क्लास तक ही सिमटा नाटक 'हमारे राम', मास तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा?

'हमारे राम' नाटक केवल पारंपरिक रामायण नहीं बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण और सीखने योग्य पहलुओं को सरल भाषा में प्रस्तुत करता है. नाटक के टिकट सामान्यतः महंगे होते हैं, लेकिन पंजाब सरकार ने इसे पूरी तरह मुफ्त करने का फैसला किया है, जिससे यह आम जनता तक पहुंच सकेगा.

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पंजाब सरकार नाटक 'हमारे राम' के 40 मुफ्त शो आयोजित करने जा रही है पंजाब सरकार नाटक 'हमारे राम' के 40 मुफ्त शो आयोजित करने जा रही है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 27 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 4:33 PM IST

घुप्प अंधेरे के बीच कानों में मिश्री घोल रही रामनामी सुर लहरियों के बीच पर्दा जब झटके से खुलता है तो सामने सजा हुआ भव्य राम दरबार आंखों के रास्ते होते हुए दिल में उतर जाता है. सिंहासन पर बैठे श्रीराम जो दर्शक दीर्घा की ओर ही देखते नजर आते हैं, आस पास मंत्री और सलाहकार, हनुमानजी, तीनों भाई और बैकग्राउंड में बज रहा टाइटल गीत 'रामलीला' को हम गुनगुनाते चलें...' ये सब मिलकर ऐसा दृष्य रचते हैं कि एक ही पल में पूरा ऑडिटोरियम अयोध्या बन जाता है और थोड़ी देर पहले जो सिर्फ दर्शक थे वह सभी इस नाटक की अयोध्या की प्रजा बन जाते हैं. 

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नाटक 'हमारे राम' को हर ओर से मिल रही है सराहना
बीते दो-तीन वर्षों में नाटक 'हमारे राम' की प्रसिद्धि और लगातार हो रही माउथ पब्लिसिटी की वजह यही है कि पहले ही सीन से यह दर्शकों को अपने साथ उसी पौराणिक गाथा की यात्रा पर ले चलता है, जहां कदम-कदम पर श्रीराम ने अपने खुद के चरित्र से न सिर्फ मर्यादा को स्थापित किया, बल्कि उसे खुद जीकर भी दिखाया. बावजूद अपनी प्रसिद्धि के नाटक की पहुंच सीमित दर्शकों तक ही है, क्योंकि इसे मास (बड़ी संख्या में लोगों) का मंचन बनने से रोकने में कई फैक्टर शामिल हैं और महंगी टिकट इनमें से एक है. 

हालांकि इसी बीच पंजाब सरकार ने नाटक 'हमारे राम' को लेकर बड़ा ऐलान किया है. पंजाब की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार मशहूर नाटक ‘हमारे राम’ का मंचन कराने जा रही है. इस नाटक में बॉलीवुड अभिनेता अशुतोष राणा रावण की भूमिका में हैं और श्रीराम की भूमिका राहुल आर भुचर निभाते हैं.

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'पंजाब सरकार कराएगी मुफ्त शो'
यह नाटक रामायण की गाथा का पारंपरिक अभिनय भर नहीं है, बल्कि उस कथा में जिंदगी के लिए जो जरूरी और सीखने लायक बातें हैं, आसान शब्दों में उनका कलेक्शन है. बीते दिनों पंजाब कैबिनेट की बैठक में इस फैसले को मंजूरी दी गई. वित्त मंत्री हरपाल चीमा ने मीडिया को बताया कि राज्य के अलग-अलग शहरों में नाटक ‘हमारे राम’ के कुल 40 शो आयोजित किए जाएंगे. ये सभी शो दर्शकों के लिए पूरी तरह मुफ्त होंगे और इनके मंचन का पूरा खर्च राज्य सरकार उठाएगी.

आम तौर पर इस नाटक के टिकट की शुरुआती कीमत '799 रुपये' है. पंजाब सरकार में कैबिनेट के इस फैसले ने कल्चर, पॉलिसी और पॉलिटिक्स को एक साथ एक ही स्टेज पर ला खड़ा किया है. जब सवाल तीनों के बीच बैलेंस का हो यह सिर्फ नीयत का ही नहीं प्राथमिकताओं का भी प्रश्न बन जाता है.

पंजाब में कैबिनेट का यह फैसला केवल एक सांस्कृतिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि एक गहरी राजनीतिक और वैचारिक बहस को जन्म देता है, खासकर तब, जब केंद्र की सत्ताधारी पार्टी जिन-जिन राज्यों में है, वहां न तो ऐसे किसी कदम की पहल दिखती है और न ही यह इस नाटक की टिकटों की कीमतों में जरा भी कटौती करने की ओर कोई कदम उठाया गया है.

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नाटक में रामायण सीरियल के इतिहास को दोहराने की है ताकत
राजधानी दिल्ली तक में यह चर्चित नाटक टैक्स फ्री नहीं है. इसके कारण एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग इस अभूतपूर्व क्लासिक से अब तक अछूता है और जन-जन की भावनाओं को छूने वाला एक विषय सिर्फ एलीट तक सिमट कर रह गया है. जबकि यह नाटक उसी इतिहास को दोहराने का माद्दा रखता है, जैसा का रामानंद सागर ने रामायण सीरियल बनाकर उसे जन-जन तक पहुंचाया था. टीवी के लिए बना वह धारावाहिक उस दौर में भी सबसे अधिक देखा गया जिस दौर में बहुत बड़ी जनता के पास टीवी था ही नहीं. लोगों ने इसे एक ही टीवी पर समूह में देखा और इसे देखने के लिए वैसे ही आयोजन होने लगे जैसे कि आज कहीं रामकथा या भागवत के लिए पंडाल लगाए जाते हैं.

हालांकि अपनी बड़ी फैन फॉलोइंग और मॉस अपील के बावजूद यह नाटक बड़े दर्शक वर्ग तक नहीं पहुंच पा रहा है तो इसकी एक वजह इसका बहुत टेक्निकल होना भी है. यह नाटक सिर्फ भव्य मंच, शानदार कास्ट्यूम और आकर्षक डॉयलॉग डिलीवरी से नहीं बना है, बल्कि इसे बनाने में लाइट, साउंड, इफेक्ट और तमाम खर्चीले तकनीकि पहलू भी शामिल हैं. इनके बिना यह नाटक अधूरा है. शायद यही वजह है कि इसकी टिकटें महंगी हो जाती हैं.

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‘हमारे राम’ कोई साधारण नाटक नहीं है. यह रामायण की फिर से की गई एक व्याख्या है. इसमें राम केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों, करुणा, मर्यादा और आत्मसंघर्ष के प्रतीक के रूप में सामने आते हैं. वह सिर्फ विष्णु के अवतारी और पौराणिक दैवीय चरित्र नहीं हैं, बल्कि एक पुत्र, एक पिता, एक राजा, एक योद्धा और एक पति के रूप में उतने ही सामान्य दिखाई देते हैं, जितना की एक आदमी. लेकिन इसी आम जीवन में उनका संघर्ष और सत्य को थामे रहने की उनकी दृढ़ता उन्हें महानता के शीर्ष तक ले जाती है.

क्यों लोगों को पसंद आ रहा है नाटक?
आशुतोष राणा जैसे कलाकार की मौजूदगी इसे और भी गंभीर साथ ही प्रभावशाली बनाती है. यह नाटक न तो किसी राजनीतिक पार्टी का प्रचार है और न ही किसी एक संप्रदाय की कट्टर व्याख्या. इसके बावजूद, या शायद इसी वजह से, यह सांस्कृतिक चेतना को बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुंचाने का माध्यम बन जाता है.

भाजपा के लिए ये बातें इसलिए भी बड़ी हो जाती है, क्योंकि इस मामले में उम्मीदें भी उससे ही लगाई जाती हैं और उन उम्मीदों की वजह है कि पार्टी सनातन और संस्कृति के संरक्षक के तौर पर बड़ी लकीरें खींचती रही है. अयोध्या में राम मंदिर का बनवाना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. लेकिन जब बात जीवंत सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों जैसे थिएटर और कला की आती है, तो सरकारें इस मामले में कुछ उदासीन सी नजर आती हैं.

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‘हमारे राम’ जैसे नाटक कई राज्यों में न टैक्स फ्री हैं और न ही इन्हें सरकारी लाभ मिल रहा है. नतीजा यह है कि इसकी शुरुआती टिकट 799 रुपये से शुरू होती है, जो आम दर्शक के लिए महंगी है. यहां एक बुनियादी विरोधाभास सामने आता है, अगर राम सच में 'जन-जन के आराध्य' हैं, तो उनकी कथा तक पहुंच भी जन-जन की होनी चाहिए, न कि सिर्फ उन लोगों की जो महंगे टिकट खरीद सकें.

वैचारिक परिवर्तन का प्रयास
पंजाब में AAP सरकार का यह फैसला कई नजरिए से देखा जा सकता है. एक तरफ इसे संस्कृति को आम लोगों तक मुफ्त में पहुंचाने की पहल कहा जा सकता है. दूसरी तरफ, इसे एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति भी माना जा सकता है. पंजाब जैसे राज्य में, जहां धार्मिक विविधता और ऐतिहासिक जटिलताएं रही हैं, रामकथा के मंचन को मुफ्त करना एक साहसिक सांस्कृतिक प्रयोग भी है. यह AAP की उस राजनीति से मेल खाता है, जिसमें वह खुद को वैचारिक रूप से लचीला, गैर-परंपरागत और 'जन-सुलभ' दिखाना चाहती है.

AAP का पंजाब में लिया गया फैसला यह दिखाता है कि संस्कृति को सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि सहभागी बनाया जा सकता है. जब नाटक मुफ्त होगा, तो सिर्फ एलीट क्लास तक सिमटा नहीं रहेगा, उसे देखने वाले वो कॉमन, वो आम फहम लोग भी होंगे, जो अपने दिन की शुरुआत राम से करते हैं और आखिरी निवाले तक राम-राम रटते रहते हैं.  यही संस्कृति का असली लोकतंत्रीकरण है.

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आम लोगों तक नाटक पहुंचाने की कवायद
पंजाब का यह फैसला दूसरे राजनीतिक दलों के लिए एक असहज सवाल खड़ा करता है. क्या संस्कृति केवल चुनावी मुद्दा है, या उसे सच में जनजीवन का हिस्सा बनाने की भी जिम्मेदारी है? अगर अन्य राज्य भी ऐसे नाटकों को टैक्स फ्री करें, सरकारी सहयोग दें, तो उसका सांस्कृतिक दावा ज्यादा विश्वसनीय लगेगा. नहीं तो यह धारणा मजबूत हो सकती है कि राम केवल राजनीतिक भाषणों और पोस्टरों तक सीमित हैं, असल अभिव्यक्ति में उनकी कोई जगह नहीं है.

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