क्या डेनमार्क को मिल रही है अपने किए की सजा? ग्रीनलैंड पर अमेरिका की धमकी से NATO के सामने संकट

डेनमार्क के लिए मौजूदा स्थिति 'जैसे को तैसा' (Karma) जैसी नजर आ रही है. यह पूरा घटनाक्रम 1974 के साइप्रस संकट की याद दिलाता है. आज जब अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश डेनमार्क के ग्रीनलैंड पर नजरें गड़ाए बैठा है, तो डेनमार्क उसी तर्क के जाल में फंसता दिख रहा है.

Advertisement
अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश डेनमार्क के ग्रीनलैंड पर नजरें गड़ाए बैठा है (Representational Image: Reuters) अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश डेनमार्क के ग्रीनलैंड पर नजरें गड़ाए बैठा है (Representational Image: Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 20 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 4:50 PM IST

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि इतिहास खुद को दोहराता है. आज डेनमार्क और अमेरिका के बीच ग्रीनलैंड को लेकर बढ़ता तनाव इसी कहावत को चरितार्थ कर रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर पूर्ण नियंत्रण की जिद ने न केवल डेनमार्क की संप्रभुता को खतरे में डाल दिया है, बल्कि सैन्य गठबंधन 'नाटो' के अस्तित्व पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.

Advertisement

दरअसल, डेनमार्क के लिए मौजूदा स्थिति 'जैसे को तैसा' (Karma) जैसी नजर आ रही है. ग्रीस के पूर्व वित्त मंत्री यानिस वारुफाकिस ने याद दिलाया कि 1974 के साइप्रस संकट के दौरान, जब नाटो के दो सदस्य देश ग्रीस और तुर्की एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध की स्थिति में थे, तब डेनमार्क ने ही तर्क दिया था कि नाटो का काम एक सदस्य देश की रक्षा दूसरे सदस्य देश से करना नहीं है.

आज जब अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश डेनमार्क के ग्रीनलैंड पर नजरें गड़ाए बैठा है, तो डेनमार्क उसी तर्क के जाल में फंसता दिख रहा है. नाटो का अनुच्छेद 5 बाहरी हमलों से रक्षा की गारंटी तो देता है, लेकिन जब हमला अंदर से हो, तो नाटो का चार्टर मौन रहता है.

डोनाल्ड ट्रंप लगातार यूरोपीय संघ और नाटो देशों को उकसाते रहे हैं. ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी इसी कड़ी का हिस्सा है. यूरोपीय देशों ने डेनमार्क के समर्थन में प्रतीकात्मक रूप से सैनिक भेजे हैं- ब्रिटेन ने एक और नॉर्वे ने दो सैनिक. इससे नाराज होकर ट्रंप ने डेनमार्क के समर्थन में खड़े यूरोपीय देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ भी लगा दिया है.

Advertisement

साइप्रस संकट: जब नाटो तमाशबीन बना रहा

यह पूरा घटनाक्रम 1974 के साइप्रस संकट की याद दिलाता है. 1974 में ग्रीस समर्थित तख्तापलट के बाद तुर्की ने साइप्रस पर आक्रमण किया था. ग्रीस ने नाटो से मदद मांगी, लेकिन नाटो ने इसे 'पारिवारिक झगड़ा' मानकर हस्तक्षेप नहीं किया. नतीजन तुर्की ने द्वीप का करीब 36 प्रतिशत हिस्सा अपने कब्जे में ले लिया था. इसके बाद ग्रीस ने 1974 से 1980 तक नाटो के सैन्य ढांचे से खुद को अलग कर लिया था. आज डेनमार्क की स्थिति वैसी ही है, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार हमलावर खुद नाटो का सबसे बड़ा संरक्षक यानी अमेरिका है.

अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है, जबकि डेनमार्क का रक्षा बजट 2025 में महज करीब 10 अरब डॉलर बताया जाता है. यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर बल प्रयोग करता है, तो नाटो के लिए हस्तक्षेप करना बेहद कठिन होगा.

नाटो के अंत की शुरुआत?

स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर बलपूर्वक कब्जा करने की कोशिश करता है, तो यह नाटो के लिए डेथ नेल (मौत की घंटी) साबित होगा. नाटो प्रमुख मार्क रुट ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है, जबकि ग्रीनलैंड के मूल निवासी (इनुइट) अपनी स्वायत्तता के लिए चिंतित हैं.

Advertisement

नाटो के पास इस संकट का कोई स्पष्ट समाधान नहीं है. अनुच्छेद-4 केवल चर्चा की अनुमति देता है, जबकि अनुच्छेद-5 बाहरी हमले तक सीमित है. ऐसे में अगर दोस्त ही दुश्मन बन जाए, तो नाटो में कोई भी देश वास्तव में अकेला पड़ सकता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement