पटना: 2 रुपये के लिए हुआ था फर्जी एनकाउंटर, 12 साल बाद मिलेगी दोषियों को सजा

12 जून का दिन पटना के उन तीन छात्रों के परिजनों के लिए बड़ा दिन है क्योंकि इसी दिन तीन बेगुनाह छात्रों को फर्जी मुठभेड़ में मारने वाले पुलिसकर्मी समेत आठ लोगों को सजा सुनाई जायेगी. इन छात्रों को महज 2 रुपये के लिए फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया था.

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aajtak.in

  • पटना,
  • 11 जून 2014,
  • अपडेटेड 1:38 AM IST

12 जून का दिन पटना के उन तीन छात्रों के परिजनों के लिए बड़ा दिन है क्योंकि इसी दिन तीन बेगुनाह छात्रों को फर्जी मुठभेड़ में मारने वाले पुलिसकर्मी समेत आठ लोगों को सजा सुनाई जायेगी. इन छात्रों को महज 2 रुपये के लिए फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया था. सीबीआई की विशेष अदालत ने 5 जून को इन्हें दोषी ठहराया था. घटना के लगभग 12 सालों के बाद यह फैसला आ रहा है और मृतक छात्रों के परिजन दोषियों को फांसी से भी कड़ी सजा देने की मांग कर रहें है.

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इसी मुठभेड़ में मारे गए विकास रंजन के माता पिता को न्याय के लिए 12 वर्षों का इंतजार करना पड़ा. 24 वर्ष का विकास रंजन मेधावी छात्र था, उसके साथ साथ उसके माता पिता ने भी कई सपने देखे थे लेकिन उनका यह सपना 28 दिसम्बर 2002 को उस समय टूट गया जब पटना पुलिस ने उसे डकैत करार कर फर्जी मुठभेड़ में मार गिराया. विकास रंजन की मां कुन्दन गुप्ता दोषियों के खिलाफ फांसी से भी कड़ी सजा चाहती हैं क्योंकि महज दो रूपये के लिए पुलिस ने उनसे उनका बेटा छीन लिया.

गौरतलब है कि पटना पुलिस ने साल 2002 में विकास रंजन के साथ उसके दो और दोस्त हिमांशु और प्रशांत को भी फर्जी मुठभेड में मार गिराया था. दरअसल आशियानगर इलाके में एक पीसीओ पर तीनों ने फोन किया था लेकिन बिल दो रुपए ज्यादा आए तो तीनों दोस्तों ने दुकानदार से इसकी शिकायत की लेकिन दुकानदार ने और लोगों के साथ मिल कर इन तीनों की इतनी पिटाई की वो अधमरे से हो गए. दुकानदारों ने फिर पुलिस को फोन किया शास्त्रीनगर पुलिस ने आकर इन बच्चों को नजदीक से गोली मारी और डकैत बोल के इस घटना को मुठभेड़ करार दे दिया.

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मामले की गंभीरता को देखते हुए इस मामले को लेकर उस वक्त पूरा पटना उबल पड़ा था. कई दिनों तक आंदोलन चला और पुलिस को कई बार गोली और लाठी चलानी पड़ी. लोग इस मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे. आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने इन छात्रों के नाम से शहीद चौक बनाने का आश्वासन भी दिया था लेकिन वो नहीं बन सका जिसका मलाल परिजनों को है.

इस मामले की गंभीरता को देखते हुए 14 फरवरी 2003 को राज्य सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी. 29 मार्च 2003 को सीबीआई ने आरोप पत्र दायर किया था. इस मामले में शास्त्रीनगर थाने के तत्कालीन प्रभारी इस्पेक्टर शम्से आलम और सिपाही अरूण कुमार को दोषी पाया गया बाकी 6 लोग हत्या के प्रयास के दोषी हैं.

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