मुलायम का अमर प्रेम

चुनाव में मुंह की खाए मुलायम और अमर सिंह को चाहिए एक-दूसरे का सहारा. उनकी दोस्ती एक बार फिर से चढ़ रही है परवान. लेकिन क्या कोई लाभ होगा?

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आशीष मिश्र

  • लखनऊ,
  • 12 अगस्त 2014,
  • अपडेटेड 3:53 PM IST

भाषण सिर्फ चार मिनट का था और उसमें भी दो मिनट शायरी के थे. मुझको सनम मिले या मेरी रुसवाई हो, कुछ तार्रुफ भला इस बात से क्या है मुझको. चंद लम्हे तो मेरी उम्र में ऐसे आए, जिसमें दुश्मनों से भी बहुत प्यार मिला है मुझको. किस तरह उम्र का दुश्वार सफर तय होगा, बीच रास्ते में कोई छोड़ गया है मुझको. इन भावपूर्ण पंक्तियों के साथ आखिरकार 58 वर्षीय अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के साथ चार वर्षों के अलगाव के दर्द को जाहिर कर दिया.
 
अमर सिंह 5 अगस्त को लखनऊ में जनेश्वर मिश्र पार्क के लोकार्पण समारोह में मुलायम सिंह यादव के बुलावे पर आए थे और मंच की अगली पांत में बैठे थे. हालांकि भाषण की शुरुआत में ही अमर सिंह ने अपनी मौजूदगी को गैर-राजनैतिक और नितांत व्यक्तिगत कहकर अटकलों के दौर को थामने की कोशिश की, लेकिन तब तक राजनैतिक गलियारे में अमर सिंह और मुलायम सिंह की नजदीकियों के निहितार्थ तलाशे जाने लगे थे.

जनवरी, 2010 में सपा से इस्तीफा देने के बाद यह पहला मौका था, जब अमर सिंह और मुलायम सिंह यादव एक साथ एक मंच पर मौजूद थे. अलग होने के बाद अमर सिंह ने 23 अक्तूबर, 2010 को लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान मुलायम सिंह पर लोहिया के सिद्घांतों की बलि चढ़ाकर परिवारवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था. अमर सिंह ने कहा था, “सपा में सिर्फ दो अपवाद थे—एक जनेश्वर मिश्र और दूसरे अमर सिंह. एक को रामजी खा गए तो दूसरे को रामगोपाल.” यह संयोग ही था कि समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र के जन्मदिन पर अमर सिंह ने सपा से दोस्ती की पींगें बढ़ाकर एक बार फिर पार्टी के भीतर अपवाद बनने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है.

अमर सिंह खुद को तो मुलायमवादी कहते रहे, लेकिन अपने नए समाजवादी रूप का जिक्र उन्होंने बड़ी चतुराई से किया. वे बोले, “जनेश्वर जी मुझसे कहते थे कि तुम कैसे समाजवादी हो? न तो तुमने चुनाव लड़ा, न जेल गए. अब तो मैं जेल भी जा चुका हूं और चुनाव भी लड़ चुका हूं. आज जनेश्वर जी जिंदा होते तो मैं उनसे पूछता कि आज तो मैं आपकी समाजवादी परिभाषा पर खरा उतरता हूं.” लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति विभाग के प्रोफेसर डॉ. रमेश दीक्षित कहते हैं, “लोकसभा चुनाव के बाद सपा और अमर सिंह केंद्रीय राजनीति में काफी कमजोर हो गए हैं. अब दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है.”

तकनीकी तौर पर अमर सिंह अब भी राज्यसभा में सपा के कोटे से सांसद हैं और उनका कार्यकाल इसी वर्ष नवंबर में खत्म हो रहा है. दोबारा राज्यसभा में जाने के लिए उन्हें मुलायम सिंह की दोस्ती की दरकार है. हालांकि इन अटकलों को खारिज करते हुए अमर सिंह कहते हैं कि वे राज्यसभा में जाने के लिए फिल्म अभिनेत्री जया बच्चन की तरह ओछा काम नहीं करेंगे. दूसरी तरफ मुलायम सिंह अपनी राष्ट्रीय नेता की छवि को लेकर चिंतित हैं. वे जल्द ही महाराष्ट्र समेत कुछ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में बढिय़ा प्रदर्शन कर सपा को हताशा से बाहर निकालना चाहते हैं और इसमें अमर सिंह मददगार साबित हो सकते हैं. इतना ही नहीं, यूपी में सत्ता संभालने के बाद से पार्टी के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जो सरकार और देश के बड़े उद्योगपतियों के बीच कड़ी बन सके.

अमर सिंह की वापसी की अटकलों के बीच पार्टी में उनके घोर विरोधी राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव और कैबिनेट मंत्री आजम खान ने लोकार्पण समारोह से गायब रहकर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है. इसी के साथ शायद सपा के भीतर खींचतान और तनातनी के एक नए दौर की भी शुरुआत हो गई है.

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