124 साल से बिना सिग्नल चलती है ये ट्रेन, मुसाफिरों को देख खुद रुक जाती है

आज के बुलेट ट्रेन और हाई-स्पीड वंदे भारत के दौर में भी उत्तर प्रदेश के एक कोने में समय जैसे ठहर सा गया है. जालौन जिले में एक ऐसी ट्रेन चलती है जिसके नियम रेलवे की किसी किताब में नहीं मिलते.

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1902 में शुरू हुई यह तीन डिब्बों वाली ऐतिहासिक शटल (Photo: indiarailinfo.com) 1902 में शुरू हुई यह तीन डिब्बों वाली ऐतिहासिक शटल (Photo: indiarailinfo.com)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 06 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:26 AM IST

आज के डिजिटल युग में हम बुलेट ट्रेन के सपने देख रहे हैं और हाई-स्पीड वंदे भारत जैसी ट्रेनें पटरियों पर बिजली की रफ्तार से दौड़ रही हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में एक ऐसी ट्रेन भी है जो घड़ी की सुइयों से नहीं, बल्कि मुसाफिरों की सहूलियत से चलती है. जालौन जिले में दौड़ने वाली यह ट्रेन अपनी रफ्तार के लिए नहीं, बल्कि अपने 'बड़े दिल' के लिए मशहूर है.

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यह शायद देश की इकलौती ऐसी ट्रेन है जिसे पकड़ने के लिए आपको स्टेशन भागने की जरूरत नहीं, बल्कि पटरी के किनारे खड़े होकर बस हाथ हिला देना ही काफी है. जज्बातों की पटरी पर दौड़ती यह अनोखी कहानी है एट-कोंच शटल की, जिसे स्थानीय लोग एक सदी से भी ज्यादा समय से प्यार से 'अददा' बुलाते हैं.

जालौन के एट जंक्शन से कोंच के बीच चलने वाली इस ट्रेन का इतिहास 124 साल पुराना है. साल 1902 में अंग्रेजों ने इस 13 किलोमीटर लंबे छोटे से रूट की शुरुआत की थी. ताज्जुब की बात यह है कि एक शताब्दी बीत जाने के बाद भी इस ट्रेन का मिजाज नहीं बदला. पहले भी इसमें तीन डिब्बे थे और आज भी यह उन्हीं तीन डिब्बों के साथ अपनी मंजिल तय करती है. यहां न तो सिग्नल की हड़बड़ी है और न ही ट्रेन छूट जाने का कोई तनाव. इस शटल का इंजन आज भी रेलवे के उस शुरुआती दौर की याद दिलाता है, जहां सफर सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं, बल्कि एक अनुभव होता था.

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नियम नहीं, इंसानियत चलती है

आमतौर पर ट्रेन को बीच रास्ते में रोकने के लिए चेन खींचनी पड़ती है, जिसके बाद कानूनी कार्रवाई का डर रहता है. लेकिन एट-कोंच शटल के नियम पूरी तरह से मानवीय हैं. अगर ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ चुकी है और कोई मुसाफिर दूर से दौड़ता हुआ आ रहा है, तो गार्ड तुरंत लोको पायलट को इशारा कर देता है. ड्राइवर भी बिना किसी हिचकिचाहट के ट्रेन की स्पीड इतनी कम कर देता है कि मुसाफिर सुरक्षित तरीके से डिब्बे में सवार हो सके. पटरी किनारे रहने वाले लोगों के लिए तो यह ट्रेन किसी बस की तरह है, जहां हाथ का इशारा ही 'इमरजेंसी ब्रेक' बन जाता है.

यह ट्रेन लगभग 30 किलोमीटर प्रति घंटे की धीमी रफ्तार से चलती है और महज 13 किलोमीटर की दूरी तय करने में करीब 40 मिनट का समय लेती है. कोंच से एट जंक्शन तक का यह छोटा सा सफर यहां के किसानों, छात्रों और छोटे व्यापारियों के लिए किसी 'लाइफलाइन' से कम नहीं है. एट जंक्शन झांसी-कानपुर रेलमार्ग पर स्थित है, जहां से देश के बड़े शहरों के लिए गाड़ियां मिलती हैं. कोंच के लोगों के लिए मुख्यधारा से जुड़ने का सबसे आसान और सस्ता जरिया आज भी यही 'अददा' ट्रेन है.

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बुलेट ट्रेन के युग में 'अददा' की अहमियत

जहां दुनिया रफ़्तार के पीछे भाग रही है, वहां यह शटल सिखाती है कि सफर में अपनों का साथ देना कितना जरूरी है. इस ट्रेन के चालक और गार्ड अपने मुसाफिरों को सिर्फ यात्री नहीं, बल्कि अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं. यही वजह है कि कोंच-एट शटल आज भी उसी मोहब्बत और भरोसे के साथ पटरियों पर दौड़ रही है. तकनीक और आधुनिकता के इस दौर में यह ट्रेन अपनी पुरानी सादगी और क्षेत्रीय पहचान के दम पर बुंदेलखंड के गौरव का हिस्सा बनी हुई है.
 

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