फिल्म रिव्यू: दिल में घर कर जाती है 'पीकू'

'पीकू' को आप किसी भी कीमत पर मिस नहीं करेंगे, क्योंकि कई वर्षों बाद ऐसी फिल्म बनी है, जिसे आप चाहते ही नहीं हैं कि कभी वो खत्म हो, बस चलती जाए.

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aajtak.in

  • मुंबई,
  • 08 मई 2015,
  • अपडेटेड 4:32 PM IST

फिल्म का नाम: 'पीकू'- मोशन से इमोशन तक
डायरेक्टर: शूजित सरकार
स्टार कास्ट: अमिताभ बच्चन, दीपिका पादुकोण, इरफान खान, मौशमी चटर्जी
अवधि: 125 मिनट
सर्टिफिकेट: U/A
रेटिंग: 4 स्टार

एक दौर था जब हृषिकेश मुखर्जी की फिल्में आते ही पूरा परिवार एक साथ बैठकर उस फिल्म को शुरू से आखिर तक देखता था और कुछ ऐसा ही जादू लेकर आए हैं निर्देशक शूजित सरकार.

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पहले विकी डोनर के द्वारा अनोखा संदेश दिया और एक बार फिर से लेखिका जूही चतुर्वेदी के साथ ही फिल्म 'पीकू' का निर्माण किया है, आइए जानते हैं आखिर क्या है पीकू:

'पीकू' (दीपिका पादुकोण ) एक कामकाजी लड़की है, जो अपने 70 साल के बाबा भास्कर (अमिताभ बच्चन) के साथ दिल्ली के चितरंजन पार्क में रहती है. बाबा की देखभाल के साथ-साथ अपना काम करते हुए पूरी जिंदगी बाबा के आस पास न्यौछावर कर चुकी है. बाबा, जिन्हें पेट से जुड़ी कुछ समस्या है और इसी समस्या की चर्चा हर जगह होती रहती है. उसी बीच हिमाचल टैक्सी स्टैंड के मालिक राजा चौधरी (इरफान खान) का इस बनर्जी फैमिली में आगमन होता है और फिर शुरू हो जाती है दिल्ली से कोलकाता की यात्रा और कोलकाता में जाकर इस फिल्म की समाप्ति हो जाती है.

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डायरेक्टर शूजित सरकार की ये फिल्म भी विकी डोनर जैसा फ्लेवर देती है, लेकिन अलग तरह से. जूही चतुर्वेदी की पटकथा और संवाद इतने बेहतरीन हैं कि फिल्म के किरदार जब भी स्क्रीन पर आते हैं, बस देखते ही रहने का मन करने लगता है. सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने एक बार फिर से यह बता दिया कि उन्हें लिविंग लीजेंड क्यों कहते हैं. 70 साल के बंगाली किरदार को बच्चन साहब ने जीवंत कर दिया है. एक-एक संवाद सुनकर ऐसा बिल्कुल नहीं लगता की वो पात्र पूरी तरह से बंगाली नहीं है. चाहे वो 'जोंजाल' हो या 'डिस्कास', अमिताभ ने हरेक फ्रेम को सजीव बनाने में कोई कसार नहीं छोड़ी है.

इरफान खान ने अपनी अभिनय की कला का प्रदर्शन किया है, जिसमें एक आशिक के साथ-साथ संजीदा इंसान छुपा हुआ है और वो आपको कार के भीतर और बाहर दोनों तरफ मुस्कुराने पर मजबूर कर देता है. कभी-कभी तो ठहाकों को रोक पाना मुश्किल हो जाता है. दीपिका पादुकोण ने यह साबित कर दिया कि उन्हें क्यों उच्च श्रेणी की अदाकारा कहा जाता है.

पहले फ्रेम से आखिर तक दीपिका ने हरेक सीन को इतने बखूबी तरीके से निभाया है कि आपको वो अपने आस-पास की करीबी दोस्त लगने लगती है. हर फिल्म के साथ दीपिका का रुतबा बढ़ता जा रहा है. इस फिल्म में भी उनकी एक्टिंग सराहनीय है.

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फिल्म में डॉक्टर के रूप में रघुबीर यादव और मौसी के किरदार में मौशमी चटर्जी ने चार चांद लगा दिए हैं. छोटे-छोटे वाकयों को बहुत ही उच्च तरीके से शूजित ने सजाया है. आपको इस फिल्म में दिल्ली, कोलकाता और वाराणसी का बहुत फ्लेवर मिलेगा.

इस फिल्म को आप किसी भी कीमत पर मिस नहीं करेंगे, क्योंकि कई वर्षों बाद ऐसी फिल्म बनी है, जिसे आप चाहते ही नहीं हैं कि कभी वो खत्म हो, बस चलती जाए.

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