उत्तर प्रदेश में शहरी निकाय चुनाव की अभी घोषणा नहीं हुई है, लेकिन बसपा ने अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान शुरू कर दिया है. पश्चिमी यूपी की दलित-मुस्लिम बहुल सहारनपुर नगर निगम सीट की महापौर (मेयर) के लिए बसपा ने इमरान मसूद की पत्नी साइमा मसूद को प्रत्याशी बनाया है. सपा की साइकिल से उतरकर बसपा के हाथी पर सवारी कर रहे इमरान मसूद अपनी पत्नी को भले ही मेयर का टिकट दिलाने में सफल रहे हों, लेकिन नगर निगम पर काबिज होने की राह आसान नहीं है.
बसपा के पश्चिमी यूपी प्रभारी शमसुद्दीन राइन ने मंगलवार को प्रेस कॉफ्रेंस करके साइमा मसूद को सहारनपुर सीट से मेयर के टिकट देने का ऐलान किया है. शमसुद्दीन राय ने कहा कि इमरान मसूद का साथ मिलने के बाद बसपा की और उम्मीदें बढ़ी हैं और इस बार निश्चित रूप से कई नगर निगम और नगर पालिका पर बसपा का परचम लहराएगा. वहीं, सपा छोड़कर बसपा में आए इमरान मसूद ने कहा कि इस बार सब कुछ नीला नीला होगा. नीला रंग विजय का प्रतीक है और सहारनपुर में नीले रंग में ही रंगा हुआ दिखाई देगा. उन्होंने कहा कि उनका मुकाबला बीजेपी से है. बीजेपी को हराना चाहता है उन्हें बसपा को विजय बनाना होगा.
बीजेपी और बसपा के बीच हुआ था कांटे का मुकाबला
बता दें कि 2017 में सहारनपुर नगर निगम के मेयर चुनाव में बीजेपी और बसपा के बीच कांटे का मुकाबला रहा था. बीजेपी के प्रत्याशी संजीव वालिया को करीब एक लाख इक्कीस हजार वोट मिले थे तो बसपा के हाजी फजलुर्रहमान को एक लाख 19 हजार वोट मिले थे जबकि कांग्रेस के शाशि वालिया को 60 हजार और सपा के प्रत्याशी साजिद चौधरी को 10 हजार वोट मिले थे. बीजेपी महज दो हजार वोटों से बीएसपी का मात देकर कब्जा जमाया था, लेकिन इस बार के सियासी समीकरण व हालत बदल गए हैं.
इमरान मसूद ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से सपा में आए थे और अब बसपा का दामन थाम चुके हैं और उनकी पत्नी को मायावती ने नगर निगम चुनाव में उतारा है. सपा, भाजपा और कांग्रेस ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन इमरान मसूद के सपा छोड़कर बसपा में जाने से सहारनपुर के सियासी हालत बदल गए हैं. इमरान के पाला बदलने से सपा खेमा नाराज है और पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में है. ऐसे में सपा अगर किसी मुस्लिम को प्रत्याशी बनाती है तो इमरान के लिए अपनी पत्नी को मेयर बनाना आसान नहीं होगा?
साल 2009 में सहारनपुर नगर निगम बनी है, लेकिन इस बार 32 गांवों को निगम में जोड़ा गया है. 2017 में हुए नगर निगम का चुनाव सात लाख 54 हजार की आबादी पर हुआ था, जिसमें पांच लाख चार हजार वोट थे. इस बार 32 गांव के जुड़ने से करीब साढ़े आठ लाख की आबादी और छह लाख वोटों पर चुनाव लड़ा जाएगा. परिसीमन में 32 गांवों के जुड़ने से सियासी समीकरण पूरी तरह से बदल गए हैं.
सहारनपुर नगर में मुस्लिम वोटर पौने दो लाख के करीब है तो साढ़े तीन लाख हिंदू और 50 हजार अन्य अल्पसंख्यक वोटर हैं, जिनमें जैन और सिख समुदाय के है. हिंदुओं में ब्राह्मण 58 हजार, वैश्य 45 हजार और 20 हजार के करीब दलित मतदाता हैं. पंजाबी समुदाय के अच्छी खासी आबादी है. इमरान मसूद की सियासी इमेज के चलते उनकी पत्नी को सिर्फ मुस्लिम वोटों का सहारा है जबकि बीजेपी अपनी जीत को हरहाल में बरकरार रखने की कवायद में है.
बीजेपी ने भले ही नगर निगम में अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन इमरान मसूद की पत्नी के उतरने के बाद किसी दमदार नेता को उतारने की तैयारी में है ताकि जीत के सिलसिले को बरकरार रख सके. सपा भी सहारनपुर में मुस्लिम समुदाय के किसी बड़े नेता को चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी में है. माना जा रहा है कि मुस्लिम तेली समुदाय के किसी नेता पर दांव खेल सकती है, क्योंकि मुस्लिमों में इस समुदाय का सबसे ज्यादा वोट है. इसके अलावा कुरैशी समाज का वोट अच्छा खासा है, जो पिछले चुनाव में बसपा को एकमुश्त वोट दिए थे.
सहारनपुर में पांच विधायक बीजेपी के हैं और दो सपा के है तो सांसद बसपा के है. सहारनपुर में इस बार मुस्लिम सियासत करवट ले चुकी है. उमर अली खान और देहात से आशु मलिक ने विधायक बनकर सहारनपुर जिले में मुस्लिम समाज की सरपरस्ती की दावेदारी कर रखी है. इसके अलावा सपा का एक एमएलसी भी मुस्लिम है. वहीं, काजी परिवार से मुस्लिमों का मोहभंग हुआ है. काजी परिवार नोमान मसूद को तीसरी बार हार का मुंह देखना पड़ा तो सपा में शामिल होने के बाद इमरान मसूद का जादू भी नहीं चला.
मुस्लिमों पर कमजोर हुई मसूद की पकड़
पूर्व सांसद काजी रशीद मसूद के निधन के बाद सहारनपुर में मुस्लिमों पर इमरान मसूद की पकड़ कमजोर हुई है जबकि दूसरे मुस्लिम नेता काफी मजबूती से खड़े हुए हैं. सपा प्रमुख अखिलेश यादव सहारनपुर जिले की सियासी नब्ज को समझते हुए इमरान मसूद और उनके साथ आए हुए लोगों को चुनाव लड़ाने के बजाय उनकी जगह पर अपनी पार्टी के वफादार नेताओं को लड़ाया, जो जीतकर विधायक बने. इतना ही नहीं सपा ने इमरान मसूद के बजाय शाहनवाज खान को विधान परिषद भेजा.
मुस्लिम सियासत के 4 बड़े चेहरे सहारनपुर में मुस्लिम सियासत के चार बड़े चेहरे हैं, जिनमें पहला सांसद फजलुर्रहमान, दूसरा सपा विधायक उमर खान, तीसरा नाम आशू मलिक और चौथा नाम एमएलसी शाहनवाज खान हैं. इन्हीं चारों नेताओं के इर्द-गिर्द सहारनपुर की सियासत सिमटी हुई है. ऐसे में इमरान मसूद के पास किसी तरह का सियासी विकल्प नहीं बचा था, जिसके बाद चलते वह अपने सियासी वजूद बचाए रखने के लिए साइकिल से उतरकर हाथी पर सवार हो गए हैं.
सहारनपुर नगर निगम की मेयर सीट पर बसपा ने इमरान मसूद की पत्नी साइमा मसूद को प्रत्याशी बनाया तो पार्टी के दूसरे दावेदार नाराज हो गए हैं. बसपा के टिकट पर 2022 विधानसभा चुनाव लड़ने वाले मनीष अरोड़ा अपनी पत्नी शीतल अरोड़ा के लिए टिकट मांग रही थी, लेकिन फिर से बागी रुख अख्तियार कर सकती है. इसके अलावा परिसीमन के बाद मुस्लिमों की ताकत भी कमजोर पड़ी है, जो इमरान की राह में सबसे बड़ी दिक्कत खड़ी करेगी.
सहारनपुर में दलित समुदाय के साथ भी इमरान मसूद के संबंध कोई खास ठीक नहीं रहे हैं. इसके पीछे एक वजह यह रही है कि इमरान मसूद शुरू से सपा और कांग्रेस की राजनीति करते रहे हैं, जिसके चलते बसपा के दलित वोटर्स के साथ रिश्ते हमेंशा छत्तीस के रहे हैं. यही नहीं इमरान मसूद की कट्टकर छवि के चलते दलित और व्यापारी समुदाय भी उनके साथ नहीं खड़ा होता है. इमरान मसूद की सियासी राह में यही सबसे बड़ी रुकावट बना रहा है, जिसके चलते न लोकसभा और न ही विधानसभा का चुनाव जीत पा रहे हैं.
बीजेपी ने 2022 के चुनाव में 5 सीट सहारनपुर से जीत दर्ज की थी. सहारनपुर जिले में नगर से राजीव गुंबर (पंजाबी), रामपुर मनिहारान से देवेंद्र निम (एससी), देवबंद से बृजेश सिंह (ठाकुर), नकुड़ से मुकेश चौधरी (गुर्जर) और गंगोह से गुर्जर जाति के कीरत सिंह विधायक हैं. नगर निकाय चुनाव को सेमीफाइल मानते हुए बीजेपी लोकसभा का फाइनल मैच खेलने की तैयारी में है. ऐसे में वैश्य, जैन और ब्राह्मण समुदाय में से किसी पर बीजेपी दांव खेल सकती है. कांग्रेस सहारनपुर में कमजोर पड़ी है तो सपा मजबूत हुई है. इस तरह से बीजेपी और सपा की सियासी चक्रव्यूह को भेद पाना इमरान मसूद के लिए आसान नहीं है?
कुबूल अहमद