90 मिनट 'कुछ नहीं' करो और जीतो इनाम! इस देश में होता है ये अनोखा कम्पिटिशन

आज के दौर में, जहां हर कोई स्मार्टफोन और डिजिटल डिवाइस से चिपका रहता है, साउथ कोरिया ने मोबाइल एडिक्शन से छुटकारा दिलाने का अनोखा तरीका तलाशा है. हर साल यहां एक अनोखा कंपिटीशन होता है, जिसे 'स्पेस आउट' कहा जाता है.

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aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 3:38 PM IST

आज के दौर में, जहां हर कोई स्मार्टफोन और डिजिटल डिवाइस से चिपका रहता है, साउथ कोरिया ने मोबाइल एडिक्शन से छुटकारा दिलाने का अनोखा तरीका तलाशा है. हर साल यहां एक अनोखा कंपिटीशन होता है, जिसे 'स्पेस आउट' कहा जाता है.

90 मिनट तक सिर्फ खुद के साथ समय बिताइए
इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले प्रतियोगियों को 90 मिनट तक कुछ नहीं करना होता. जी हां, न कोई बातचीत, न कोई मूवमेंट, और न ही किसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का इस्तेमाल. इस दौरान प्रतियोगियों को बस शांत बैठना होता है और अपने दिल की धड़कनों को कंट्रोल रखना होता है.

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कैसे तय होता है विनर?
'स्पेस आउट' प्रतियोगिता में हार्ट रेट मॉनिटरिंग के आधार पर विजेता चुना जाता है. जिस प्रतियोगी की हार्ट रेट सबसे ज्यादा स्थिर रहती है, वही इस मुकाबले का विजेता बनता है. इस आयोजन का मकसद लोगों को तनाव मुक्त करना और उन्हें डिजिटल दुनिया से थोड़ी राहत देना है.

देखें वायरल वीडियो

क्यों हो रही है यह प्रतियोगिता वायरल?


आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां लोग कुछ पल के लिए भी अपने फोन से दूर नहीं रह पाते, यह प्रतियोगिता लोगों को ध्यान और शांति की ताकत सिखाने का एक जरिया है. इस अनोखे इवेंट की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहे हैं. साथ ही इसे बाकी देशों में भी आयोजित करने की मांग कर रहे हैं.


कोरिया में क्यों पड़ रही है ऐसे इवेंट की जरूरत

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साउथ कोरिया अपने टफ वर्क कल्चर के लिए जाना जाता है, जहां विकसित देशों में सबसे लंबे कामकाजी घंटे देखे जाते हैं. 2023 में, सरकार ने साप्ताहिक कार्य समय की सीमा को बढ़ाकर 69 घंटे करने का प्रस्ताव रखा, जिससे भारी विरोध हुआ और आखिरकार सरकार को अपने फैसले से पीछे हटना पड़ा.

ऐसे में लोकल कलाकार वू सूप ने जिंदगी को एक दूसरे नजरिये से देखने के लिए इस इवेंट की जरूरत महसूस की. 2014 में इसकी शुरुआत हुई. तब से हर साल बड़े पैमाने पर यह इवेंट आयोजित किया जाता है. कोरिया के एक सरकारी सर्वे में 19 से 34 साल के युवाओं को शामिल किया गया, जिसमें पाया गया कि हर तीन में से एक युवा ने पिछले साल बर्नआउट का अनुभव किया. इसके पीछे के कारणों में करियर को लेकर चिंता 37.6%, काम का अत्यधिक दबाव 21.1%, काम के प्रति निराशा 14.0% और काम-काज और जीवन के बीच असंतुलन 12.4% बताया गया.

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