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अमेरिकी स्पेसक्राफ्ट से टकराने वाला था चंद्रयान-2 ऑर्बिटर, ISRO ने बदली कक्षा

ISRO ने पिछले महीने एक बड़ी घटना होने से रोक दिया. असल में हुआ यूं कि चांद के चारों तरफ चक्कर लगा रहे अमेरिका के लूनर रीकॉनसेंस ऑर्बिटर ( NASA- LRO) और चंद्रयान-2 (Chandrayaan-2) के बीच टक्कर होने वाली थी. दोनों अलग-अलग कक्षाओं में घूम रहे थे, लेकिन एक जगह ऐसी आ रही थी, जहां पर LRO और चंद्रयान-2 की टक्कर हो सकती थी. इसरो के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 का ऑर्बिट बदलकर हादसा रोका.

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इसरो के बेंगलुरु स्थित सैटेलाइट सेंटर में मौजूद चंद्रयान-2 ऑर्बिटर (Chandrayaan-2 Orbiter). फोटोः ISRO इसरो के बेंगलुरु स्थित सैटेलाइट सेंटर में मौजूद चंद्रयान-2 ऑर्बिटर (Chandrayaan-2 Orbiter). फोटोः ISRO
स्टोरी हाइलाइट्स
  • 20 अक्टूबर को इसरो ने बदली चंद्रयान-2 ऑर्बिटर की कक्षा.
  • 18 अक्टूबर को ही अमेरिका और भारत ने मिलकर लिया था यह फैसला.
  • अब निकट भविष्य में आपसी टक्कर का कोई खतरा नहीं.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने पिछले महीने एक बड़ी घटना होने से रोक दिया. असल में हुआ यूं कि चांद के चारों तरफ चक्कर लगा रहे अमेरिका के लूनर रीकॉनसेंस ऑर्बिटर ( NASA- LRO) और चंद्रयान-2 (Chandrayaan-2) के बीच टक्कर होने वाली थी. दोनों अलग-अलग कक्षाओं में चक्कर लगा रहे थे, लेकिन एक जगह ऐसी आ रही थी, जहां पर LRO और चंद्रयान-2 की टक्कर हो जाती. ऐसी गंभीर स्थिति में इसरो के वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 ऑर्बिटर के इंजनों को ऑन करके दूसरी कक्षा में भेजा. 

वेदर डॉट कॉम की खबर के मुताबिक जुलाई 2019 के बाद से चंद्रयान-2 जिसे इसरो CH2O भी बुलाता है, उसने कई मुसीबतें झेली हैं. सबसे बड़ी मुसीबत थी विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर की हार्ड लैंडिंग और संपर्क टूटना. लेकिन इसका ऑर्बिटर आज भी चांद के चारों तरफ चक्कर लगा रहा है और जरूरी सूचनाएं भेज रहा है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेटा का आदान-प्रदान किया जा रहा है. 

इसरो द्वारा दिए गए इस टेलिमेट्री चार्ट में आप चंद्रयान-2 (CH2O) और नासा LRO के मार्ग को देख सकते हैं. (फोटोः ISRO)
इसरो द्वारा दिए गए इस टेलिमेट्री चार्ट में आप चंद्रयान-2 (CH2O) और नासा LRO के मार्ग को देख सकते हैं. (फोटोः ISRO)

पिछले महीने 20 अक्टूबर को इसरो और नासा दोनों को यह लगा कि चंद्रयान-2 ऑर्बिटर (CH2O) और नासा एलआरओ (NASA LRO) के बीच टक्कर हो सकती है. ऐसा पहली बार हुआ है कि जब किसी अन्य ग्रह पर दो देशों के स्पेसक्राफ्ट आमने-सामने आने वाले थे. वैज्ञानिकों की गणना के मुताबिक इनके बीच की दूरी कम से कम 100 मीटर रहती. इतनी दूरी पर दो स्पेसक्राफ्ट अगर अलग-अलग दिशाओं में निकलते हैं, तो दोनों को प्रभाव पड़ता है. यह भी संभव था कि इनकी टक्कर हो जाती. 

आपसी समझौते के तहत इसरो और नासा ने 18 अक्टूबर को अपने-अपने स्पेसक्राफ्ट की कक्षा को धीरे-धीरे बढ़ाना और घटाना शुरु किया. इसरो ने जब कक्षा बदल ली तो उसके बाद मिले डेटा के अनुसार अब नासा के LRO और चंद्रयान-2 (CH2O) में निकट भविष्य में किसी तरह के टक्कर की आशंका नहीं है. भविष्य में अगर ऐसी कोई आशंका बनती दिखी तो फिर से कक्षाओं में परिवर्तन किया जाएगा. 

ये है नासा का लूनर रीकॉनसेंस ऑर्बिटर (LRO), इसी ने विक्रम लैंडर को खोजने में मदद की थी. (फोटोः NASA)
ये है नासा का लूनर रीकॉनसेंस ऑर्बिटर (LRO), इसी ने विक्रम लैंडर को खोजने में मदद की थी. (फोटोः NASA)

चंद्रयान-2 (CH2O) और नासा का LRO दोनों ही चंद्रमा की ध्रुवीय कक्षा (Polar Orbit) में चक्कर लगा रहे हैं. इनकी कक्षाओं में और इनकी दिशा में अंतर है लेकिन कभी-कभी दो स्पेसक्राफ्ट के बीच ऐसे टक्कर की आशंका बनी रहती है. दूसरे ग्रहों पर इस तरह का खतरा कम होता है क्योंकि वहां अभी इतने सैटेलाइट्स नहीं भेजे गए हैं. न ही इतने कभी हो पाएंगे. लेकिन यह खतरा अब धरती के ऊपर मंडरा रहा है. 

धरती की लोअर अर्थ ऑर्बिट में 7500 से ज्यादा सैटेलाइट्स हैं. अगर इनकी कक्षाओं, दिशा और गति में जरा सी भी गड़बड़ी हुई तो बड़े हादसे हो सकते हैं. किसी दो सैटेलाइट की टक्कर से निकले कचरे से अन्य सैटेलाइट्स को नुकसान पहुंचने का डर बना रहेगा. इसलिए दुनियाभर की एजेंसी अपने-अपने सैटेलाइट्स के रास्तों, दिशा, गति और उनके मार्ग में आने वाली अन्य वस्तुओं की आशंकाओं पर नजर रखती हैं. 

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