मोहब्बत में दग़ा की थी, सो काफ़िर थे, सो काफ़िर हैं… ये पंक्तियां जब बनारस के घाटों पर रात के सन्नाटे में गूंजीं, तो लगा जैसे वक्त कुछ पल के लिए थम गया हो. सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेज़ी से वायरल हो रहा है, जिसमें बनारस के मशहूर घाट पर आधी रात करीब 2 बजे, कुछ पंडित शांति से बैठकर यह ग़ज़ल गा रहे हैं. चारों ओर फैला अंधेरा, गंगा की हल्की लहरों की आवाज़, दूर जलते दीप और उनके बीच गूंजती दर्द भरी पंक्तिया… यह नज़ारा किसी फिल्मी सीन से कम नहीं लगता. वीडियो में दिखता है कि पुजारी पूरी तन्मयता से गा रहे हैं- न कोई मंच है, न माइक, न भीड़ का शोर. बस सुर हैं, शब्द हैं और वो एहसास, जो सीधे दिल को छू जाता है.
सुनने वाला खुद को रोक नहीं पाया
“मोहब्बत में दग़ा की थी…” जैसे ही ये लाइन आती है, सुनने वाला खुद को रोक नहीं पाता. यह सिर्फ एक नगमा नहीं, बल्कि टूटे भरोसे, अधूरी मोहब्बत और ज़िंदगी के तजुर्बों की आवाज़ बन जाता है. इस गाने की खास बात सिर्फ इसके बोल नहीं हैं, बल्कि इसका माहौल है. आधी रात का बनारस, जहां दिन में चहल-पहल रहती है, वहीं रात में घाटों पर एक अलग ही सुकून उतर आता है. उसी सुकून में जब यह दर्द भरा गीत गूंजता है, तो हर सुनने वाला खुद को उससे जोड़ लेता है.
सोशल मीडिया यूज़र्स इस वीडियो पर जमकर प्रतिक्रिया दे रहे है. कोई लिख रहा है,-“ये बनारस है, यहां दर्द भी इबादत बन जाता है.” तो कोई कहता है, “ये गाना नहीं, टूटे दिल की आरती है. ”कई लोगों ने माना कि इस वीडियो ने उन्हें उनकी पुरानी मोहब्बत की याद दिला दी. priyamalviya नाम के यूजर ने इस वीडियो को इंस्टाग्राम पर शेयर किया है.
सोशल मीडिया पर रील्स वायरल
कुछ यूज़र्स ने यह भी लिखा कि बनारस ही ऐसा शहर है, जहां धर्म, संगीत, दर्द और मोहब्बत- सब एक साथ सांस लेते हैं. यहां पुजारी सिर्फ मंत्र नहीं पढ़ते, बल्कि जब गाते हैं, तो ग़ज़ल भी इबादत लगने लगती है. यह वीडियो अब सिर्फ एक गाना नहीं रहा, बल्कि एक एहसास बन चुका है- जो बताता है कि मोहब्बत में धोखा मिले या ज़िंदगी में दर्द, बनारस की रातें उसे भी अपने आंचल में समेट लेती हैं. एक यूजर ने लिखा- कह सकते हैं कि यह वायरल वीडियो हमें याद दिलाता है कि बनारस सिर्फ घाटों और मंदिरों का शहर नहीं है, बल्कि जज़्बातों, टूटे दिलों और सच्चे सुरों का भी शहर है.
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