भारतीय रेलवे की पटरियों पर आपने नीली, लाल और सफेद रंग की कई ट्रेनें दौड़ती देखी होंगी. अक्सर सफर के दौरान हमारी नजर एक ऐसी ट्रेन पर पड़ती है, जो देखने में तो बिल्कुल आम पैसेंजर ट्रेन जैसी लगती है, लेकिन उसे करीब से देखने पर पता चलता है कि उसमें न तो कोई खिड़की है और न ही कोई दरवाजा. ऐसी ट्रेन को देखकर मन में सवाल उठना लाजमी है कि आखिर इस 'बंद डिब्बे' वाली ट्रेन का राज क्या है? कई लोगों को लगता है कि शायद इसमें कोई खुफिया सामान या सेना का गुप्त साजो-सामान जा रहा होगा, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग और काफी दिलचस्प है. पटरियों पर दौड़ती इस अनोखी ट्रेन की पूरी कहानी जान लीजिए...
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रिटायरमेंट के बाद भी रेलवे को मालामाल कर रही हैं ये बोगियां
जिन ट्रेनों के डिब्बे पूरी तरह सील नजर आते हैं, उन्हें रेलवे की भाषा में NMG यानी 'न्यू मॉडिफाइड गुड्स' (New Modified Goods) ट्रेन कहा जाता है. यह रेलवे का एक ऐसा शानदार जुगाड़ है, जिसमें उन पैसेंजर कोच का इस्तेमाल किया जाता है जो अपनी उम्र पूरी कर चुके होते हैं और यात्रियों के बैठने लायक नहीं रहते. इन कोचों को कबाड़ में फेंकने के बजाय रेलवे इन्हें नया अवतार दे देता है.
एक पैसेंजर डिब्बे को NMG कोच में बदलने के बाद उसे अगले 5 से 10 साल तक माल ढोने के काम में लाया जाता है. इसके अलावा, इन्हें तैयार करने के लिए डिब्बे के अंदर की सभी सीटें, पंखे और लाइटें निकाल दी जाती हैं ताकि अंदर ज्यादा से ज्यादा जगह बन सके.
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सुरक्षा और सुविधा के लिए बंद कर दी जाती हैं खिड़कियां
अब सवाल आता है कि आखिर इन ट्रेनों की खिड़कियां और दरवाजे लोहे की पट्टियों से क्यों पैक कर दिए जाते हैं? दरअसल, इन ट्रेनों का इस्तेमाल मुख्य रूप से नई कारों, मिनी ट्रकों, ट्रैक्टरों और जीप जैसे कीमती ऑटोमोबाइल सामानों को एक शहर से दूसरे शहर पहुंचाने के लिए किया जाता है. खिड़कियां बंद होने की वजह से सामान पूरी तरह सुरक्षित रहता है और बाहर से कोई भी व्यक्ति इनसे छेड़छाड़ नहीं कर सकता. इतना ही नहीं, डिब्बे के पिछले हिस्से में एक बड़ा दरवाजा लगा दिया जाता है, जिससे गाड़ियों को अंदर चढ़ाने और उतारने में काफी आसानी होती है. इसके अलावा, डिब्बे को और भी मजबूत बनाने के लिए लोहे की अतिरिक्त पट्टियां लगाई जाती हैं, जिससे यह एक चलते-फिरते सुरक्षित गोदाम की तरह बन जाता है.
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