बिहार में कोरोना के साथ-साथ चमकी बुखार यानी एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) ने भी दस्तक देनी शुरू कर दी है. मंगलवार को दो जुड़वा बहनों की मौत के बाद इस साल मौत का आंकड़ा बढ़कर 3 हो गया है जबकि बिहार में कोरोना वायरस से मौत की संख्या अभी तक 2 है. पिछले साल बच्चों की मौत से जिस प्रकार हाहाकार मचा था उसको देखते हुए बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग के हाथ-पांव फूले हुए हैं. हांलाकि आमतौर पर बिहार में चमकी-बुखार से मौतों का सिलसिला मई के अंत से शुरू होता है लेकिन इस बार ये अप्रैल में ही शुरू हो गया है.
तमाम कोशिशों के बावजूद पिछले 15 वर्षों में अभी तक विशेषज्ञ ये पता नहीं लगा पाये हैं कि चमकी-बुखार होता क्यों है? सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने इसकी रोकथाम और इलाज के पुख्ता इंतजाम किए हैं. लेकिन यह कितना कारगर साबित होगा ये कह पाना अभी मुश्किल है. डीएम चंद्रशेखर सिंह ने चिंता जताते हुए कहा, 'इलाके में रह-रह कर बारिश हो रही है जिसकी वजह से तापमान काफी कम है. इसके बाद भी चमकी बुखार से पीड़ित बच्चे अस्पताल पहुंच रहे हैं जोकि काफी चितांजनक है. प्रशासन की तरफ से बचाव कार्य किए जा रहे हैं'.
मुजफ्फरपुर का श्रीकृष्ण मेडिकल कालेज अस्पताल पिछले साल बच्चों की मौत का दर्द झेल चुका है. यहां पिछले साल 111 बच्चों की मौत हुई थी और इस साल ये सिलसिला अभी से ही शुरू हो गया है. सरकार अपनी तरफ से जागरुकता फैलाने का पूरा प्रयास कर रही है. जैसे कोरोना से बचने के लिए लॉकडाउन हथियार है उसी तरह से चमकी-बुखार से बचने का हथियार है 'जागरुकता'. क्योंकि किसी को पता नहीं है कि ये बीमारी बच्चों में होती क्यों है?
बताया जा रहा है कि बच्चों की इस बीमारी से बिहार के 22 जिले प्रभावित हैं लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित मुजफ्फरपुर जिला है. मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी चन्द्रशेखर ने चमकी-बुखार से बच्चों की मौत को रोकने के लिए किए गए उपायों के बारे में बताया. उनका कहना है कि बिहार को कोरोना के साथ-साथ चमकी-बुखार की भी दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ेगी. कोरोना वायरस की हमें जानकारी है कि यह एक वायरस से होता है लेकिन पिछले 15 सालों से विशेषज्ञ ये पता नहीं कर पाये हैं कि आखिर चमकी-बुखार बच्चों में क्यों होता है. इसलिए हमें सावधानी बरतनी होगी. (फोटो-india today)
डायग्नोस्टिक डॉक्टर प्रभात रंजन ने बताया पिछले कई सालों से लगातार इस पर रिसर्च चल रही है. कई लोगों के अपने-अपने तर्क हैं, कोई इसका कारण कुपोषण बताता है तो कोई लीची (फल) लेकिन अभी तक कोई भी रिसर्च सही नहीं हुई है. क्योंकि इस बीमारी में देखा गया है कि एक ही घर में एक बच्चे को ये बीमारी होती है और दूसरे को नहीं, ऐसे में विशेषज्ञ भी हैरान हैं.
बहरहाल, सरकार अपने स्तर पर इसे रोकने के लिए जागरूकता फैलाने का काम करती है और पिछले साल के अनुभवों को देखते हुए इस बार मुजफ्फरपुर के 196 गांवों को जिले के अधिकारियों ने गोद लिया है जहां वो उन गांवों पर पल-पल की नजर रखेंगे. माना जाता है कि समय पर उचित इलाज मिल जाने से बच्चों की जान बच जाती है. इसी को देखते हुए तमाम आशा कार्यकर्ताओं और सरकार ने अपने अन्य विभागों के कर्मचारियों को इस पर नजर रखने तथा हर गांव के आसपास एम्बुलेंस की उपलब्धता को रखने का निर्देश दिया था. (फोटो-india today)
आरोप है कि पिछले साल लोकसभा चुनाव की वजह से सरकार की तरफ से जागरूकता फैलाने में कोताही हुई थी जिसकी वजह से काफी संख्या में बच्चों की जान चली गई थी. लेकिन इस बार सरकार कोई कसर नही छोड़ना चाहती है पर अब कोरोना वायरस का प्रकोप होने से दोनों बीमारियों की तरफ ध्यान देना पड़ेगा.