...तो ट्रम्प महामारी की शुरुआत में कोविड-19 संक्रमितों को ग्वांतानामो बे भेजना चाहते थे?

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक किताब की वजह से फिर चर्चा में हैं. एक किताब में अलग-अलग तरह के दावे उन पर किए गए हैं. दरअसल ट्र्म्प प्रशासन को महामारी को सही तरीके से हैंडल नहीं करने के लिए लगातार आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था.

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अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. (फोटो- एपी) अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. (फोटो- एपी)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 22 जून 2021,
  • अपडेटेड 6:35 PM IST
  • अमेरिका में नई किताब में सनसनीखेज दावे
  • ट्रम्प प्रशसान पर किताब में उठे कई सवाल
  • नौकरशाहों के बीच तनाव का भी किया जिक्र

कोरोना महामारी के शुरुआती दिनों में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कोविड-19 से संक्रमित लोगों को ग्वांतानामो बे भेजने की वकालत की थी. ये सनसनीखेज दावा एक नई किताब में किया गया है.  

ये किताब वाशिंगटन पोस्ट के दो रिपोर्टरों- यास्मीन आबूतालेब और डेमियन पालेट्टा ने लिखी है. किताब का शीर्षक है- “Nightmare Scenario: Inside the Trump Administration’s Response to the Pandemic That Changed History”  

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इस किताब के कुछ अंश सोमवार को जारी किए गए. इसमें किए दावे के मुताबिक फरवरी 2020 में व्हाइट हाउस के सिचुएशन रूम में एक बैठक हुई थी. इस बैठक में ट्रम्प ने अपने सहयोगियों से कहा था, “क्या हमारे पास ऐसा कोई द्वीप नहीं है जो हमारे नियंत्रण में हो?  ग्वांतानामो बे के बारे में क्या कहना है?” 

द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प ने कथित तौर पर ये भी कहा था- “हम चीजें आयात करते हैं, लेकिन हम वायरस को आयात करने नहीं जा रहे.” 

किताब के लेखकों के मुताबिक ट्रम्प ने जब दोबारा ऐसा प्रस्ताव किया तो सहयोगियों ने उसे वहीं ब्लॉक कर दिया था. बता दें कि ग्वांतानामो बे क्यूबा में कुख्यात हिरासत कैंप हैं. अमेरिका इसका इस्तेमाल गंभीर अपराधों के अभियुक्तों को रखने के लिए करता रहा है.   

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कोरोना संकट पर घिर गए थे ट्रम्प!

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ट्रम्प ने जब कथित तौर पर ये कहा था तब अमेरिका में कोरोना वायरस से स्थिति इतनी खराब नहीं हुई थी. ट्र्म्प प्रशासन को महामारी को सही तरीके से हैंडल नहीं करने के लिए लगातार आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था. जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के मुताबिक अमेरिका में अब तक 6 लाख से ऊपर लोगों की कोरोना वायरस की वजह से जान जा चुकी है. इनमें से करीब चार लाख मौतें ट्रम्प प्रशासन के कार्यकाल में हुई.  

इस किताब में ट्र्म्प के पूर्व वरिष्ठ सलाहकारों और स्वास्थ्य अधिकारियों के साक्षात्कारों के हवाले से मिली जानकारी को आधार बनाया गया है. इन साक्षात्कारों के विषय को महामारी को लेकर ट्रम्प प्रशासन के रिस्पॉन्स के इर्दगिर्द रखा गया था. 

टेस्टिंग पर क्या था विवाद?

किताब के दावे के मुताबिक ट्रम्प ने पिछले साल 18 मार्च को हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विसेज के तत्कालीन मंत्री एलेक्स अजार से कहा था- “टेस्टिंग मुझे मार रही है. मैं टेस्टिंग की वजह से चुनाव हारने जा रहा हूं! क्या मूर्खता है कि फेडरल सरकार को टेस्टिंग करनी है?”  इससे पांच दिन पहले ही ट्रम्प के दामाद जारेड कुशनर ने अमेरिका की टेस्टिंग रणनीति का चार्ज संभाला था. 

ट्रम्प के ऐसा कहने पर अजार ने कहा था-  “ओह आपका मतलब जारेड से है?” 

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अधिकारियों की भूमिका से नाराज थे ट्रम्प!

ट्रम्प ने तब हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विसेज डिपार्टमेंट में इमरजेंसी तैयारियों के चीफ रॉबर्ट कैडलेक और विदेश विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी की छुट्टी करने का भी मन बना लिया था. ट्रम्प कोरोना वायरस से संक्रमित 14 अमेरिकी नागरिकों की क्रूज जहाज से अमेरिका वापसी के मामले में इन अधिकारियों की भूमिका से नाराज थे.  किताब के लेखकों आबूतालेब और पालेट्टा के मुताबिक ट्रम्प और नौकरशाहों के बीच तनाव की वजह से कई तरह के मुद्दे हुए. 

किताब में कहा गया है कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिसीज के तत्कालीन डायरेक्टर डॉ एंथोनी फौसी को हटाने की जगह ट्रम्प और उनकी टीम ने फौसी और अन्य स्वास्थ्य अधिकारियों की सिफारिशो की अनदेखी की. इसकी बजाए आर्थिक विशेषज्ञों और कुशनर की बातों को अहमियत दी गई. फौसी और ट्रम्प के बीच मतभेद का बड़ा मुद्दा ट्रम्प की ओर से कोरोना वायरस को लेकर एंटी मलेरिया ड्रग हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन के इस्तेमाल पर जोर दिया जाना था. 

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