद को मिले कष्ट की कहानी उभर कर आती है. 

क्या था हिरण्यकश्यप को मिला वरदान
असल में प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप ने ब्रह्माजी से ऐसा वरदान पाया कि उसके कारण वह खुद को अमर समझने लगा. हिरण्यकश्यप ने ब्रह्मदेव से मांगा कि न उसे कोई मानव मार सके, और न ही कोई पशु, न रात और न ही दिन में उसकी मृत्यु हो, उसे कोई भी न घर के भीतर और न बाहर मार सके, इतना ही नहीं उसने ये भी मांगा कि न धरती पर और न ही आकाश में, न किसी अस्त्र से और किसी शस्त्र से उसकी मृत्यु हो. हिरण्यकश्यप वरदान पाने के बाद भयंकर घमंडी हो गया. वो किसी को कुछ नहीं समझता था. वो इस कदर अहंकार में डूब गया कि खुद को ही भगवान मानने लगा. 

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ऋषि आश्रम में हुआ प्रह्लाद का जन्म
एक तरफ जब हिरण्यकश्यप तीनों लोकों में हाहाकार मचा रहा था, तो उधर महल में उसकी रानी कयाधु गर्भवती थी. उन्होंने सही समय आने पर ऋषि आश्रम में भक्त बालक प्रह्लाद को जन्म दिया. अब जब प्रह्लाद का जन्म हुआ तो वह बचपन से ही विष्णुभक्त निकला. यह कथा, भागवत पुराण के सप्तम स्कन्ध में वर्णित है. हिरण्यकश्यप और उसके पुत्र प्रह्लाद की ये कहानी न केवल एक धार्मिक गाथा है, बल्कि इसमें निहित निःस्वार्थ भक्ति और बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश, आज के विचलित समाज को ईश्वर की मौजूदगी और उसके न्याय के प्रति अधिक विश्वास दिलाता है.

प्रह्लाद पर पिता हिरण्यकश्यप ने किए अत्याचार
जैसे-जैसे प्रह्लाद बड़ा होता गया, उसके जन्म के संस्कार और अधिक प्रबल होते चले गए. वह पूरी तरह विष्णुभक्त बन गया. दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र और श्रीहरि के परमभक्त प्रह्लाद पर भीषण अत्याचार किए थे. वह चाहता था कि प्रह्लाद अपने पिता यानी खुद हिरण्यकशिपु की पूजा करे. लेकिन प्रह्लाद विष्णुभक्त थे. उनके मुंह से आठो पहर श्रीहरि का नाम निकलता था. जिससे हिरण्यकशिपु नाराज हो गया. उसने अपने बेटे प्रह्लाद को हाथी के पैरों के नीचे कुचलवाने की कोशिश की, उसे जहर दिया, सर्पों से भरे तहखाने में बंद कर दिया, ऊँचाई से फिंकवा दिया, जंजीरों में बांधकर पानी में डुबा दिया. लेकिन प्रह्लाद हर बार बच गए.

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शोक का प्रतीक क्यों है होलाष्टक?
मान्यता है कि हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को लगातार आठ दिनों तक अलग-अलग तरह के भयंकर दंड दिए थे. आखिरी अत्याचार होलिका दहन का ही था, जिसमें हिरण्यकश्यप की बहन और प्रह्लाद की बुआ होलिका की जलकर मौत हो गई थी. इस तरह आठ दिनों तक लगातार अत्याचार होने के कारण ही होली के पहले आठ दिन होलाष्टक के नाम से जाने जाते हैं. इन आठ दिनों को शोक का प्रतीक माना जाता है, जो कि प्रह्लाद के ऊपर हो रहे अत्याचार का प्रतीक है. इसलिए आठ दिनों तक कोई मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं.

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