अनजाने नायकः जीव रक्षक

''हम लोगों को एक बार यह समझा सके कि वन्यजीवों का संरक्षण क्यों जरूरी है तो सैकड़ों स्वयंसेवी सामने आ जाएंगे''

Advertisement
नीलोत्पल बरूआ नीलोत्पल बरूआ

कौशिक डेका

  • काजीरंगा,
  • 24 दिसंबर 2019,
  • अपडेटेड 3:32 PM IST

मनोज गोगोई ने जीवन में बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाएं नहीं पालीं. दोस्त की जीप में ड्राइवर के तौर पर पर्यटकों को काजीरंगा नेशनल पार्क घुमाने में वे खुश थे. 2005 में एक दोपहर के वक्त पर्यटकों का इंतजार करते गोगोई ने पार्क के बीच से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे बैठे एक आदमी को देखा जो चिडिय़ों के बारे में किसी रंगीन किताब में खोया हुआ था. उन्होंने पीछे से झांक कर किताब में देखा. थोड़ी देर बाद वह आदमी पलटा और पूछा, ''क्या तुहें पक्षी पसंद हैं?'' वे बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) से जुड़े शोधार्थी अशोक वर्मा थे.

Advertisement

उसी समय गोगोई का वन्यजीव रक्षक के रूप में रूपांतरण शुरू हुआ. वर्मा ने गोगोई को एक छोटी दूरबीन उपहार में दी और उससे चिडिय़ों को तलाश करना सिखाया. गोगोई थोड़े समय में उन्नति करके टूरिस्ट गाइड बन गए. अगले साल उन्होंने कुछ महीने मुंबई स्थित बीएनएचएस में स्वयंसेवक के रूप में बिताए और वन्य जीवन के बारे में और जानकारी हासिल की.

10 अक्तूबर, 2007 तक पूर्णरूपेण गाइड बन चुके गोगोई ने काजीरंगा नेशनल पार्क के पास देखा कि कुछ ग्रामीण एक अजगर को मारने की कोशिश कर रहे थे क्योंकि उसने एक मुर्गी निगल ली थी. गोगोई ने कौशल के साथ उसे बचा लिया और पार्क में छोड़ दिया. इसके कुछ समय बाद उन्होंने अपने 11 दोस्तों के साथ द नेचुरलिस्ट फॉर रीहैबिलिटेशन ऑफ स्नेक्स ऐंड बर्ड्स नाम से एक गैर-सरकारी संस्था शुरू की. संस्था का उद्देश्य था सूचना प्रदाताओं का एक नेटवर्क तैयार करना और वन्यजीवों को मुश्किलों से बचाने के मामलों में प्रथम प्रतिक्रियादाता बनना. गोगोई ने अब तक न केवल सैकड़ों सरीसृपों को बचाया है बल्कि वे गांव-दर-गांव जा कर लोगों को समझाते हैं कि वे सरीसृपों को न मारें और कभी सांप दिखने पर उन्हें सूचित करें.

Advertisement

चिडिय़ों और जंगली जानवरों को बचाना, खास तौर पर बाढ़ के दौरान, अपने आप में चुनौती है. गोगोई के पास न तो धन था, न ही बचाए गए वन्यजीवों को रखने के लिए कोई पुनर्वास केंद्र था. गोगोई बताते हैं, ''मुझे मात्र 1,500 रु. वेतन मिलता था और पर्यटन सीजन में मैं हर महीने 50 से 60,000 रु. कमा लेता था. वे सारा पैसा मैं वन्यजीवों को बचाने और उनके पुनर्वास पर खर्च कर देता था.''

वे खुशकिस्मत थे कि टूरिस्ट गाइड के रूप में सोनित कुमार सेन नाम के जिस पहले पर्यटक को वे पार्क में ले गए थे, उसने नजदीकी गांव में जमीन खरीद कर गोगोई के लिए जीव संरक्षण केंद्र बना दिया. 2013 में कॉर्बेट फाउंडेशन ने उनसे काजीरंगा में रेस्क्यू सेंटर चलाने के लिए संपर्क किया. फाउंडेशन ने उन्हें 'वाइल्ड लाइफ वारियर' पुरस्कार से समानित किया.

अब गोगोई को उम्मीद है कि वे जल्दी ही जीव संरक्षण जागरूकता के प्रसार के लिए एक केंद्र स्थापित कर सकेंगे. एक धारीदार करैत और दो पानी वाले डोड़हा सांपों को जंगल में छोडऩे की तैयारी करते हुए गोगोई कहते हैं, ''हम लोगों को एक बार यह समझा सकें कि वन्यजीवों को बचाना क्यों जरूरी है तो फिर मेरे जैसे सैकड़ों स्वयंसेवी सामने आ जाएंगे.''

Advertisement

***

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement