बांग्लादेश में होने जा रहे ऐतिहासिक चुनाव से ठीक पहले वहां का हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय असुरक्षा और चिंता के माहौल में जी रहा है. समुदाय के लोगों का कहना है कि वे देश की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों अवामी लीग और बीएनपी, दोनों से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. वहीं जमात-ए-इस्लामी के फिर से मुख्यधारा की राजनीति में लौटने से उनकी चिंता और बढ़ गई है.
आजतक ने राजधानी ढाका में हिंदू नागरिकों के एक ग्रुप से उनके विचार सुनने के लिए मुलाकात की. ढाका स्थित प्रसिद्ध ढाकेश्वरी नेशनल टेंपल में हिंदू समुदाय के कई लोगों ने अपनी आशंकाएं और विचार साझा किए. हिंदू पुरुष और महिलाएं दोनों ही जमात के नेतृत्व वाली सरकार की संभावना से डरते हैं, जिसका मकसद बांग्लादेश में इस्लामी शरिया शासन लागू करना है. पहले की अवामी लीग और BNP में हिंदुओं को कुछ रिप्रेजेंटेशन मिलने के बावजूद, उन्हें लगता है कि यह सिर्फ़ दिखावा था और समुदाय के लिए मुश्किल से ही कुछ हुआ है.
समुदाय के लोगों का कहना है कि अवामी लीग और बीएनपी दोनों सरकारों में हिंदुओं को कुछ प्रतिनिधित्व जरूर मिला, लेकिन वह सिर्फ प्रतीकात्मक रहा और इससे समुदाय की वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं हो सका. उनका आरोप है कि राजनीतिक दल हिंदुओं को केवल वोट बैंक के रूप में देखते रहे हैं.
हिंदू नागरिकों का मानना है कि बांग्लादेश में हिंदू समुदाय एक महत्वपूर्ण वोट बैंक है और कई सीटों के चुनाव परिणाम में निर्णायक भूमिका निभाता है. इसके बावजूद अब तक किसी भी राजनीतिक दल ने उनकी जरूरतों और अधिकारों को लेकर गंभीर प्रयास नहीं किए. इसी वजह से अब समुदाय के भीतर केवल हिंदू अल्पसंख्यकों के लिए नई राजनीतिक पार्टी बनाने की मांग तेज हो रही है.
इस आंदोलन से जुड़े 'सनातनी अधिकार आंदोलन/बांग्लादेश यूनाइटेड सनातनी अवेकनिंग एलायंस' के सदस्य प्रोसेनजीत कुमार हल्दार ने बताया कि हिंदुओं के लिए नई राजनीतिक पार्टी बनाने की पहल पहले भी की गई थी. उन्होंने कहा कि इस संबंध में चुनाव आयोग के समक्ष आवेदन भी दिया गया था, लेकिन उस पर आगे कोई कार्रवाई नहीं हुई.
इंद्रजीत कुंडू