पाकिस्तान में फिलहाल तख्तापलट का मौसम तो नहीं है, लेकिन यह इस्लामिक गणराज्य एक बार फिर गहराते नागरिक सैन्य संकट की ओर बढ़ रहा है. अमेरिका उसकी गरदन पर चढ़ा बैठा है, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) दरवाजे पर खड़ा है, चीन उसकी रसोई तक में घुस चुका है और आइएसआइएस उसके तहखाने में छुपा बैठा है. इसके बावजूद पाकिस्तान में जो सियासी और प्रशासनिक गड़बड़झाला मचा पड़ा है, वह अभूतपूर्व है. उसके आकाश में संवैधानिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी संकट के बादल छाए हुए हैं.
देश का आला नेतृत्व पदच्युत प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके परिवार के इर्द-गिर्द घूम रहे कानूनी और राजनैतिक सत्ता संघर्ष में फंसा पड़ा है. उधर उसका परमाणु शक्तिसंपन्न दोस्त चीन यहां के राजकाज के संकट का नतीजा भुगत रहा है, जिसकी परिणति कुछ पर्यवेक्षकों के मुताबिक इनमें से किसी भी रूप में हो सकती हैः ताजा चुनाव, न्यायपालिका की शह पर सियासत की सफाई, आर्थिक दिवालियापन, एक अंतरिम सरकार, आतंकवाद की एक नई लहर और यहां तक कि भारत के साथ एक तनावपूर्ण स्थिति शायद अमेरिका के साथ भी.
इतना तो तय है कि फिलवक्त यहां कोई तख्तापलट नहीं होने वाला. ऐसा इसलिए क्योंकि अब न्यायाधीश ही यहां के नए जनरल हैं और जनरल कूटनीतिक बन चुके हैं. जहां तक लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए नेताओं की बात है तो वे सब हर किसी के साथ और यहां तक कि खुद से भी एक जंग में मुब्तिला हैं. इन तमाम हालात में अगर कुछ सबसे ज्यादा दांव पर लगा हुआ है तो वो है देश पर सबसे लंबे वक्त तक राज करने वाले खानदान की सियासी किस्मत. इसी के साथ मुल्क की सियासी तकदीर भी नत्थी है.
पहला परिवार, परिवार पहले
जुलाई में अघोषित आय के चलते सुप्रीम कोर्ट द्वारा पदच्युत कर दिए जाने के बाद लोगों ने सोचा था कि नवाज शरीफ अब आसानी से निकल लेंगे, उनका अवसान हो चुका है और वे चुपचाप लंदन जाकर आराम फरमाएंगे. यह मान लिया गया था कि वे अब अपने सक्षम भाई शाहबाज के लिए राजनीति में रास्ता बनाएंगे जो उस पंजाब के मेहनती मुख्यमंत्री हैं जिस पर अस्सी के दशक के बाद से ही शरीफ खानदान का राज रहा है जब जिया की सैन्य सत्ता से उसकी पैदाइश हुई थी.
संकटरहित उपचुनाव के बाद मान लिया गया था कि शाहबाज अब पार्टी की कमान संभालेंगे और अगला आम चुनाव समय के मुताबिक अगली गर्मियों तक हो जाएगा. फिर यह माना गया कि जो सबसे अच्छी पार्टी होगी, वह जीत जाएगी और ज्यादा से ज्यादा एक गठबंधन शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग- नवाज (पीएमएल-एन) की जगह ले लेगा और नवाज की अनुपस्थिति में स्वाभाविक तौर पर उलझा रहेगा. बाकी, नवाज और उनके परिवार की किस्मत ठीक रही तो वे आत्म-निर्वासन में जाकर दुबक जाएंगे या फिर जवाबदेही से जुड़े 18 से ज्यादा मुकदमों का दंश झेलने को मजबूर होंगे.
इनमें से कुछ भी नहीं हुआ. अब इसे जबरदस्त धैर्य का परिचायक कहें या फिर नपा-तुला अडिय़लपन और बिखरा हुआ टकराव, लेकिन ऐसा तीसरी बार है कि न सिर्फ पूर्व प्रधानमंत्री बल्कि उनका समूचा परिवार ही पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा.
अगस्त में नवाज ने एक राज्य-प्रायोजित घर वापसी रैली निकाली थी जब वे इस्लामाबाद से सैकड़ों का काफिला लेकर चले और पंजाब की जीटी रोड से गुजरते हुए ऐसा माहौल बनाया कि काफिला हजारों में तब्दील हो गया.
वे काफी शानो-शौकत से लाहौर पहुंचे. कई दिनों की यात्रा के दौरान उन्होंने अच्छे-खासे समर्थकों को जुटा लिया था. फिर उन्होंने खुलकर चुनौती दे डाली कि ''उन लोगों ने" उनके साथ क्या किया है. इस तरह उन्होंने अपनी पार्टी को नया नारा देने की कोशिश की जो इस सवाल के रूप में था कि ''मुझे क्यों हटाया गया?"
जाहिर है, यह एक नया सत्ताविरोधी जुमला था- ''मुझे क्यों निकाला?" फौज पलटवार की उम्मीद नहीं कर रही थी. न्यायपालिका भी चुप बैठी रही. विपक्ष उस दौरान ऊंघता रहा.
पनामालीक्स की सुनवाई में महीनों अपनी मेहनत से फतह हासिल कर के निकले इमरान खान नथियागली की पहाडिय़ों में आराम फरमा रहे थे. नवाज विरोधी धड़े ने कभी भी उनकी काट निकालने के बारे में नहीं सोचा. वह मानता रहा कि यह सब कवायद एक शापित शख्स का आखिरी नाटक है. मानसून के वे दिन शरीफ की राजनैतिक वापसी के दिन थे, लेकिन किसी को इसका न तो अंदाजा रहा और न ही किसी ने उन्हें चुनौती दी. यही बेपरवाही अब भारी पड़ रही है.
सितंबर आया तो माहौल नवाज के पक्ष में था. उन्होंने जंग की पुरानी योजना को कचरे में फेंक दिया था. शाहबाज को दरकिनार कर दिया गया—कुछ का कहना था कि वे फौज के काफी करीब थे. दूसरों का कहना था कि उनकी जरूरत पंजाब को चलाने के लिए अहम है क्योंकि पाकिस्तान में असल वोट बैंक यहीं का मायने रखता है. नवाज ने प्रतीकात्मक और सियासी रूप से अहम लाहौर के उपचुनाव में अपनी पत्नी कुलसुम को खड़ा कर दिया. अदालत ने उनकी यही सीट उनसे छीन ली थी.
केंद्र के स्तर पर टिकाऊ सरकार के वादे के साथ एक जबरदस्त चाल चली जा रही थी. शाहिद खकन अब्बासी को अंतरिम प्रधानमंत्री के पद पर बैठा दिया गया, जो नवाज के बड़े वफादार थे, यूसीएलए से स्नातक हैं, अमेरिका और फौज दोनों के लिहाज से उपयुक्त लेकिन नवाज को चुनौती देने के लिए उनमें लोहा कम था. वे मुरी की पहाडिय़ों तले शांत मैदानी इलाके से आते हैं. इस तरह नए और पुराने वजीरे आजम के बीच कोई फर्क नहीं था. कद में ऊंचा होने के बावजूद रसूख में कमतर अब्बासी ने खुलेआम कहा कि वे अब भी नवाज को ही रिपोर्ट कर रहे हैं.
नवाज की पत्नी लंदन में कैंसर की कीमोथेरपी करवा रही थीं और इधर लाहौर के उपचुनाव में वे अपेक्षित मार्जिन से कम वोटों से जीत भी चुकी थीं. अभी हालांकि पीएमएल-एन के नए चेहरे के मंच पर आने का इंतजार था—मरियम, नवाज की सबसे बड़ी बिटिया और पार्टी के मीडिया प्रचार की धुरी, जो आज अपने पिता की असली उत्तराधिकारी बनकर उभर चुकी हैं.
मरियम ने उपचुनाव में खुद को साबित कर दिया. उनके आलोचक हालांकि कहते हैं कि इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ बमुश्किल पीएमएल-एन से कुछ ही पीछे चल रही थी. उनके आने से हालांकि पारदर्शिता और ''गायब" कार्यकर्ताओं के बारे में चिंताएं उभर कर सामने आ गईं और सबसे बड़ी बात यह हुई कि फौज की शह वाली मिल्ली मुस्लिम लीग (हाफिज सईद की जमात-उद-दावा का नया सियासी चेहरा) और लब्बाक या रसूल अल्लाह पार्टी (एक कट्टर और कुफ्र कानून समर्थक लाहौर के धार्मिक आंदोलन की पैदाइश) ने मरियम के प्रचार अभियान के सहारे 15,000 वोट झटक लिए. अचानक लाहौर केंद्रित इन दो नई दक्षिणपंथी पार्टियों की कामयाबी ने उदारपंथी और कुछ कम उदारपंथी सियासी हलकों में खलबली पैदा कर दी. सवाल उठने लगे कि क्या आइएसआइएस के राजनैतिक धड़े ने कोई चाल चल दी है या लाहौर में अपने पुराने समर्थन आधार का लाभ उठाकर मुल्ला अचानक सक्रिय हो गए हैं?
यह बहस खड़ी हो पाती, उससे पहले ही मरियम ने इसे निबटा दिया. पीएमएल-एन भले चुनाव जीत गया था, लेकिन मरियम और उनकी प्रचार मशीनरी ने सत्ता प्रतिष्ठान को राजनीति की मुख्यधारा में जिहादियों को घुसाने के लिए आड़े हाथों लिया. उनका मजबूत पक्ष साफ दिख रहा था कि चुनाव जीतने के बावजूद उनके चेहरे पर वैसा उत्साह नहीं था. जल्द ही सितंबर के मध्य तक सब कुछ साफ हो चुका थाः जीटी रोड की रैली और लाहौर उपचुनाव में जीत के बावजूद यह परिवार अब भी घुटने टेकने को तैयार नहीं था. उसे राजनैतिक वापसी करनी थी और इसके लिए वह सब कुछ करने को तैयार था.
राजकुमारी मरियम
लोग कहते हैं कि उनके भीतर बेनजीर भुट्टो जैसे आत्मविश्वास की झलक नहीं मिलती. वे आरोप लगाते हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा फातिमा जिन्ना की तरह परछाई बनकर रह जाएंगी. वे उनके लोकतांत्रिक नजरिए पर सवाल उठाते हैं क्योंकि वे जॉर्डन की क्वीन रानिया को आदर्श मानती हैं. यहां तक कि वे उनके काम पर भी सवाल उठाते हैं. इसके बावजूद कोई शक नहीं कि मरियम नवाज शरीफ का नया संस्करण हैं.
उनके भीतर अपने पिता की सत्ता-विरोधी विरासत है और सामने वाले से संपूर्ण समर्पण व वफादारी की मांग की चाह भी है. उनके पदच्युत होने के बावजूद वे उनकी चीफ ऑफ स्टाफ हैं और वफादार मंत्रियों व नौकरशाहों की कमान अपने हाथ में रखती हैं. वे उनके मुताबिक ही काम करते हैं. अपनी बॉडी लैंग्वेज में वे थोड़ा आक्रामक हैं, टीवी के लिए शानदार साउंड बाइट देती हैं और ट्विटर पर आग लगाए रखती हैं. भीड़ में वे शालीन कपड़े पहनती हैं लेकिन ड्राइंग रूम और वॉट्सएप पर वे चर्चाओं का बायस भी हैं. उनकी मीडिया मशीनरी चुटकी बजाते ही चालू हो जाती है. फौज के बाद मीडिया पर सबसे ज्यादा उन्हीं की चलती है.
इससे ज्यादा अहम यह है कि मरियम इस्लामाबाद के सत्ता समीकरण में वापस लौटने की ख्वाहिश रखती हैं जहां से उनके पिता, पति और भाइयों को हकाल दिया गया है. फिलहाल, वे इसके लिए खुलकर फौज का दोष दे रही हैं लेकिन उनके पास अब तक इसका कोई ठोस साक्ष्य नहीं है. अब भी वे चीजों को हर दिन बीतते अतिरंजित करने की आदत से बाज नहीं आती हैं जबकि उनके वफादार मंत्री उनके बड़बोलेपन को संतुलित करने के लिए संसद और टॉक शो के हलकों में कहते नजर आते हैं कि शरीफ परिवार के साथ कोई साजिश नहीं हुई है. इस बीच मरियम ने खुद को बिना किसी पद के विपक्ष की तरह काम कर रही सत्ता का चेहरा बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है.
जैसा कि एक टिप्पणीकार ने हाल ही में कहा, मरियम ने शरीफ खानदान को दो टुकड़ों में भी बांट दिया है. अब वे एक ओर के परिवार की नुमाइंदगी करती हैं. इस बीच सरकार पर जब राजकाज ठीक से नहीं चला पाने के आरोप लग रहे हैं, शाहबाज को अब तक कोई केंद्रीय पद नहीं मिल सका है जबकि आधिकारिक रूप से वे अब भी अपने भाई के साथ ही हैं और भीतर चल रही खदबदाहटों के बावजूद नवाज या मरियम से यह अधिकार छीनने की उनमें सियासी ताकत नहीं है. मरियम ने जो कुछ सोच रखा है वह केवल अपने पिता के लिए और ज्यादा-से-ज्यादा खुद के लिए—बेशक, पिता की सहमति से ही.
वापसी, रियायत या दोषसिद्धि?
पाकिस्तान के पंजाब में भाई की हत्या को शरीका कहते हैं. इसकी उत्पत्ति दूसरे के हक में शरीक होने से जुड़ी हुई है. दुश्मनों ने भले दोनों भाइयों को उनकी भव्यता के चलते अकसर मुगल कहा हो, लेकिन नवाज और शाहबाज आपस में कोई औरंगजेब और दाराशिकोह जैसे नहीं हैं. बड़े शरीफ अब भी बॉस हैं—यह बात पिछले हफ्ते एक इंटरव्यू में उनके भाई ने मुझसे कही थी. जो लोग चाहते हैं कि चीजें चलती रहें, उनके लिए यह एक गंभीर समस्या हो सकती है.
अक्तूबर के आरंभ में नवाज ने अप्रत्याशित तरीके से अपनी संवैधनिक वापसी की—संसद से एक विवादास्पद संशोधन पारित करवा के पीएमएल-एन का आधिकारिक रूप से नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया जिससे उनके हाथ अपनी सियासी वैधता का दावा करने का एक अहम औजार लग गया जिसे अदालतों ने खारिज कर डाला था- लेकिन शेरे-पंजाब के ऊपर अब भी भ्रष्टाचार के दर्जन भर से ज्यादा मामले लंबित हैं. उनके और उनके परिवार के खिलाफ जैसे-जैसे दोष सघन होते जा रहे हैं, वे घुटने टेकने को तैयार नहीं हैं.
फिलहाल वे इतनी जल्दी पाकिस्तान नहीं आने वाले हैं. उन्हें और मामलों में दोषी ठहराया जाना बाकी है. सोमवार को उन्होंने अपने पुराने दोस्त सउदी के शाही परिवार की एक अघोषित यात्रा की थी जिसके बाद वे लंदन लौट आए (फौज के प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने भी पिछले हक्रते सउदी की अघोषित यात्रा की थी जिसके बारे में फौज मुख्यालय की ओर से कोई विवरण जारी नहीं किया गया). शरीफ का सजा पाना अब पहले से ज्यादा तय दिखता है और उनकी कानूनी किस्मत डूबने के कगार पर है, फिर भी सरकार के ऊपर उनका नियंत्रण कमजोर नहीं हो रहा है. भले इसके लिए भारी कीमत चुकानी पड़ जाए.
इस संदर्भ में एक और बात कहा जाना जरूरी है. पाकिस्तान के वित्त मंत्री शरीफ की पत्नी के भाई इस्हाक डार हैं. डार को सितंबर में भ्रष्टाचार के आरोपों में दोषी ठहराया गया था और अदालत ने पिछले सप्ताहांत उनकी जायदाद जब्त कर ली. यह सब उस दौरान हुआ जब विश्व बैंक पाकिस्तान की आर्थिक स्थिरता पर संदेह जताने वाली एक रिपोर्ट जारी कर रहा था, आइएमएफ भी चेतावनी जारी कर रहा था और शेयर बाजार रसातल में जा रहा था. यह चेतावनी इतनी मुखर थी कि फौज के प्रमुख जनरल बाजवा को भी लडख़ड़ाती अर्थव्यवस्था का मुद्दा उठाना पड़ा.
पिछले कई हक्रतों से इन तमाम कारणों के चलते विपक्ष डार का इस्तीफा मांगने को मजबूर हुआ है लेकिन ऐसा अब तक नहीं हुआ, जबकि वित्तमंत्री पर लगातार देश के वित्तीय कुप्रबंधन के आरोप लग रहे हैं. उनकी सुनवाई के जोर पकडऩे के बाद से एकाध महीने के भीतर ही उनका वजन 20 किलो से ज्यादा घट गया है जो साफ दिखता भी है, फिर भी वे अपने रुख पर अड़े हुए हैं. व्यवस्था के खिलाफ शरीफ के अडिय़लपन के एक प्रतीक के रूप में डार की जिद को देखा जा सकता है. ये दोनों सत्ता में किसी तरह बने हुए हैं और फिर भी बागी जैसा बरताव कर रहे हैं.
एक वित्तीय कंसल्टेंसी चलाने वाले सरकार के पूर्व सलाहकार साकिब शेरानी कहते हैं, ''ऐसा लगता है कि सरकार एकसूत्रीय एजेंडे पर काम कर रही हैः संविधान की अवमानना कर के शरीफ परिवार को कानून से बचाना. देश के सामने खड़ी बाकी चुनौतियों—नाकाम होती अर्थव्यवस्था, बढ़ता क्षेत्रीय और भू-राजनैतिक दबाव—की ओर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा है."
इधर शाहबाज के ऊपर खुद हत्या और हवाला के आरोप हैं. ये मामले अभी दबे पड़े हैं. लोग कह रहे हैं कि उन्हें जान-बूझकर मौका दिया जा रहा है कि वे पहले अपना घर दुरुस्त कर लें, भाई से कमान अपने हाथ में लें, सत्ता प्रतिष्ठान से होने वाले संभावित टकराव को रोकें और चीजों को पटरी पर ले आएं.
आखिरकार
पीएमएल-एन के एक वरिष्ठ मंत्री ने नाम न लिखने की शर्त पर कहा, ''हमारे तीन लक्ष्य हैं. एक, हम नहीं चाहते कि पार्टी टूट जाए या फिर आइएसआइ जैसों द्वारा तोड़ दी जाए. दूसरे, मार्च में होने वाले सीनेट के चुनाव तक हम खुद को बचाए रखना चाहते हैं. तीसरे, हम नहीं चाहते कि मियां साहब को सजा हो."
इन तीनों लक्ष्यों में मार्च 2018 का सीनेट चुनाव संवैधानिक रूप से बहुत निर्णायक है. अगर पीएमएल-एन सरकार इसमें कामयाब रही, तो नौवें दशक के बाद पहली बार उच्च और निचले दोनों सदनों में उसका नियंत्रण हो जाएगा. ऐसा होने के बाद फौज और न्यायपालिका के अधिकारों में कटौती के लिए सदन का कार्यकाल खत्म होने से पहले कुछ संशोधन पारित किए जा सकते हैं, इससे पहले कि अगले आम चुनाव का ऐलान हो. पीएमएल-एन के हलकों में ऐसे कुछ गंभीर उपायों पर पहले से ही चर्चा चल रही है. इस तरह कह सकते हैं कि फिलहाल जो कुछ चल रहा है, उसके परिणति पर पहुंचने की आखिरी तारीख मार्च है. मार्च के चुनाव केवल कुछ सौ सीनेटरों की किस्मत तय करने तक सीमित नहीं हैं.
अब तक हालांकि यह साफ नहीं है कि पीएमएल-एन मार्च तक क्या करेगी, कैसे करेगी और उसे कैसे अपनी मनमर्जी करने की छूट दी जाएगी. क्या नवाज पाकिस्तान लौटना चुनेंगे, पूरी प्रक्रिया से गुजरेंगे और जेल जाने का जोखिम उठाएंगे (याद रहे कि वे जल्द ही 70 बरस के होने वाले हैं)? क्या मरियम वहीं रहेंगी और यही जोखिम उठाने को तैयार होंगी? क्या शाहबाज अपने बड़े भाई के साये से मुक्त होकर कोई ''सौदा पटा लेंगे" ताकि उन्हें भी वही कानूनी कीमत न चुकानी पड़े?
क्या कानूनी मामलों में कमजोर लेकिन साफ दिमाग इमरान खान की अगुआई वाला विपक्ष ऐसे किसी सौदे के पक्ष में होगा या फिर विरोध में सड़क पर उतरेगा? क्या पीएमएल-एन शाहिद खकन अब्बासी के नेतृत्व में पुनर्गठित होगा जो खुद को एक स्थानापन्न प्रधानमंत्री से कुछ और बड़ी शख्सियत में तब्दील कर लेंगे—उनका विदेश विभाग आला स्तरों पर संतुलन बनाए हुए है और इसी हक्रते अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलर्सन के साथ हुई बैठक में उसने नागरिक-सैन्य एकजुटता दिखाते हुए कश्मीरी नेताओं से वार्ता के लिए भारत सरकार के वार्ताकार नियुक्त करने को खारिज किया है.
घोषणा के घंटे भर बाद ही यह कदम उठाया गया और यह सब एक दिन के भीतर हुआ. दूसरे, अगर सत्ता में रहकर विरोध करने का नवाज का यह मॉडल नहीं टिका और/या अफगान-अमेरिका-भारत की नीति में दरार पड़ी, तो क्या अब्बासी टेक्नोक्रेट पेशेवरों की एक सरकार के लिए सहजता से रास्ता बनाते हुए घुटने टेक देंगे? या फिर राजनैतिक अथवा अलहदा हलके से कोई छुपा रुस्तम उभर कर सामने आएगा?
याद रहे, आज जज ही नए जनरल हैं. विदेश मंत्रालय के एक पूर्व सलाहकार मुशर्रफ ज़ैदी कहते हैं, ''कई स्तरों पर कार्यपालिका के काम में न्यायिक हस्तक्षेप देखने को मिल रहा है. इसे लोगों का विश्वास हासिल है, आंशिक रूप से इसलिए क्योंकि राजनैतिक भ्रष्टाचार और कार्यपालिका की अक्षमता के मुद्दे में बहुत ताकत है. कार्यपालिका के प्रदर्शन के अभाव में जजों को उनके हस्तक्षेपों के नाते ज्यादा वैधता मिलती जाएगी." इस तरह पाकिस्तान की कहानी चलती रहेगी, भले ही मौजूदा सत्ता अपना सफर पूरा न कर सके. सब कुछ माननीय अदालतों के इंसाफ के हथौड़े पर निर्भर करता है.