मणिकर्णिका की जलती चिताएं डराती नहीं, जिंदगी का फलसफा सिखाती हैं

बनारस की तंग और खामोश गलियों के बीच एक ऐसी 'अंतिम गली' है, जहां पहुंचते ही जिंदगी और मौत का फासला धुंधला पड़ जाता है. काशी की आत्मा कहे जाने वाले इस घाट पर चौबीसों घंटे जलती चिताएं इंसान को डराती नहीं, बल्कि जीवन के सच से रूबरू कराती हैं.

Advertisement
गंगा की लहरों के बीच अंतिम विदाई का अहसास (Photo: Pexels) गंगा की लहरों के बीच अंतिम विदाई का अहसास (Photo: Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 20 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:29 PM IST

जब आप बनारस की तंग और घुमावदार गलियों में कदम रखते हैं, तो एक समय ऐसा आता है जब दुनिया का शोर पीछे छूट जाता है और हवा में एक अजीब सी भारीपन वाली शांति घुलने लगती है. यह उस 'अंतिम गली' की शुरुआत है, जहां दुनिया के सारे ठाट-बाट और दिखावे धुआं बनकर गंगा की लहरों में विलीन हो जाते हैं. काशी की आत्मा कहे जाने वाले मणिकर्णिका घाट को लेकर इन दिनों भले ही राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर बहस छिड़ी हो, लेकिन यहां आने वाले मुसाफिर के लिए यह जगह किसी विवाद से कहीं ऊपर, जीवन के सबसे बड़े ट्रैवल एक्सपीरियंस जैसी है. यह वह मोड़ है जहां पहुंचकर हर यात्री को एहसास होता है कि सफर सिर्फ रास्तों का नहीं, बल्कि खुद को पहचानने का भी होता है.

Advertisement

कहते हैं कि दुनिया का हर इंसान अपने भीतर एक ऐसी खामोश कहानी लेकर चलता है, जिसे वह चाहकर भी ज़ुबान पर नहीं ला पाता. मणिकर्णिका की ओर ले जाने वाली गलियां उन लाखों लोगों की गवाह हैं, जो मुस्कुराते तो हैं, लेकिन उनके भीतर एक हिस्सा टूटा हुआ होता है. जब कोई अपना हाथ छुड़ाकर चला जाता है, तो इंसान अक्सर उन सवालों के जवाब ढूंढने काशी की इन गलियों में निकल पड़ता है.

यहां जलती चिताओं के बीच बैठकर जब कोई शांत होकर गंगा को देखता है, तो उसे समझ आता है कि जो हिस्सा टूट गया था, वह भी इस बड़े ब्रह्मांड के चक्र का एक हिस्सा है. यहीं से अकेले चलने का साहस और जिंदगी-मौत के बीच के फासले का असली ज्ञान शुरू होता है.

यह भी पढ़ें: साल में सिर्फ 2 दिन खुलता है यह 'रहस्यमयी' राजदरबार, बसंत पंचमी पर आप भी करें दर्शन!

Advertisement

महाश्मशान का भूगोल 

वारणसी को दुनिया के सबसे प्राचीन जीवित शहरों में गिना जाता है, जो धर्म, संस्कृति और मोक्ष का केंद्र है. काशी की इस नगरी में वैसे तो करीब 88 घाट हैं, जहां सुबह की आरती और शाम के दीपदान का सौंदर्य देखते ही बनता है. लेकिन इन सबके बीच मणिकर्णिका घाट एक ऐसी पहेली है, जो सृजन और विध्वंस को एक साथ दिखाती है. यह महज एक घाट नहीं, बल्कि वह महाश्मशान है, जहां 24 घंटे चिताएं जलती रहती हैं. हिंदू धर्म में सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार वर्जित है, लेकिन मणिकर्णिका पर यह नियम लागू नहीं होता, यहां आग कभी ठंडी नहीं होती.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव ने इस स्थान को 'अनंत शांति' का वरदान दिया था. कहा जाता है कि जब प्रलय आएगी, तब भी काशी का यह हिस्सा नष्ट नहीं होगा. यही वजह है कि मोक्ष की चाह रखने वाला हर हिंदू यहां अपनी अंतिम यात्रा पूरी करने की इच्छा रखता है. यहां का वातावरण आपको डराता नहीं, बल्कि यह सिखाता है कि मौत भी जीवन का एक अनिवार्य और शांत हिस्सा है.

यह भी पढ़ें: विदेशी धरती पर 'मिनी इंडिया', इन देशों में भी गूंजता है 'जय श्री राम', मंदिर देख लगेगा भारत में हैं आप

Advertisement

अगर आप इस 'अंतिम गली' के रूहानी अनुभव को करीब से देखना चाहते हैं, तो यहां पहुंचने के मुख्य रूप से दो तरीके हैं. सबसे खूबसूरत और रोमांचक रास्ता गंगा की नाव सवारी है. आप बनारस के किसी भी घाट से नाव लेकर मणिकर्णिका पहुंच सकते हैं. शेयरिंग बोट की सुविधा भी उपलब्ध है, जिसमें आप कम किराए में लहरों के बीच से इस घाट का विहंगम दृश्य देख सकते हैं. जहां दूर से आता धुएं का गुबार और मंत्रों की गूंज एक अलग ही एहसास कराती है.

दूसरा तरीका पैदल यात्रा का है. यदि आप काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन करने जा रहे हैं, तो मुख्य द्वार संख्या-4 के पास ही 'मणिकर्णिका द्वार' स्थित है. यहां से आप सीधे घाट की ओर जा सकते हैं. इसके अलावा, बनारस के सभी घाट आपस में जुड़े हुए हैं, इसलिए आप घाटों के किनारे-किनारे पैदल भी यहां पहुंच सकते हैं. हालांकि, अस्सी घाट से मणिकर्णिका की दूरी काफी अधिक है, इसलिए नाव या मंदिर मार्ग को चुनना ज्यादा आसान और समय बचाने वाला रहता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement