राष्ट्रपति ने फिर की देश में सहिष्णुता का वातावरण बनाने की अपील

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बुधवार को कहा कि समाज अगर चैतन्य महाप्रभु के संदेश को आत्मसात कर लें तो देश में सहनशीलता और सहिष्णुता का वातावरण बन सकता है.

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पंकज श्रीवास्तव

  • मथुरा,
  • 18 नवंबर 2015,
  • अपडेटेड 9:54 PM IST

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बुधवार को कहा कि समाज अगर चैतन्य महाप्रभु के संदेश को आत्मसात कर लें तो देश में सहनशीलता और सहिष्णुता का वातावरण बन सकता है. मुखर्जी ने वृंदावन में आयोजित चैतन्य महाप्रभु पंचशती महोत्सव में महाप्रभु के योगदान की चर्चा करते हुए कहा, 'एकता, सद्भाव, प्रेम और मानवता ही चैतन्य महाप्रभु के जीवन का ध्येय था और आज भी भारत की अनेकता में एकता उसे मजबूत बनाती है. इससे दूसरे देश भी हैरान हैं.'

उन्होंने कहा, 'जब देश में विषम हालात थे और कटुता का माहौल था, तब महाप्रभु चैतन्य ने प्रेम की वाणी से अनेकता में एकता स्थापना की.  स्थापित एकता को कामय रखने के लिए सहनशीलता एवं सहिष्णुता का वातावरण बनाए रखने की आवश्यकता है. महाप्रभु का यही व्यक्तित्व दुनिया में एक मिसाल की तरह है.' उप्र के राज्यपाल राम नाईक, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और मथुरा की सांसद हेमा मालिनी ने राष्ट्रपति के यहां पहुंचने पर उनका स्वागत किया.

नाईक ने इस मौके पर कहा, 'आज काफी लोग कुष्ठ रोगियों को घृणा की दृष्टि से देखते हैं, जबकि 500 साल पहले चैतन्य महाप्रभु ने कुष्ठ रोगियों की सेवा की थी. उन्होंने प्रेम की भाषा से वैष्णव धर्म का ऐसा प्रचार-प्रसार किया कि पशु-पक्षी तक आनंदित हो उठते थे.' सांसद हेमा मालिनी ने चैतन्य महाप्रभु के बताए मार्ग पर चलने का आह्वान किया.

चैतन्य महाप्रभु वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक थे. उन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी, भजन गायकी की एक नई शैली को जन्म दिया तथा राजनीतिक अस्थिरता के दिनों में हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया.  उन्होंने जात-पात, ऊंच-नीच की भावना दूर करने की शिक्षा दी तथा विलुप्त वृंदावन को फिर से बसाया और अपने जीवन की अंतिम सांस वहीं ली.

इनपुट- IANS

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