बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले संसदीय चुनाव से पहले चुनाव आयोग के एक फैसले ने राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस छेड़ दी है. चुनाव आयोग ने मतदान दिवस पोलिंग सेंटर के भीतर और उसके 400 गज के दायरे में मोबाइल फोन ले जाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है.
इस आदेश के तहत कोई भी व्यक्ति - चाहे वह मतदाता हो, पोलिंग एजेंट या चुनाव ड्यूटी पर तैनात अधिकारी, मोबाइल फोन के साथ पोलिंग स्टेशन में प्रवेश नहीं कर सकेगा. केवल प्रिसाइडिंग ऑफिसर, तैनात पुलिस और दो अधिकृत अंसार सदस्य ही इस प्रतिबंध से छूट पाएंगे.
यह कड़ा कदम उन चुनौतियों का सामना करते हुए उठाया गया है, जो चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए जरूरी हैं. खासतौर पर यह चुनाव प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता से विदाई के बाद हो रहा है, जो राजनीतिक इतिहास में एक बेहद अहम मोड़ माना जा रहा है.
हालांकि दक्षिणपंथी दलों ने चुनाव आयोग के इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताया है. जमात-ए-इस्लामी और उसके सहयोगी दलों ने चेतावनी दी है कि यदि आदेश वापस नहीं लिया गया तो वे चुनाव आयोग का घेराव करेंगे. इसी तरह, नेशनल सिटिजन पार्टी ने भी इस फैसले का विरोध जताया है और आदेश वापस न होने की स्थिति में उन्होंने भी विरोध प्रदर्शन की घोषणा की है.
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इसी बीच चुनाव आयोग ने पत्रकारों और पर्यवेक्षकों को मतदान केंद्रों के अंदर मोबाइल फोन ले जाने की अनुमति दी है ताकि वे रियल टाइम रिपोर्टिंग और निगरानी कर सकें. चुनाव आयुक्त अबुल फजल एमडी सनाउल्लाह ने कहा कि यह छूट पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है.
इस विवाद के बीच राजधानी ढाका में चुनाव प्रचार अपने चरम पर पहुंच गया है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेताओं ने विभिन्न इलाकों में रैलियां कीं. मोबाइल फोन बैन का मुद्दा अब बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा और संवेदनशील सवाल बन चुका है, जिसके परिणाम आगामी चुनाव के प्रक्रिया और निष्पक्षता पर गहरा प्रभाव डालने की संभावना है.
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