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जस्टिन ट्रूडो ने दो महीने में ही किसानों को लेकर मारी पलटी? हमदर्दी पर उठ रहे सवाल

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भारत में नरेंद्र मोदी सरकार के नए कृषि कानून के खिलाफ चल रहे किसानों के आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलना शुरू हो गया है. पिछले एक दो दिनों से ब्रिटिश और कनाडाई सांसद सोशल मीडिया पर समर्थन कर रहे थे लेकिन मंगलवार को कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो खुलकर किसानों के समर्थन में आए. पीएम ट्रूडो का यह रुख भारत को नाराज करने के लिए काफी था और भारत के विदेश मंत्रालय ने तत्काल कड़ी आपत्ति जताई. 

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कनाडा के प्रधानमंत्री ने मंगलवार को कहा कि उन्होंने भारत में किसानों के चल रहे आंदोलन को लेकर अपनी चिंता से नई दिल्ली को अवगत करा दिया है. भारत ने कहा है कि कनाडा उसके आंतरिक मामलों में बेमतलब का हस्तक्षेप कर रहा है. जस्टिन ट्रूडो ने गुरु नानक की 551वीं जयंती यानी गुरु परब पर कनाडाई सांसद बार्दिश चैजर की ओर से आयोजित एक फेसबुक वीडियो लाइव में यह बात कही है. इस वीडियो इवेंट में कनाडा के मंत्री नवदीप सिंह और हरजीत सज्जन भी शामिल हुए थे. इसी इवेंट में ट्रूडो ने कहा कि भारत में किसानों के आंदोलन को लेकर वहां की सरकार का रुख चिंतित करने वाला है. ट्रूडो ने कहा कि कनाडा हमेशा से शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का समर्थक रहा है. 

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जस्टिन ट्रूडो की इस टिप्पणी को लेकर भारत में सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया आई. कुछ लोगों ने ट्रूडो का समर्थन किया तो कई लोगों ने कहा कि कनाडाई पीएम बेमतलब भारत के आंतरिक मामलों में टांग अड़ा रहे हैं. दूसरी तरफ, WTO (विश्व व्यापार संगठन) में भारत की कृषि नीति को लेकर कनाडा की पुरानी प्रतिक्रिया को लोग सोशल मीडिया पर शेयर करने लगे. भारत के कुछ पत्रकारों ने कुछ रिपोर्ट्स शेयर कीं और कहा कि WTO में इसी साल अक्टूबर में भारत की कृषि नीति को लेकर जस्टिन ट्रूडो की सरकार ने आपत्ति जताई थी.

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कनाडा ने WTO की कमिटी ऑन एग्रीकल्चर की बैठक में भारत से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि को लेकर जानकारी मांगी थी. इसके तहत, मोदी सरकार किसानों को साल में छह हजार रुपए उनके खाते में सीधे डालती है. इसे लेकर ही कनाडा ने पूछा था कि इस योजना में लाभार्थी कौन होगा और किस आधार पर उन्हें ये मदद दी जाएगी. कनाडा ने प्रधानमंत्री ने फसल बीमा योजना और सब्सिडी को लेकर भी सवाल उठाए थे. ऐसे में लोग पूछ रहे हैं कि एक तरफ तो कनाडा किसानों से हमदर्दी दिखा रहा है और दूसरी तरफ मोदी सरकार की किसानों को सशक्त बनाने वाली नीतियों का विरोध करता है.

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WTO के सदस्य देश उसके नियम के तहत ही कारोबार करते हैं. कृषि नीति भी WTO की नीतियों से प्रभावित होती है. इसके तहत, एक हद तक ही किसानों को सब्सिडी देने का सीमा तय की जाती है. सदस्य देशों को डर रहता है कि कोई देश कहीं सब्सिडी देकर अंतरराष्ट्रीय कारोबार में उन्हें पीछे ना छोड़ दे. इसी साल, अगस्त महीने में भारत ने कहा था कि वो WTO उस नियम को नहीं मानेगा जिसके तहत कृषि क्षेत्र में सब्सिडी को सीमित करने की बात कही गई है. 

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भारत ने कहा था कि वो कम आय वाले गरीब किसानों को आर्थिक मदद देना जारी रखा जाएगा. WTO के सदस्य देश कृषि सब्सिडी की सीमा पर सहमति बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन अब भी इस पर मतभेद है. विकसित देश अपने किसानों को सब्सिडी देने के लिए बड़ी रकम खर्च करते हैं लेकिन वो विकासशील देशों की सब्सिडी पर हमेशा से सवाल उठाते हैं. 

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इसी साल मार्च में WTO में भारत के प्रतिनिधि ने कहा था, ''WTO के अनुच्छेद 6.2 में विकसित देशों को गरीब किसानों को सब्सिडी के जरिए मदद करने की छूट मिलती है जबकि विकासशील देशों के साथ ऐसा नहीं है. सब्सिडी की सीमा को भारत स्वीकार नहीं करेगा.'' भारत समेत विकासशील देशों का तर्क है कि पहले विकसित देश अपने किसानों को सब्सिडी देना बंद करें.

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कांग्रेस और अन्य पार्टियों ने भी भारत के आंतरिक मामले में दखल देने को लेकर ट्रूडो को आड़े हाथों लिया है. कांग्रेस की प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने ट्वीट में कहा कि मैं भारत सरकार के किसानों को भरोसे में लिए बिना किसान बिल पास किए जाने के खिलाफ हूं लेकिन इससे कनाडाई पीएम जस्टिन ट्रूडो को हमारे आंतरिक मामले में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है. शमा ने कहा कि हम एक संप्रभु देश है और अपने मामलों को सुलझाना अच्छी तरह से जानते हैं. शिवसेना की सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने भी ट्रूडो की टिप्पणी पर ऐतराज जताया और कहा कि भारत के आंतरिक मुद्दे में वो अपनी राजनीति ना खेलें.

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कनाडा के प्रधानमंत्री से पहले वहां के तमाम सांसदों ने भी कृषि कानून को लेकर किसानों के प्रदर्शन का समर्थन किया था. कनाडा के अलावा, ब्रिटेन के भी कई सांसदों ने किसानों का समर्थन करते हुए मोदी सरकार के रुख की आलोचना की. हालांकि, ब्रिटेन की सरकार की तरफ से ऐसा कोई बयान नहीं आया.

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