बिहार में वाइस चांसलरों पर गाज

धारणा और सचाई में कितना अंतर है यह 7 दिसंबर को उस समय साफ जाहिर हो गया जब पटना हाइकोर्ट ने राज्यपाल देवानंद कोनवार के चांसलर के अपने अधिकार के तहत नियुक्त किए गए छह वाइस चांसलर और चार प्रो-वाइस चांसलर की नियुक्ति रद्द कर दी.

Advertisement

अमिताभ श्रीवास्तव

  • पटना,
  • 23 दिसंबर 2012,
  • अपडेटेड 2:18 PM IST

धारणा और सचाई में कितना अंतर है यह 7 दिसंबर को उस समय साफ जाहिर हो गया जब पटना हाइकोर्ट ने राज्यपाल देवानंद कोनवार के चांसलर के अपने अधिकार के तहत नियुक्त किए गए छह वाइस चांसलर और चार प्रो-वाइस चांसलर की नियुक्ति रद्द कर दी.

चीफ  जस्टिस रेखा एम. दोषित और जस्टिस ए. अमानुल्ला की खंडपीठ ने ये नियुक्तियां इसलिए रद्द कर दीं क्योंकि गवर्नर कोनवार ने इन पदों को भरने से पहले राज्य सरकार से सलाह लेने की अनिवार्य प्रक्रिया पूरी नहीं की थी. कोर्ट ने आरा के वीर कुंअर सिंह विश्वविद्यालय के एक शिक्षक राम तवक्या सिंह की जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया.

Advertisement

गवर्नर को मिला न्यायिक आदेश तात्कालिक रूप से उनकी छवि को धूमिल करने वाला है, लेकिन यह हार सिर्फ ह्नणिक है और गवर्नर कोनवार के मामले तक ही सीमित लग रही है क्योंकि इससे राज्य सरकार की तुलना में गवर्नर की स्थिति और मजबूत हुई है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है, ''अपने चुने हुए लोगों को वाइस-चांसलर और प्रो वाइस-चांसलर पद पर नियुक्त करने से पहले चांसलर को राज्य सरकार की राय लेनी चाहिए. राज्य सरकार की राय को चांसलर मंजूर या नामंजूर कर सकता है. ''

यदि आदेश को पढ़ा जाए तो ऐसा लगता है कि कुल मिलाकर असर यह हुआ है कि गवर्नर को शॉर्ट टर्म के नुकसान के बदले लांग टर्म के लिए फायदा ही हुआ है. इसलिए अचरज की बात नहीं है कि हाइकोर्ट में अपनी नियुक्तियां खारिज होने के बाद भी गवर्नर इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की कोई इच्छा नहीं दिखा रहे क्योंकि इससे नियुक्तियों के मामले में उनके वर्चस्व की फिर से पुष्टि हो गई है. इस आदेश से यह बात भी साबित हो गई है कि 'सर्वोच्च अथॉरिटी' होने के नाते चांसलर का फैसला अंतिम होना चाहिए. आखिर गवर्नर कोनवार कोर्ट के फैसले से इससे बेहतर क्या हासिल कर सकते थे, जिसे शुरू में हर कोई उनके खिलाफ मान रहा था.

Advertisement

यह आदेश राज्य सरकार को भी इस बात के लिए मजबूर कर सकता है कि वह बिहार राज्य विश्वविद्यालय ऐक्ट और पटना विश्वविद्यालय ऐक्ट 1976 की अपने तरीके से व्याख्या करना छोड़ दे. इससे पहले जनवरी, 2011 में राज्य के मानव संसाधन विभाग ने एकतरफा तरीके से 12 नामों की सूची बनाकर चांसलर को भेज दी थी कि वे इसी सुझई गई सूची में से वाइस-चासंलर की नियुक्ति करें.

राज्यपाल ने जाहिर तौर से राज्य सरकार की नामों की इस सूची को कचरे के डिब्बे में डाल दिया और 1 अगस्त, 2011 को अपनी पसंद के छह वीसी और चार प्रो-वीसी की नियुक्ति कर दी. बताया जाता है कि राज्यपाल ने वाइस चांसलर की नियुक्ति के मामले में राज्य सरकार के सिफारिश करने पर कड़ा ऐतराज जताया था.

गुवाहाटी हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में एक दशक से ज्यादा समय तक लॉ की प्रैक्टिस के अनुभव के साथ श्रेष्ठ कानूनी दिमाग रखने वाले गवर्नर कोनवार ने लगता है कि आदेश की बारीकियों का विश्लेषण कर लिया है. इसी वजह से शायद उन्होंने छह वाइस चांसलर को अगले आदेश तक काम करते रहने की इजाजत दी है. कोर्ट ने छह वीसी और चार प्रो-वीसी के पदों को भरने के लिए 30 दिन के भीतर नई नियुक्तियों के लिए निर्देश भी जारी कर दिए हैं.

Advertisement

जिन वीसी को 'अगले आदेश तक' अपने पद पर बने रहने को कहा गया है उनमें पटना विवि के शंभूनाथ सिंह, बी.आर. आंबेडकर बिहार विवि (मुजफ्फरपुर) के विमल कुमार, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विवि के अरविंद कुमार पांडे, जेपी विवि, छपरा के राम विनोद सिंह, बीएन मंडल विवि, मधेपुरा के अरुण कुमार और मजहरुल हक अरबी-फारसी विवि के शम्सुज्जुहा शामिल हैं. विमल कुमार और अरुण कुमार के पास क्रमश: टी.एम. भागलपुर विवि और मगध विवि, गया की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी है.

हाइकोर्ट के निर्णय से प्रभावित होने वाले चार प्रो-वाइस-चांसलर में से सिर्फ दरभंगा के कुमारेश प्रसाद सिंह को ही अगले आदेश तक काम करते रहने का आदेश दिया गया है. कानून के जानकारों के लिए गवर्नर का अगला कदम देखना दिलचस्प होगा.

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement