46 साल पहले की थी शिया धर्मगुरु की हत्या, अब इराक ने सद्दाम शासन के पूर्व अधिकारी को दी फांसी की सजा

इराक में सद्दाम हुसैन के शासनकाल के वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी सादौन सब्री अल-कैसी को 1980 में प्रमुख शिया धर्मगुरु मोहम्मद बाकिर अल-सद्र की हत्या में अपराधी ठहराकर फांसी दे दी. अल-कैसी पर अल-सद्र, अल-हकीम परिवार के सदस्यों और कई नागरिकों की हत्या का आरोप था.

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1980 के अपराधों की सजा 2026 में मिली (Photo: Representational) 1980 के अपराधों की सजा 2026 में मिली (Photo: Representational)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 09 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 11:50 PM IST

इराक ने सोमवार को घोषणा की कि उसने सद्दाम हुसैन के शासनकाल के एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी को 1980 में एक प्रमुख शिया धर्मगुरु की हत्या में भूमिका के लिए फांसी दे दी है. इराक की नेशनल सिक्योरिटी सर्विस के अनुसार दोषी अधिकारी सादौन सब्री अल-कैसी को मानवता के खिलाफ गंभीर अपराधों का दोषी ठहराया गया था.

अल-कैसी सद्दाम हुसैन के शासन के दौरान मेजर जनरल के पद पर कार्यरत थे और उन्हें पिछले साल गिरफ्तार किया गया था. उस पर शिया धर्मगुरु मोहम्मद बाकिर अल-सद्र, अल-हकीम परिवार के सदस्यों और कई आम नागरिकों की हत्या में शामिल होने का आरोप था. हालांकि अधिकारियों ने यह साफ नहीं किया कि फांसी कब दी गई.

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मोहम्मद बाकिर अल-सद्र इराक की धर्मनिरपेक्ष बाथ पार्टी सरकार और तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के प्रमुख आलोचक थे. 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद उनकी आलोचना और अधिक तीव्र हो गई थी, जिससे सद्दाम को इराक में शिया विद्रोह की आशंका होने लगी थी.

1980 में, जब सरकार ने शिया कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई तेज की, तब अल-सद्र और उनकी बहन बिंत अल-हुदा को गिरफ्तार किया गया. बिंत अल-हुदा एक धार्मिक विदुषी और सामाजिक कार्यकर्ता थीं, जो सरकारी दमन के खिलाफ मुखर थीं. रिपोर्टों के अनुसार, दोनों को हिरासत में कड़ी यातनाएं दी गईं और 8 अप्रैल 1980 को फांसी दे दी गई.

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यह घटना पूरे इराक में आक्रोश का कारण बनी और आज भी सद्दाम शासन के दमन का प्रतीक मानी जाती है. सद्दाम हुसैन सुन्नी अल्पसंख्यक समुदाय से थे, जबकि देश की बड़ी आबादी शिया है.

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2003 में अमेरिका के नेतृत्व वाले आक्रमण के बाद, इराकी सरकार ने सद्दाम शासन के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों और धार्मिक उत्पीड़न के मामलों में पूर्व अधिकारियों के ख़िलाफ़ कई कार्रवाइयां की हैं. 

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