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US से सुलेमानी की मौत का बदला लेने के लिए क्या करेगा ईरान?

aajtak.in
  • 04 जनवरी 2020,
  • अपडेटेड 12:44 PM IST
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ईरान के मेजर जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद अमेरिका और ईरान के बीच 1979 के बाद सबसे बड़ा टकराव पैदा हो गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन और अपने रास्ते की अड़चन सुलेमानी को मारकर इस्लामिक गणराज्य ईरान को बहुत बड़ा झटका दे दिया है. सुलेमानी की मौत के बाद पहले से ही तनावपूर्ण और हिंसायुक्त मध्य-पूर्व क्षेत्र में संघर्ष छिड़ने की आशंका प्रबल हो गई है.

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बगदाद एयरपोर्ट पर अमेरिकी हमले में कासिम सुलेमानी के मारे जाने के बाद से ही पूरी दुनिया युद्ध की आशंका से सहम गई है. अमेरिकी भले ही ईरान से युद्ध ना चाहते हों लेकिन मध्य-पूर्व क्षेत्र में ईरान की पकड़ मजबूत करने वाले और इराक के प्रमुख सहयोगी सुलेमानी की मौत नए खूनी संघर्ष को जन्म दे सकता है.

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ईरान ने सुलेमानी की मौत के तुरंत बाद ही प्रतिज्ञा ले ली है कि वह कसूरवारों से जबरदस्त बदला लेगा और उसकी इस धमकी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. सुलेमानी ईरान के सिर्फ मेजर जनरल नहीं थे बल्कि उन्हें देश का दूसरा सबसे ताकतवर शख्स कहा जाता था. ईरान ने हाल ही में अमेरिका के एक ताकतवर सर्विलांस ड्रोन को मार गिराकर अपने इरादे जाहिर कर दिए थे. लेकिन सवाल ये उठता है कि ईरान अमेरिका से बदला लेने के लिए क्या कदम उठा सकता है?

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क्या प्रॉक्सी फोर्स से बनाएगा अमेरिका को निशाना?
ईरान अपने छद्म युद्ध की रणनीति से अपने दुश्मनों को पस्त करने में माहिर है. हालांकि, ईरान के बदला लेने का हर रास्ता खतरे से होकर गुजरता है. 1979 में अमेरिका समर्थित रजा शाह को सत्ता से उखाड़ फेंकने के बाद से ईरान में मौलवियों का शासन बरकरार रहा है, ऐसे में वह अमेरिका से पंगा मोल लेने से पहले सत्ता गंवाने समेत तमाम नफे-नुकसान को तराजू में तौलकर देखना जरूर चाहेगा.

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कैलिफोर्निया के पॉलिसी थिंक टैंक रैंड कॉरपोरेशन के एसोसिएट पॉलिटिकल साइंटिस्ट एरिआने ताबातबइ ने न्यूज एजेंसी एएफपी से बताया, हम यह भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं कि ईरान अब किस दिशा में जाना पसंद करेगा. लेकिन हम ये जानते हैं कि ईरान हमेशा सारा गणित लगाकर ही कोई काम करता है और बहुत ही सुनियोजित तरीके से कदम आगे बढ़ाता है. मुझे लगता है कि ईरान करारा जवाब लेने के लिए सही वक्त का इंतजार करेगा.

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ईरान अपनी प्रॉक्सी फोर्स के लिए कुख्यात है. गुरिल्ला युद्धनीति से ईरान अपने से ज्यादा ताकतवर सेना के हौसले भी पस्त किए हैं. 1980-88 में इराक के खिलाफ खतरनाक युद्ध के दौरान ईरान ने अपनी इसी रणनीति के जरिए खुद को साबित कर दिखाया था. दूसरी तरफ, इराक, सीरिया, लेबनान और अन्य देशों में ईरान का अच्छा खासा प्रभाव है. जाहिर है कि मध्य-पूर्व में ईरान अमेरिका से ज्यादा अच्छी स्थिति में है.

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मध्य-पूर्व में ईरान का डंका बजाने वाले कुद्स फोर्स के मेजर जनरल कासिम सुलेमानी की मौत का बदला लेने के ईरान के पास आखिर क्या-क्या विकल्प हैं?

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मध्य-पूर्व क्षेत्र में ईरान द्वारा समर्थित प्रॉक्सी फोर्सेज तबाही मचा सकती है. जहां यमन में ईरान को हूती विद्रोहियों का समर्थन हासिल है, वहीं लेबनान में हेजबुल्लाह और इराक में शिया मिलिशिया के साथ भी ईरान के मजबूत संबंध है. इराक जंग में सबसे अहम भूमिका निभा सकता है. ईरान समर्थित शिया मिलिशिया इराक से अमेरिकी फौजों को खदेड़ने की कोशिश कर सकते हैं और इराक की सरकार को अस्थिर कर नया राजनीतिक संकट भी पैदा करा सकते हैं.

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वॉशिंगटन आधारित मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट की एलेक्स वतांका ने कहा, मुझे लग रहा है कि इराक में अमेरिका की सेना भारी दबाव में आ गई है. अमेरिकी सेना का यहां से हटना मध्य-पूर्व में अमेरिका के लिए बहत बड़े रणनीतिक नुकसान की तरह होगा.

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पहले से ही राजनीतिक और आर्थिक संकट से गुजर रहे लेबनान में हेजबुल्लाह संघर्ष छेड़ सकता है. दूसरी तरफ, यमन में भी शांति की उम्मीदों को झटका लग सकता है. न्यू यॉर्क स्थित सौफन सेंटर ने अपने बयान में कहा, तेहरान चाहे कोई भी कदम उठाए, ये बात तय है कि अमेरिका के साथ संघर्ष की आग पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र में फैल जाएगी.

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साइबर हमला

ईरान बदला लेने के लिए साइबर हमले को भी अपना हथियार बना सकता है. विश्लेषकों का कहना है कि तेहरान के पास पश्चिमी देशों के साइबर इन्फ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुंचाने की अपार क्षमता है और उसने कथित तौर पर एक 'साइबर आर्मी' का भी गठन कर लिया है जो इस्लामिक गणराज्य ईरान के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है.


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फ्रांस के सुरक्षा मामलों से जुड़ी जानकारी जुटाने वाले संगठन क्लूसिफ के प्रमुख लोइक गुएजो ने एएफपी से बताया, ईरान अपने साइबर हमले में अहम औद्योगिक ढांचों जैसे बांध या पावर स्टेशनों को अपना निशाना बना सकता है. सबसे ज्यादा डर इस बात का है कि बिजली कटौती, जहर, गैस लीक्स, बम विस्फोट, यातायात में रुकावट से आम जनजीवन पूरी तरह से अस्त व्यस्त हो सकता है.

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तेल आपूर्ति बाधित करेगा ईरान?

ईरान के मेजर जनरल सुलेमानी की मौत की खबर से ही तेल की कीमतों में करीब चार फीसदी का इजाफा हो गया. जब-जब मध्य-पूर्व देशों में किसी भी तरह के संघर्ष की आशंका बनती है तो तेल की आपूर्ति बाधित होने के भी कयास लगने लगते हैं और तेल महंगा हो जाता है. ईरान दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक मार्ग होर्मूज स्ट्रेट को ब्लॉक करके पूरी दुनिया में तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है.

अमेरिका समेत तमाम पश्चिमी देश पहले ही सऊदी तेल संयंत्रों पर हमले के पीछे ईरान का हाथ बता चुके हैं. पिछले कुछ महीनों में खाड़ी देशों से गुजर रहे कई टैंकरों को ईरान ने अपने कब्जे में लेकर दिखा दिया है कि मौका आने पर वह मध्य-पूर्व में पश्चिमी देशों समेत सऊदी के जहाजों को आसानी से निशाना बना सकता है.

विश्लेषकों का कहना है कि ईरान जहाजों को बड़ी सटीकता के साथ निशाना बना सकता है और उनका रास्ता रोक सकता है.

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सैन्य युद्ध

सबसे आखिरी विकल्प ये हो सकता है कि ईरान अमेरिका के खिलाफ अपनी बैलेस्टिक मिसाइलों को इस्तेमाल करे और उस पर सैन्य हमला कर दे. ईरान मध्य-पूर्व में अपने क्षेत्रीय दुश्मनों और अमेरिका के सहयोगियों इजरायल और सऊदी को भी टारगेट कर सकता है. अगर ऐसा होता है तो फिर दो देशों के बीच का संघर्ष क्षेत्रीय युद्ध में तब्दील हो जाएगा.

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हालांकि, विश्लषकों का कहना है कि ईरान सीधे युद्ध लड़ने के विकल्प को शायद ही अपनाए. इराक, सीरिया और लेबनान में इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप (आईसीजी) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर हाइको विमेन ने एएफपी से कहा, सामान्य अनुमान यही है कि हालात बिगड़ने के बावजूद अमेरिका और ईरान सीधे युद्ध लड़ने के बजाय एक-दूसरे को झुकने पर मजबूर करने की कोशिश करेंगे.

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उन्होंने एएफपी एजेंसी को बताया, हम यह नहीं बता सकते हैं कि ईरानी किसी नाटकीय संघर्ष का फैसला लेंगे या गैर-हिंसात्मक तरीके से जवाब देने पर विचार करेंगे. वॉशिंगटन आधारित मिडिल ईस्ट इंस्टिट्यूट में काम कर रहे एलेक्स वतांका ने कहा कि ईरानी नेतृत्व भले ही आशावादी है लेकिन वह आत्मघाती नहीं है. हालांकि, अगर उन्हें लगता है कि वे किसी मौके का फायदा उठा सकते हैं तो वे इससे चूकेंगे नहीं.

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