22 जनवरी 2024 को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में हुई ऐतिहासिक प्राण-प्रतिष्ठा के बाद से रामनगरी अयोध्या आस्था, श्रद्धा और समर्पण का केंद्र बन चुकी है. प्राण-प्रतिष्ठा के अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार दो वर्ष पूर्ण होने पर 22 जनवरी 2026 को अयोध्या को ऐतिहासिक और दिव्य भेंट प्राप्त हुई. पंचधातु से निर्मित 286 किलोग्राम वजनी भव्य कोदंड (धनुष) आज श्रीराम जन्मभूमि मंदिर परिसर में अर्पित किया गया.
इस दिव्य कोदंड को मंदिर निर्माण समिति के महासचिव चंपत राय ने विधि-विधान के साथ स्वीकार किया. इस अवसर पर मंदिर ट्रस्ट से जुड़े पदाधिकारी, संत-महात्मा और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे. कोदंड को देखकर हर कोई इसकी भव्यता, कलात्मकता और दिव्यता से अभिभूत नजर आया.
सनातन जागरण मंच के संतोष कुमार विश्वाल ने बताया कि यह ऐतिहासिक कोदंड 3 जनवरी 2026 को ओडिशा के राउरकेला से भव्य शोभायात्रा के साथ रवाना हुआ था. शोभायात्रा ओडिशा के सभी 30 जिलों से होकर गुजरी. इस दौरान जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा, ढोल-नगाड़ों, जय श्रीराम के जयघोष और भक्ति भाव के साथ कोदंड का स्वागत किया. यह यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गई.
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19 जनवरी को कोदंड पुरी पहुंचा, जहां भगवान जगन्नाथ के दर्शन कराए गए. इसके बाद निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 22 जनवरी को यह ऐतिहासिक कोदंड अयोध्या धाम पहुंचा और प्रभु श्रीराम को समर्पित किया गया. अयोध्या आगमन के दौरान भी श्रद्धालुओं का उत्साह देखने लायक था.
यह कोदंड पंचधातु- सोना, चांदी, एल्युमिनियम, जस्ता और लोहे से निर्मित है. इसकी लंबाई, मजबूती और शिल्पकला इसे विशेष बनाती है. कोदंड के निर्माण में तमिलनाडु के कांचीपुरम की 48 महिला कारीगरों ने करीब आठ महीने तक अथक परिश्रम किया. महिला कारीगरों की इस सहभागिता को नारीशक्ति, समर्पण और भारतीय पारंपरिक शिल्पकला की अद्भुत मिसाल माना जा रहा है.
कोदंड की एक और खास बात यह है कि उस पर भारतीय सेना की वीरता और बलिदान की गाथाओं को कलात्मक रूप से उकेरा गया है. इसमें कारगिल युद्ध सहित कई ऐतिहासिक शौर्य प्रसंगों का चित्रण है. यह कोदंड केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, वीरता और बलिदान का भी संदेश देता है.
मयंक शुक्ला