“क्या कहा!” मैंने पूछा.
“क्या कहा!” मॉटी ने कहा.
“क्या कहा! क्या कहा!”
“क्या कहा! क्या कहा! क्या कहा!”
इसके बाद ऐसा लगा कि इस बातचीत को आगे बढ़ाना तकरीबन नामुमकिन होगा.
-पी.जी. वुडहाउस, माइ मैन जीव्ज
जून के पहले सप्ताह में जब तीन बड़ी दूरसंचार कंपनियों भारती एयरटेल, वोडाफोन और आइडिया सेलुलर के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों से सूचना-प्रौद्योगिकी पर संसद की स्थायी समिति ने काल ड्रॉप (बीच में कॉल कटने) की वजह जाननी चाही, तो उनकी बातचीत कुछ ऐसी ही थी, जैसा ऊपर के संवाद में दिया गया है. तीनों कंपनियों ने अपनी निवेश योजनाओं और 100 में तीन कॉल ड्रॉप के ट्राइ (भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण) द्वारा तय किए गए पैमाने पर खरा उतरने का भले ही दावा किया हो, लेकिन बीजेपी के नेता लालकृष्ण आडवाणी और विशेष आमंत्रित सदस्य राजीव चंद्रशेखर समेत समूचा पैनल उनके तर्क से संतुष्ट नहीं हुआ. चंद्रशेखर कहते हैं, “मेरे ख्याल से 100 में पांच कॉल ड्रॉप हो रही हैं या शायद उससे ज्यादा. कंपनियों का दावा इन आंकड़ों के लिहाज से बकवास है.”
दूरसंचार के आरंभिक उद्यमियों में एक तथा अब नेता बन चुके राजीव चंद्रशेखर की यह बात उपयोगी तो है लेकिन इसमें कुछ खास नहीं है, क्योंकि यह देश चीन के बाद दुनिया का सबसे बड़ा मोबाइल फोन बाजार है, स्मार्टफोन का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ बाजार है और इसने मोबाइल फोन को महत्वाकांक्षा, विकास और तरक्की के प्रतीक में बदल डाला है. मोबाइल फोन पर बात करते-करते कॉल के कटने का अनुभव ऐसा है जिसकी तस्दीक मुंबई के मर्चेंट बैंकरों से लेकर दिल्ली के वकील, चेन्नै में बैठे सीईओ, पटना के छात्र या फिर इस देश में मोबाइल इस्तेमाल करने वाला कोई भी व्यक्ति कर सकता है. भारत के मोबाइल फोन सेवा प्रदाताओं द्वारा दी जा रही सेवा की गुणवत्ता के बारे में अगर एक पंक्ति कहनी हो तो उन्नीसवीं सदी के ब्रिटिश प्रधानमंत्री बेंजामिन डिजरायली का वह मशहूर वाक्य याद आता है, “झूठ, सफेद झूठ और सिर्फ आंकड़ेबाजी.”
आप इस बारे में मुंबई के 44 वर्षीय मर्चेंट बैंकर राजीव सिंघल (नाम बदला हुआ) से पूछ सकते हैं. यात्रा करते वक्त सिंघल कॉन्फ्रेंस कॉल उठाने से घबराते हैं क्योंकि बातचीत के बीच में ही कॉल ड्रॉप हो जाती है. वे कहते हैं, “यह बड़ी शर्मिंदगी वाली बात है कि आप अपने ग्लोबल सहयोगियों या ग्राहकों से संवाद में होते हैं और बीच में ही फोन कट जाता है. चौतरफा यह लतीफा चल रहा है कि अगर कॉल भारत से है तो उसे बीच में कटना ही है.” इसी वजह से वे ऐसी बातचीत के लिए पुराने लैंडलाइन को इस्तेमाल करना पसंद करते हैं. वे कहते हैं, “लैंडलाइन पर घंटों बातचीत के बाद भी आप परेशान नहीं होते हैं. यह सेहत केलिए भी मुफीद है.”
दिल्ली की 36 वर्षीया पूजा चंद्रा को आठ महीने पहले अपनी कानूनी फर्म सिसेरो में एक रिसेप्शनिस्ट को काम पर रखना पड़ा, जिसका काम हर आने वाली कॉल को उनके दक्षिण दिल्ली स्थित दफ्तर के लैंडलाइन पर भेजना था. वे अपना अनुभव बताती हैं, “आठ महीने पहले हमारे पास लैंडलाइन नहीं थी लेकिन इस इलाके से कई टावर हटा दिए गए हैं, इसलिए कॉल ड्रॉप के बगैर बात करना नामुमकिन हो गया था. इसीलिए मैंने अपने ग्राहकों से कहा कि वे लैंडलाइन पर कॉल किया करें.”
कारोबार उछला, सेवा खस्ताहाल
भारत में 95 करोड़ से ज्यादा मोबाइल फोन कनेक्शन हैं और शुल्क के मामले में भी यह दुनिया के सबसे सस्ते देशों में एक है, फिर भी सेवाओं के मामले में शायद यह सबसे बदतर है जिसे उपभोक्ताओं की शिकायतों से समझा जा सकता है. ट्राइ के आंकड़े समूची तस्वीर की सिर्फ एक झलक देते हैं. मोबाइल सेवा प्रदाताओं की सेवाओं पर ट्राइ की हालिया जांच यानी दिसंबर 2014 की तिमाही के अंत तक का प्रदर्शन बताता है कि देश में मौजूद 2जी के 183 नेटवर्क में सिर्फ 25 यानी हर सात में एक ऐसे हैं जो तीन फीसदी कॉल ड्रॉप की ट्राइ की कसौटी पर खरे नहीं उतरते और जिनके लिए सीधे सेवा प्रदाता को दोष दिया जा सकता है. उद्योग की भाषा में इसे “टीसीएच (ट्रैफिक चैनल) फेल्यर्य्य या “टीसीएच ड्रॉप” कहा जाता है. इसका सीधा-सा मतलब है कि सेवा प्रदाता के पास संपर्क बनाए रखने के लिए तकनीकी दक्षता का अभाव है. यह सिस्टम पर ओवरलोड के चलते हो सकता है या फिर अपर्याप्त बुनियादी ढांचे अथवा तकनीकी गड़बडिय़ों के चलते भी संभव है.
इस ऑडिट के नतीजे हालांकि पिछली तिमाही के नतीजों से मामूली सुधार दिखाते हैं जिसमें ट्राइ की टीसीएच कॉल ड्रॉप की दर 3 फीसदी से कम होने की कसौटी पर खरा न उतरने वाले नेटवर्कों की संख्या कुल 183 2जी नेटवर्कों में 27 थी. ट्राइ का कहना है कि कॉल ड्राप और टीसीएच कन्जेशन के मामले में दिसंबर में समाप्त तिमाही में मोबाइल सेवा प्रदाताओं का प्रदर्शन बेहतर हुआ है. दूसरी ओर जांच में पाया गया कि सेवा के लिए उपलब्ध बेस स्टेशनों की उपलब्धता, अच्छी गुणवत्ता के कनेक्शन और इंटरकनेक्शन कन्जेशन के बिंदु के मामले में कंपनियों का प्रदर्शन पहले से बदतर हुआ है. इसी अवधि में 3जी नेटवर्कों की कॉल ड्राप में फर्क नहीं आया है. देश में मौजूद 94 3जी नेटवर्कों में 15 ऐसे पाए गए यानी हर छह में एक नेटवर्क जहां दोनों तिमाहियों में टीसीएच कॉल ड्राप की दर ट्राइ के तय किए हुए तीन फीसदी से ज्यादा रही.
मुंबई के मेगा सर्किल में नौ में से तीन ऑपरेटर दिसंबर की तिमाही में अपनी कॉल ड्रॉप की दर को तीन फीसदी से नीचे बनाए रखने में नाकाम रहे जबकि दिल्ली में ऐसे दो ऑपरेटर पाए गए. लगातार बढ़ती शिकायतों के कारण अब सरकार ने इस मामले में दखल दिया है और सेवा प्रदाताओं को चेतावनी दी है कि उन्होंने कॉल ड्रॉप की बढ़ती दर को थामने के लिए कुछ नहीं किया तो उनसे रियायतें छीन ली जाएंगी.
इंडिया टुडे से बातचीत में दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कंपनियों की चिंताओं के जवाब में उनसे एक कदम आगे बढ़कर चलने का आह्वान किया. उन्होंने कहा, “कॉल ड्रॉप की गहराती समस्या से निबटने के लिए उन्हें अपना इन्फ्रास्ट्रक्चर दुरुस्त करना होगा. दूरसंचार कंपनियों को इस मामले में और बहुत कुछ काम करना होगा.” ज्यादा स्पेक्ट्रम की नीलामी की संभावना पर उन्होंने कहा कि सरकार ऐसा उसी हालत में करेगी जब उसके पास और स्पेक्ट्रम उपलब्ध होगा और स्पेक्ट्रम की कमी को इन्फ्रास्ट्रक्चर दुरुस्त न करने का बहाना नहीं बनाया जा सकता है.
जानकारों का कहना है कि समस्या की जड़ आंकड़ों के जाल और जटिल सरकारी नीतियों के बीच कहीं फंसी पड़ी है. जानकारों का मानना है कि कॉल ड्रॉप की समस्या को स्वतंत्र रूप से नहीं देखा जा सकता क्योंकि इसके पीछे कई कारक काम कर रहे हैं. इनमें भौतिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के समक्ष खड़ी चुनौतियां, स्पेक्ट्रम का अभाव तथा टेलीकॉम टावरों से विद्युत-चुंबकीय विकिरण से जुड़े मसले शामिल हैं, जिसके चलते लोगों में यह धारणा बनी है कि अपने घरों के आसपास टावर नहीं लगने देने हैं.
भारत में 4,25,000 बेस ट्रांसमिटिंग स्टेशन (बीटीएस) हैं जिन्हें लोकप्रिय भाषा में मोबाइल फोन टावर कहते हैं. माना जाता है कि मोबाइल फोन धारकों की बढ़ती संख्या के लिए इनकी संख्या अपर्याप्त है. परामर्शदाता फर्म डेलॉयट में पार्टनर हेमंत जोशी मानते हैं कि भारत में अगर ध्वनि और डेटा के पारेषण की गुणवत्ता को सुधारना है तो अतिरिक्त दो लाख टावरों की जरूरत होगी. इसके लिए भारी निवेश की दरकार है क्योंकि एक टावर लगाने में 15 से 20 लाख रु. का खर्च आता है. जोशी कहते हैं, “टेलीकॉम कंपनियों के मुनाफे पर वैसे ही भारी चुनौती सामने खड़ी है.” दूरसंचार उद्योग फिलहाल दो लाख करोड़ के कर्ज में डूबा है, क्योंकि दूरसंचार कंपनियों ने अपने विस्तार के लिए बैंकों से काफी कर्ज लिया है. स्पेक्ट्रम में इनका निवेश तो इतना ज्यादा है कि दिमाग को झकझोर देगा.
मार्च में समाप्त हुए स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए दूरसंचार कंपनियों ने सरकार को एक लाख करोड़ रु. का भुगतान किया है. जोशी कहते हैं, “कंपनियों ने 3जी सेवाएं देने के लिए काफी निवेश किया है लेकिन टावरों में उन्हें अभी और निवेश करना बाकी है.” तीसरी पीढ़ी की सेवाएं यानी 3जी, दूसरी पीढ़ी यानी 2जी के मुकाबले डेटा हस्तांतरण की उच्च दर मुहैया कराती हैं लेकिन भारत के कुल मोबाइल उपभोक्ताओं में सिर्फ 9 फीसदी इनके दायरे में आते हैं. यह संख्या भी मामूली नहीं है. भारत में मोबाइल पर इंटरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या 25 करोड़ है जो अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर इसे रखता है और आज ज्यादा से ज्यादा लोग दुनिया से जुड़े रहने के लिए स्मार्टफोन के बाजार का हिस्सा बन रहे हैं. इससे भारत में मोबाइल सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है.
बिजनेस और फाइनेंस परामर्शदाता फर्म ग्रांट थॉर्नटन में पार्टनर राजा लाहिड़ी कहते हैं, “वॉयस की लगातार बढ़ती मांग और अब ई-कॉमर्स, संगीत व मूवी डाउनलोड के तमाम ऐप्लिकेशनों के कारण बढ़ती डेटा की मांग के चलते स्पेक्ट्रम पर दबाव बढ़ता ही जा रहा है. मोबाइल प्रयोक्ताओं की संख्या जहां बहुत तेजी से बढ़ी है, वही प्रति उपभोक्ता औसत शुल्क को भी बढ़ाए जाने की जरूरत है. हालांकि यह मूल्यवर्धित सेवाओं और डेटा के कारण बढ़ ही रहा है जिससे कंपनियों की कमाई बढऩे की संभावनाएं पैदा हुई हैं.”
रेडिएशन का भय
क्या मोबाइल फोन टावरों से होने वाला विकिरण मनुष्यों के लिए नुक्सानदेह है? दुनिया भर के जानकारों का मानना है कि इसके साक्ष्य मौजूद नहीं हैं इसलिए इन टावरों को सुरक्षित माना जाना चाहिए. भय के इस माहौल के आगे घुटने टेकते हुए भारत के मोबाइल फोन सेवा प्रदाताओं ने टावरों से होने वाले विकिरण की दर को वैश्विक पैमाने के दसवें हिस्से तक गिरा दिया है. इसके बावजूद लोगों में डर है जिसके चलते कई हाउसिंग सोसाइटियां अपने यहां इन टावरों को नहीं लगाने देतीं.
म्युनिख स्थित एक संगठन इंटरनेशनल कमिशन फॉर नॉन आयनाइजिंग रेडिएशन (आइसीएनआइआरपी) का काम विकिरण के दुष्प्रभावों पर वैज्ञानिक परामर्श प्रदान करना है. इसके मुताबिक, एक टेलीकॉम टावर से एक सीमित स्थान में ऊर्जा का घनत्व 4,500 मिलिवॉट प्रति वर्ग मीटर का होना चाहिए. भारत में इसके दसवें हिस्से यानी जीएसएम के लिए 450 मिलिवॉट प्रति वर्ग मीटर को अनुमति दी गई है जबकि 3जी और 4जी के लिए 1,000 मिलिवॉट की अनुमति है. जोशी का मानना है कि इतने कठोर नियमन के चलते ही टेलीकॉम सेवा प्रदाता कम टावर लगाते हैं जिसके चलते उनकी क्षमता अपर्याप्त रहती है और कॉल ड्रॉप की समस्या पैदा होती है.
ग्राहकों के मामले में भारत के दूसरे सबसे बड़े दूरसंचार सेवा प्रदाता वोडाफोन के एक प्रवक्ता का कहना है, “विद्युत चुंबकीय विकिरण के भय के कारण हमें शहरी इलाकों में टावर लगाने के लिए जगहें प्राप्त करने में दिक्कत आ रही है.” उनका कहना है कि इस समस्या के समाधान के लिए सरकारी संस्थाओं को जनता तक पहुंचना होगा और उनके बीच विकिरण से सुरक्षा जैसे मसले पर जागरूकता फैलानी होगी.
भारत की सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी एयरटेल ने इस मसले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, हालांकि कंपनी के चेयरमैन सुनील मित्तल ने एक अखबारी साक्षात्कार में जून में कहा था कि कॉल ड्रॉप की समस्या से निबटने के लिए उनकी कंपनी वनवेब नाम के एक वैश्विक कंसोर्शियम में अल्प हिस्सेदारी खरीदने वाली है जो 648 उपग्रहों के माध्यम से ब्रॉडबैंड मुहैया कराता है. इसके तहत छतों पर एक छोटा-सा एंटीना लगाया जाएगा जो उपग्रहों से जुड़ा होगा और 300-400 मीटर के दायरे में एक स्वचालित बेस स्टेशन निर्मित कर देगा जिससे 3जी और 4जी मोबाइल फोन पर कनेक्टिविटी बनी रहेगी.
भारती इंटरप्राइजेज के वाइस चेयरमैन और भारती इन्फ्राटेल के कार्यकारी अध्यक्ष अखिल गुप्ता ने 3 जुलाई को दिल्ली में आयोजित डिजिटल इंडिया कार्यक्रम में सीईओ की गोलमेज बैठक में कहा था, “मैं आश्वस्त हूं कि कॉल ड्रॉप की समस्या का समाधान निकाला जा सकेगा. असल में इससे लोगों से ज्यादा हमें परेशानी होती है.” उन्होंने यह भी कहा था कि उद्योग को इन दुष्प्रचारों का भी सामना करना पड़ रहा है कि टावर से “विकिरण होता है या टावर लगाने के लिए हम सरकारी परिसंपत्तियों” का इस्तेमाल करना चाहते हैं.
कॉल ड्रॉप की समस्या का प्रत्यक्ष प्रमाण अगर बेस ट्रांसमिटिंग स्टेशन हैं तो अदृश्य प्रमाण स्पेक्ट्रम नाम की चीज है. स्पेक्ट्रम वह विद्युत चुंबकीय बैंडविथ या रेडियो तरंगें हैं जिससे मोबाइल फोन की तरंगों का पारेषण होता है. इसके आवंटन पर सरकार का नियंत्रण है और 2जी घोटाले और एनडीए सरकार द्वारा की गई नीलामी ही इस बात का संकेत है कि यह कितना महंगा कुदरती संसाधन है.
दूरसंचार संगठन जीएसएमए के निदेशक संदीप करनवाल कहते हैं कि दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया या मलेशिया जैसे दूसरे देशों के मुकाबले देखें तो भारतीय ऑपरेटरों के पास उपलब्ध स्पेक्ट्रम की मात्रा बेहद कम है. मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में कुछ इलाकों में टावर एक-दूसरे के बेहद करीब होते हैं इसलिए और टावर लगाना नामुमकिन हो जाता है. इसीलिए इकलौता विकल्प यह है कि ऑपरेटरों को दी गई स्पेक्ट्रम की मात्रा को और बढ़ा दिया जाए. जोशी कहते हैं, “ऐसे वक्त में जब दुनिया 5जी जैसी नई तकनीक की ओर मुड़ रही है, भारतीय दूरसंचार उद्योग अब भी आवश्यक निवेश का जुगाड़ करने के लिए ही संघर्ष कर रहा है.” वे बताते हैं कि दुनिया की गति की बराबरी करने के लिए भारतीय दूरसंचार उद्योग को 6 लाख करोड़ रु. से ज्यादा का निवेश चाहिए.
भरी तिजोरी, संकरा बैंड
स्पेक्ट्रम के मामले में दूरसंचार ऑपरेटरों के दावे को चुनौती देते हुए सरकार ने उन्हें पीछे धकेलने का काम किया है. सीईओ की गोलमेज बैठक में दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कड़े शब्दों में कहा कि कंपनियों के पास बिना किसी रुकावट के फोन सेवाएं प्रदान करने के लिए पर्याप्त स्पेक्ट्रम मौजूद हैं इसलिए उन्हें अपने तंत्र को दुरुस्त करने की जरूरत है. सूचना-प्रौद्योगिकी पर संसदीय समिति की बैठक के दस दिन बाद आई इस चेतावनी को कंपनियों ने सहजता से नहीं लिया है.
इंडिया टुडे से बातचीत करने वाले ऑपरेटरों ने मंत्री के कहे को चुनौती देते हुए अंतरराष्ट्रीय मानकों से यहां की तुलना की. उनका दावा है कि वैश्विक औसत 50 मेगाहर्ट्ज का है जबकि भारत के ऑपरेटर 10.5 मेगाहर्ट्ज के स्पेक्ट्रम से काम चलाते हैं. यूरोप में यह 65 मेगाहर्ट्ज, एशिया में 45 मेगाहर्ट्ज और अफ्रीका में 28 मेगाहर्ट्ज है. मसलन, शंघाई में उपलब्ध स्पेक्ट्रम दिल्ली के मुकाबले ढाई गुना है, हालांकि दोनों ही शहर अपने आकार और आबादी के घनत्व के मामले में लगभग समान हैं. भारती एयरटेल के एक अध्ययन के मुताबिक, दिल्ली के नेटवर्क पर शंघाई के मुकाबले 23 गुना ज्यादा भार है. भारती एयरटेल के नेटवर्क पर व्यस्त घंटों के दौरान एक घंटे में एक साथ डेढ़ लाख कॉल आती हैं&कंपनियों के मुताबिक, सबसे व्यस्त घंटे सुबह के आठ से दस के बीच होते हैं. कंपनियों की शिकायत है कि 2015 की नीलामी में 3जी ऑपरेटरों के लिए सिर्फ 5 मेगाहर्ट्ज की नीलामी की गई थी.
सरकार के भीतर सोच यह है कि स्पेक्ट्रम के कई उपयोग होते हैं इसलिए अकेले दूरसंचार कंपनियां उसकी उपभोक्ता नहीं हो सकतीं और इसीलिए इसका बंटवारा रक्षा, रेलवे, अंतरिक्ष विभाग और सार्वजनिक उपक्रमों समेत अन्य के बीच किया जाता है. चंद्रशेखर बताते हैं, “सरकार की रणनीति यह है कि प्रतिस्पर्धा पैदा की जाए और नीलामियों के माध्यम से स्पेक्ट्रम से पैसा बनाया जाए. सरकार चाहती है कि हर कोई स्पेक्ट्रम का समुचित उपयोग करे. यह असीम नहीं है. आपको बेहतर सेवाओं के लिए नवाचार करना होगा और उन्हें प्रदान कराना होगा&सार्वजनिक नीति का वैध उद्देश्य यही है.”
मामले को बदतर बनाने का काम टेनेंसी अनुपात कर रहा है. यह ऑपरेटरों की संख्या है जिन्होंने प्रति टावर अपने एंटीना लगा रखे हैं. यह संख्या 2014-15 के 1.77 से बढ़कर 2020 तक 2.48 पर पहुंच जाएगी, जैसा कि डेलॉयट की एक रिपोर्ट का कहना है. इसकी मुख्य वजह डेटा का बढ़ता इस्तेमाल है. माना जा रहा है कि 2जी, 3जी और 4जी टेनेंट की संख्या 2020 तक 12,68,000 हो जाएगी, हालांकि इसके मुकाबले टावरों के बढऩे की दर धीमी रहेगी. रिपोर्ट कहती है कि 2020 तक कुल टावरों की संख्या 5,11,000 रहेगी. डेलॉयट इंडिया के सीनियर डायरेक्टर रजत बनर्जी कहते हैं, “भारत डेटा क्रांति के मुहाने पर खड़ा है, लिहाजा यहां टावर उद्योग के भविष्य की ओर देखने का यह सही वक्त है. देश में लोगों के बीच स्मार्टफोन के बढ़ते उपयोग के कारण डेटा गुणात्मक गति से वृद्धि करेगा जिसके लिए अतिरिक्त डेटा स्थलों की पर्याप्त संख्या की जरूरत होगी.”
डेलॉयट का अध्ययन कहता है कि ऑपरेटर अब 4जी नेटवर्क चालू कर के अपनी नेटवर्क कवरेज का विस्तार कर रहे हैं और अपनी 3जी उपस्थिति को भी बढ़ा रहे हैं. बढ़ते डेटा उपयोग से संचालित कवरेज के कारण माना जा रहा है कि अकेले डेटा सेवाओं के लिए खड़े किए जाने वाले स्वतंत्र टावरों में साल दर साल चक्रवृद्धि दर 2020 तक 125 फीसदी की रहेगी जबकि अन्य टावर अगले पांच साल तक 1.89 फीसदी की दर से बढ़ेंगे. फिलहाल सिर्फ 3जी और 4जी के लिए स्वतंत्र टावरों की संख्या करीब 700 है.
वॉयस उपयोग की वृद्धि में आई गिरावट से यह आशंका भी सामने आ रही है कि कहीं स्वतंत्र टावरों के कारोबार पर असर न पडऩे लग जाए. हालांकि डेटा सेवाओं में वृद्धि ही भविष्य में टावरों की वृद्धि में योगदान देगी और आंतरिक समाधानों तथा छोटे सेल स्थलों का मार्ग प्रशस्त करेगी. बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के साथ अब कंपनियों का जोर अपने ग्राहकों को बढ़ाने पर नहीं बल्कि सक्रिय उपभोक्ताओं के आधार को सुधारने पर है.
नियमन और जवाबदेही
एक समाधान यह है कि टावरों को बढ़ाया जाए. इसके लिए कंपनियों को अपनी जेब ढीली करनी होगी. अब 4जी नेटवर्क के आने के बाद मौजूदा क्षमता अपर्याप्त हो जाएगी और उस पर भार बढ़ जाएगा, इसलिए ज्यादा टावर एक अनिवार्यता हो जाएंगे. कुछ लोगों का कहना है कि भारत को ऐसे टावरों के साथ प्रयोग करना चाहिए जिनसे कम ऊर्जा की खपत होती है, लेकिन जनता के बीच जागरूकता कार्यक्रम चलाकर उन्हें राजी करने के बाद ज्यादा घने तरीके से इन टावरों को स्थापित करना चाहिए. इससे विकिरण के भय और कॉल ड्रॉप दोनों समस्याओं का समाधान होगा.
ट्राइ को भी उन कंपनियों के मामले में सक्चत होना होगा जो कुछ सर्किलों में भारी कॉल ड्रॉप की दर के साथ बच निकलती हैं क्योंकि राष्ट्रीय औसत इससे भी नीचे होता है. इसका एक तरीका यह है कि सर्किलों के भीतर कॉल की गुणवत्ता की जवाबदेही सेवा प्रदाताओं पर तय कर दी जाए. ट्राइ को दूरसंचार उद्योग पर नजर रखने के लिए बनाया गया था लेकिन इसके आलोचकों का कहना है कि इस संस्था ने अपनी धार खो दी है. खराब सेवा गुणवत्ता के लिए दंड और जुर्माने से संबंधित नियमों के मसौदे अब भी अधिसूचना की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
पिछली 7 जुलाई को सरकार ने दूरसंचार विभाग को निर्देश दिया था कि वह मोबाइल नेटवर्कों का एक विशेष ऑडिट करवाए और उसने ट्राइ से कहा है कि वह सेवा गुणवत्ता के लिए प्रोत्साहनों और सजा की एक प्रणाली विकसित करे. यह ऑडिट दूरसंचार विभाग का प्रवर्तन, संसाधन और निगरानी प्रकोष्ठ करेगा. पहले चरण की जांच में सभी महानगरों और राज्यों की राजधानियों का ऑडिट किया जाएगा. इसके पूरा होने की कोई समय सीमा तय नहीं है.
उद्योग के जानकार जैसे प्राइसवाटर हाउसकूपर्स के आशीष शर्मा मानते हैं कि समस्या की जड़ यह है कि दूरसंचार क्षेत्र वित्तीय रूप से सक्षम नहीं है. वे कहते हैं, “सरकार चाहती है कि कम शुल्क पर सेवा देने वाले प्रदाताओं की संख्या ज्यादा हो और कवरेज भी ज्यादा हो. भारत में हर उपभोक्ता पर औसत शुल्क तीन डॉलर है जबकि अमेरिका में यह 57 डॉलर है, यानी उद्योग पूंजीगत व्यय के कारण लडख़ड़ा रहा है. कंपनियां अब जो निवेश करने का सोच रही हैं, वह उन्हें पांच साल पहले करना चाहिए था.” एयरटेल और वोडाफोन जैसे दूरसंचार क्षेत्र के बड़े खिलाड़ी भले ही यह दावा करते हों कि वे हजारों करोड़ का निवेश कर रहे हैं और उनका पूंजीगत व्यय लगातार अधिक रहा है, पीडब्ल्यूसी का विश्लेषण दिखाता है कि भारत की दूरसंचार कंपनियां अपनी कमाई का करीब 15 फीसदी निवेश इन्फ्रास्ट्रक्चर में करती हैं जबकि चीन में यह आंकड़ा 30 फीसदी है.
ये तमाम दावे हालांकि हैदराबाद की स्वतंत्र फिल्मकार 24 वर्षीय ऐश्वर्या अय्यर के लिए कोई मायने नहीं रखते, जिन्हें न सिर्फ अपने मोबाइल के बिल ज्यादा चुकाने पड़े बल्कि अपने इलाके निजामपेट में कॉल ड्रॉप की समस्या के कारण कई पेशेवर मौके इसलिए गंवाने पड़े क्योंकि समय रहते दूसरे लोग उनसे संपर्क नहीं कर पाए. वे कहती हैं, “मैंने कई प्रोडक्शन हाउसों में अपना आवेदन भेजा था. लगातार 45 दिनों तक कहीं से जब कोई जवाब नहीं आया तब जाकर एक जगह से मुझे यह पता चला कि मुझे फोन लगाया गया था लेकिन नहीं मिला, जिसके चलते मेरे हाथ से मौका चला गया.”
भारत के तमाम मोबाइल धारकों की यही कहानी है और इन्हें जानने के लिए ऑपरेटरों या नीति निर्माताओं को खराब नेटवर्क से ऐसे संदेश प्राप्त करने के लिए इंतजार करने की जरूरत नहीं है. सारी चेतावनियों को भूलकर इन्हें सबसे पहले बुनियादी सेवाओं को दुरुस्त करना होगा. इतने विशाल उद्योग के समक्ष गहराते खतरे के संकेतों को अभी नहीं पढ़ा गया तो इसका विकल्प लोग खुद खोज लेंगे.
(साथ में, मोना रामावत )
aajtak.in