अगर किसी की सैलरी महीने की 50 हज़ार रुपये है और उसे महीने के अंत में 35 हज़ार ही मिले, तो ये तो तय है कि बवाल जमकर होना है. लेकिन, भारत में किसानों के साथ सालों से ऐसा होते आ रहा है. सरकार हर साल कृषि उत्पादनों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी (MSP) तय करती है, लेकिन असल में किसानों को अक्सर उनके प्रोडक्ट्स का सही दाम नहीं मिलता.
भारत एक कृषि प्रधान देश कहलाता है. क़रीब 14 करोड़ किसान परिवार यहां खेती पर पूरी तरह से निर्भर हैं. लेकिन, भारत जो कृषि आयात पर रकम खर्च करता है वह चौंकाने वाला है. 2024-25 की बात करें तो भारत ने कृषि आयात पर 3,13,225 करोड़ रुपये खर्च किए थे.
3,13,225 करोड़ में से डेढ़ लाख करोड़ और दालों पर करीब 47 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए. यह आंकड़े साफ़ बताते हैं कि भारत में किसान जो उत्पादन कर रहे हैं वह घरेलू खपत के हिसाब से काफी नहीं है.
आयात-निर्यात नीति के चक्रव्यूह में भारत के किसान फंसे हुए हैं. दलहन-तिलहन की बात तो हो रही है. लेकिन क़ीमत की गारंटी नहीं है. नीति और बाजार के बीच किसान पिस रहे हैं.
सोयाबीन का क्या है भाव?
जनवरी 2024 से जनवरी 2026 तक सोयाबीन के भाव MSP से लगातार नीचे रहे हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. जनवरी 2024 में सोयाबीन का MSP 4600 रुपये था, जबकि बाजार भाव केवल 4479 रुपये रहा.
उसके बाद जनवरी 2025 में MSP बढ़कर 4892 रुपये हो गया, लेकिन बाजार भाव 4070.96 रुपये तक गिर गया. अक्टूबर 2025 में MSP 5328 रुपये था, मगर बाजार भाव 3941.56 रुपये तक उतर गया. जनवरी 2026 में भाव थोडा बेहतर होकर 4976.72 रुपये पहुंचा, लेकिन MSP के मुकाबले यह भी कम था.
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तूर दाल की क़ीमत
तूर दाल की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है. जनवरी 2025 में तूर दाल का MSP 7550 रुपये था, लेकिन बाजार मूल्य 7310.24 रुपये के आसपास बना. नवंबर 2025 में MSP बढ़कर 8000 रुपये तक पहुंचा, जबकि बाजार भाव गिरकर 6209.83 रुपये रह गया. जनवरी 2026 में बाजार भाव 7376.42 रुपये था, जो MSP से काफी निचे था.
मक्का ने दिया किसानों को झटका
मक्का वह फसल है जिसकी खेती के जरिए अन्नदाता को ऊर्जादाता बनने का सपना दिखाया गया था. मक्का की खेती को बढ़ावा देकर किसानों ने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ की, बल्कि भारत को मक्का उत्पादन में आत्मनिर्भर भी बनाया. किसानों ने मेहनत और लगन से मक्का की खेती का विस्तार करते हुए देश को अन्न और ऊर्जा के मामले में मजबूत आधार दिया.
हालांकि खेती के इस सफर में किसानों को वह उचित मूल्य नहीं मिल पाया, जिसकी उन्हें उम्मीद थी. सरकार ने 2024-25 के लिए मक्का का MSP करीब 2225 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था. लेकिन बाजार में किसानों को औसतन मात्र 2176.61 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत मिली. यह कीमत MSP से कम होने के बावजूद, किसानों के लिए संतोषजनक नहीं थी.
और स्थिति जनवरी 2026 में और खराब हो गई, जब सरकार ने मक्का का MSP बढ़ाकर 2400 रुपये प्रति क्विंटल किया. बावजूद इसके, किसानों को बाजार में केवल 1664.59 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत मिली, जो MSP से काफी नीचे थी. यह अंतर किसानों की आय में गिरावट का कारण बना और उनका आर्थिक दबाव बढ़ा.
इस समस्या का मुख्य कारण सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर मक्का आयात करना बताया जा रहा है. 2024-25 में लगभग 9.7 लाख मीट्रिक टन मक्का की आयात ने घरेलू बाजार में मक्का की कीमतों को नीचे लाने में अहम भूमिका निभाई. इससे किसानों को अपने उत्पाद की सही मूल्य प्राप्ति में बाधा आई और उनकी मेहनत का उचित फल नहीं मिल पाया.
कॉटन का भाव कितना रहा?
कॉटन यानी कपास भारत की एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक फसल है, जो लाखों किसानों की आमदनी का प्रमुख स्रोत है. हालांकि, पिछले कुछ सालों में कपास की खेती पर कई तरह की समस्याएं मंडरा रही हैं. गिरते दाम, गुलाबी सुंडी की वजह से फसल को होने वाला नुकसान, अच्छे बीजों की कमी, और सस्ते आयात के चलते किसानों का मनोबल गिरता जा रहा है.
अगस्त 2024 में कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 6620 रुपये प्रति क्विंटल था, लेकिन बाजार में किसानों को सिर्फ 6046.01 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिला. इसका मतलब किसानों को MSP से लगभग 10 फीसदी कम दाम मिला, जो उनके लिए चिंता का विषय है. आगे बढ़ते हुए जनवरी 2026 में MSP बढ़ाकर 7710 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया. हालांकि, किसानों को बाजार में केवल 7359.72 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिला, जो MSP से फिर भी कम था.
इस वजह से कपास की खेती का क्षेत्र लगातार घट रहा है, क्योंकि किसानों को अपनी मेहनत का उचित मुनाफा नहीं मिल पा रहा है. साथ ही, गुलाबी सुंडी की बीमारी भी उत्पादन को प्रभावित कर रही है, जिससे किसानों की उपज में भारी कमी आ रही है.
बाजरा से बर्बादी
बाजरा, भारत का एक प्रमुख मोटा अनाज, सालों से ग्रामीण क्षेत्रों में पोषण और आर्थिक सुरक्षा का आधार रहा है. 2023 को मिलेट ईयर के रूप में मनाया गया था, जिसमें मोटे अनाजों को प्रोत्साहन देने की बड़ी उम्मीदें थीं. लेकिन वास्तविकता कुछ और ही दिखा रही है. जनवरी 2025 में बाजरा का MSP 2625 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया था, जबकि बाजार में इसकी कीमत मात्र 2344.03 रुपये प्रति क्विंटल रही. जनवरी 2026 में MSP बढ़कर 2775 रुपये प्रति क्विंटल हो गया, लेकिन किसानों को बाजार से केवल 2365.65 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिला. यह मामला खासकर राजस्थान जैसे बड़े बाजरा उत्पादक राज्यों में चिंताजनक है, जहां सरकारी खरीद नहीं हो रही.
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दरअसल, किसानों को अक्सर सलाह दी जाती है कि वे धान और गेहूं छोड़कर दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों की खेती करें. लेकिन जब सरकार खुद घोषित कीमत भी दिलाने में असमर्थ रहती है, तो किसान कैसे प्रोत्साहित होंगे?
सरकार द्वारा तय MSP और वास्तविक बाजार कीमतों में अंतर किसानों की माने तो "मृत्यु दंड" जैसा है. इससे न केवल किसानों की आय घटती है, बल्कि वे कर्ज और वित्तीय संकट में भी फंस जाते हैं. दलहन, तिलहन और मक्का जैसे खाद्य पदार्थों पर भी यही हाल है, जिससे देश की आयात निर्भरता बढ़ रही है.
इस स्थिति से निपटने के लिए जरूरी है कि सरकार वास्तविक MSP को प्रभावी रूप से लागू करे और किसानों को उचित मूल्य दिलाए. नहीं तो, मोटे अनाजों की खेती संकट में आ जाएगी, जिससे न केवल किसानों की आर्थिक दशा बिगड़ेगी, बल्कि देश का खाद्य सुरक्षा ढांचा भी कमजोर होगा. बाजरे से हो रही यह बर्बादी देश के खाद्य भविष्य के लिए बड़ा खतरा है जिसे तत्काल संबोधित करने की जरूरत है.
ओम प्रकाश