2016 मदरसा बिल पर योगी सरकार का बड़ा दांव, सपा-मौलाना-शिक्षक सब नाराज!

उत्तर प्रदेश सरकार ने 2016 के मदरसा वेतन विधेयक को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. कैबिनेट की मंजूरी के बाद प्रस्ताव को दोनों सदनों में रखा जाएगा. सपा, मुस्लिम धर्मगुरुओं और मदरसा शिक्षकों ने फैसले पर नाराजगी जताई है. उनका कहना है कि लंबित वेतन की समस्या हल करने के बजाय सरकार बिल हटाकर मदरसों को कमजोर कर रही है.

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मदरसा शिक्षकों का विरोध तेज.(File Photo: ITG) मदरसा शिक्षकों का विरोध तेज.(File Photo: ITG)

आशीष श्रीवास्तव

  • लखनऊ,
  • 08 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 9:57 PM IST

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2016 का विवादित मदरसा वेतन विधेयक अब वापसी की राह पर है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली राज्य सरकार ने इस विधेयक को वापस लेने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. यह विधेयक पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार के दौरान पारित किया गया था. राज्य मंत्रिमंडल ने इसे वापस लेने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है और अब इसे पुनर्विचार के लिए विधानसभा और विधान परिषद, दोनों सदनों में पेश किया जाएगा.

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इस विधेयक में प्रावधान था कि यदि मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन भुगतान में देरी होती है, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है. सरकार के इस नए कदम के सामने आते ही प्रदेश की सियासत गरमा गई है.

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सरकार के फैसले पर समाजवादी पार्टी, मुस्लिम धर्मगुरुओं और मदरसा शिक्षकों ने चिंता और कड़ी आपत्ति जताई है. उनका कहना है कि यह फैसला मदरसा शिक्षकों के हितों के खिलाफ है और सरकार मदरसों के प्रति संवेदनशील नहीं दिख रही है.

विपक्ष और धर्मगुरुओं का विरोध

विरोध जताने वालों का कहना है कि मदरसा शिक्षकों को लंबे समय से वेतन नहीं मिल रहा है, लेकिन राज्य सरकार इस गंभीर समस्या पर ध्यान देने के बजाय विधेयक को वापस लेने की तैयारी कर रही है. उनका आरोप है कि सरकार को पहले लंबित वेतन भुगतान की व्यवस्था करनी चाहिए थी.

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मुस्लिम धर्म गुरु सैफ अब्बास ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार मदरसों को अच्छी शिक्षा देने में सक्षम नहीं हो पा रही है और अब उन्हें अलग-थलग करने की कोशिश की जा रही है. उनका कहना है कि शिक्षकों की सैलरी समय पर नहीं दी जा रही है और अब बिल को हटाने की बात हो रही है.

समाजवादी पार्टी के नेता अमिक जमाई ने भी सरकार पर निशाना साधा. उनका कहना है कि यदि प्रदेश में यही स्थिति रही तो एक भी मदरसा नहीं बचेगा. उनके अनुसार गरीब बच्चों की शिक्षा से जुड़े संस्थानों पर यह कदम गंभीर असर डाल सकता है.

शिक्षकों की नाराजगी और वेतन का मुद्दा

मदरसा शिक्षक इरफान अंसारी ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की है. उन्होंने कहा कि शिक्षक लंबे समय से वेतन के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन सरकार इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रही है. उनका दावा है कि राज्य से मिलने वाला 40 प्रतिशत हिस्सा भी काफी समय से नहीं मिला है.

शिक्षकों का कहना है कि उनकी समस्याओं को उठाने के बजाय अब सरकार उनके हितों से जुड़े विधेयक को ही खत्म करने की दिशा में बढ़ रही है. उन्होंने इसे अन्याय करार दिया है और कहा कि यह फैसला मदरसा शिक्षकों के लिए चिंता का विषय बन गया है.

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सियासी और सामाजिक असर

राज्य सरकार का यह फैसला अब विधानसभा और विधान परिषद में पुनर्विचार के लिए रखा जाएगा, जिसके बाद इस पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा. इस बीच विपक्ष, धर्मगुरुओं और मदरसा शिक्षकों का विरोध तेज होता दिख रहा है.

मामला अब केवल एक विधेयक तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह शिक्षा, वेतन और मदरसों के भविष्य से जुड़ा बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन गया है. आने वाले दिनों में इस पर सियासत और तेज होने की संभावना है.

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