शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने 28 जनवरी को जब देश में बनाए जाने वाले 100 स्मार्ट शहर में से पहले 20 शहरों की सूची जारी की तो दो तरह की प्रतिक्रिया हुई. पहली यह कि अब मोदी सरकार एक्शन के मूड में आ गई है और शहरों में काम दिखाई देगा. दूसरी प्रतिक्रिया आई कि सरकार ने पहले से ही बेहतर हालत वाले शहरों को चुना है और बिहार और उत्तर प्रदेश के शहरों से नाइंसाफी हुई. दोनों ही प्रतिक्रियाएं बहुत गलत नहीं है, क्योंकि स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए जिन शहरों को चुना गया है, उनके चयन का आधार नया है.
देश में नेहरू युग से लेकर मनमोहन सिंह तक के कार्यकाल में एक अघोषित गांधीवादी परंपरा चली आ रही थी कि जो सबसे कमजोर हो, उसे योजनाओं का पहला लाभ मिले. यही बात गांव और शहर के लिए लागू की जाने वाली योजनाओं पर भी लागू होती थी. लेकिन स्मार्ट सिटी योजना में देश के बहुत से शहरों से अपनी-अपनी दावेदारी पेश करने के लिए कहा गया. शहरी विकास मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि दावेदारी के दौरान शहरों को बताना था कि उन्होंने ई गवर्नेंस, स्वच्छ भारत, शौचालय निर्माण बुनियादी ढांचा, सर्विस डिलिवरी सिस्टम, अभिलेखों को डिजिटाइजेशन जैसे काम किस हद तक कर लिए हैं. ऐसे में जब शहरों के प्रशासन ने अपनी दावेदारी पेश की तो जिन शहरों में पहले से ही काम चल रहा था, उन्हीं शहरों को पहले स्मार्ट बनने का मौका मिला.
तो नायडू के इस सख्त लहजे का व्यावहारिक मतलब क्या है? दरअसल, स्मार्ट बनने के लिए हर शहर को केंद्र सरकार हर साल 100 करोड़ रु. देगी और इतनी ही रकम संबंधित राज्य सरकार को भी देनी है. और बाकी की रकम का इंतजाम शहर के नगर निकायों को करना है. यानी केंद्र ने घोषणा तो 50,000 करोड़ रु. से अधिक की योजना की की है, लेकिन असल में वह देगा सिर्फ 10,000 करोड़ रु. ही. बाकी पैसे का इंतजाम नगर निगमों को स्पेशल पर्पज व्हीकल (एसपीवी) के जरिए करना है. एसपीवी परियोजना के लिए फंड जुटाने का एक सैद्धांतिक ढांचा होता है, इसमें यह तय होता है कि निकाय पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप और अन्य स्रोतों से कितना पैसा जुटाएंगे. स्मार्ट शहर के सपनों में खोए लोगों को केंद्र ने अभी से बता दिया है कि नगर निगम इस काम के लिए नागरिकों से बढ़ा हुआ टैक्स वसूल करेंगे. स्मार्ट शहर की स्मार्ट सुविधाओं के लिए भी नागरिकों को यूजर चार्जेज देने पड़ेंगे.
तो इस काम को करने के लिए पैसे के अलावा और क्या चीजें चाहिए? इसमें पहली चुनौती तो यहां पहले से मौजूद 2,700 मकानों को हटाए जाने की है. इसके अलावा इलाके के 27,000 पेड़ों को भी परियोजना के लिए काटना पड़ सकता है. इलाके के कांग्रेस पार्षद अमित शर्मा परियोजना को बिल्डरों को फायदा पहुंचाने का षड्यंत्र मानते हैं. उनका कहना है किसी खाली जगह पर नया मुहल्ला बसा लेने की बजाए पॉश इलाके और हरियाली को निशाने पर लिया जा रहा है. वे इसके खिलाफ अदालत जाने की तैयारी में हैं. परियोजना के खिलाफ शहर में कैंडल मार्च भी हो चुका है.
इसी तरह इंदौर में राजवाड़ा, खान नदी, सुभाष रोड, बड़ा गणपति रोड और लाल बाग रोड के पास 742 एकड़ जमीन में स्मार्ट सिटी बननी है. यहां शिक्षा और स्वास्थ्य का इन्फ्रास्ट्रक्चर, इक्यूबेशन सेंटर (प्रतिभाओं को आधुनिक सुविधाएं देने वाली जगह), अंडर ग्राउंड केबल, पैदल चलने के लिए ग्रीन कॉरिडोर के साथ ही स्लम रीडेवलपमेंट करना शामिल है. इससे 1.5 लाख आबादी को फायदा होगा. इस पर 5,099 करोड़ रु. खर्च आना है. वहीं, जबलपुर में राइट टाउन, नेपियर टाउन, गोल बाजार, सिविक सेंटर और रानी ताल के 743 एकड़ जमीन पर स्मार्ट सिटी बननी है. यह भी शहर का अपेक्षाकृत बेहतर इलाका है. यहां की परियोजना 3,998 करोड़ रु. में तैयार होगी.
यानी मध्य प्रदेश के तीन शहरों को ही करीब 13,500 करोड़ रु. चाहिए, जबकि केंद्र सरकार से मिलेंगे सिर्फ 1,500 करोड़ रु. इसके अलावा मकानों को हटाने से जनता के भड़कने का खतरा अलग से है. तो ऐसे में मध्य प्रदेश के शहर क्या शांति से अपने इन मोहल्लों को स्मार्ट बना लेंगे? मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन आयुक्त विवेक अग्रवाल का सपाट जवाब है, ''इस प्रोजेक्ट में किसी भी तरह की दिक्कत नहीं आने वाली. बहुत जल्दी ही प्रोजेक्ट की तैयारियां शुरू कर दी जाएंगी.'' उन्हें भरोसा है कि एसपीवी पैसे का इंतजाम कर देगा. लेकिन देश में निवेश के खराब माहौल और गिरती अर्थव्यवस्था के बीच मोहल्ला स्मार्ट बनाने के लिए पैसा जुनाना उनके भरोसे से कहीं कठिन होगा.
पीयूष बबेले