गीता प्रेस: विरासत का संरक्षण स्थल

हर पीढ़ी को धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराते रहने का दायित्व निभाया है गीता प्रेस ने.

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विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

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  • 11 अगस्त 2015,
  • अपडेटेड 3:21 PM IST

कभी-कभी गीता प्रेस के योगदान के बारे में बात करते हुए कुछ लोग उसे एक धर्म विशेष की प्रकाशन संस्था से ज्यादा मान्यता देने को तैयार नहीं होते. यह उचित नहीं. दरअसल हिंदू धर्म के जो आर्ष ग्रंथ हैं, वे ही भारतीय दर्शन और काव्य के भी मूल ग्रंथ माने जाते हैं. श्रीमद्भगवद् गीता, वाल्मीकि रामायण, महाभारत, अध्यात्म रामायण या महाकवि तुलसी रचित रामचरित मानस जैसी तमाम कृतियां केवल हिंदू धर्म की नहीं, बल्कि भारत की पहचान वाले सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का उद्धरण, उसकी मिसालें प्रस्तुत करती हैं. इन्हें जाने बिना भारत को, भारतीय साहित्य, कला, विज्ञान को जानना कठिन है.

अपनी स्थापना से थोड़े समय के अंदर ही हिंदू धर्मग्रंथों, भारतीय महाकाव्यों और महान दार्शनिक ग्रंथों का त्रुटिहीन प्रकाशन करके और उसे सस्ते मूल्य पर जनसाधारण को उपलब्ध कराकर वैसे तो गीता प्रेस ने दुनिया भर में विशिष्ट योगदानकर्ता के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित कर ली थी, लेकिन कालांतर में उसने अनजाने ही एक और गुरुतर दायित्व को निभाना शुरू कर दिया. यह था आने वाली हर पीढ़ी को उसकी धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत से निरंतर परिचित कराते रहने का.

मैं एक गोरखपुरवासी भी हूं. इस रूप में भी पाया है कि अब भी दुनिया में हमारी पहचान का यह सबसे बड़ा प्रतीक चिन्ह है. लंदन पुस्तक मेले में पॉपुलर राइटिंग पर आयोजित सत्र में चेतन भगत आदि लोकप्रिय लेखकों के साथ मुझे भी बोलना था. बेस्टसेलर्स का जिक्रऔर उसकी एक लाख प्रति बिकने की चर्चाओं के बीच जब मैंने कहा, मैं उस शहर से आता हूं जहां के एक मासिक कल्याण के स्थायी ग्राहकों की संख्या इससे दो गुना है तो वहां उपस्थित श्रोता समुदाय ने करतल ध्वनि से इसका स्वागत किया. गीता प्रेस पूरी दुनिया में हमारी प्रतिष्ठा और पहचान का सर्वाधिक आश्वस्तकारी स्रोत रहा है.

यहां एक बात का जिक्र उचित ही होगा. करपात्री जी महाराज ने हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए आवश्यक शर्तों के बारे में कहा था कि “जो वेद में विश्वास करता हो”. अनेकानेक ग्रंथों का प्रकाशन करने वाले गीता प्रेस ने आज तक वेदों का प्रकाशन नहीं किया. एक सवाल और भी जेरेबहस है कि ऐसे विशिष्ट महत्व के संस्थान के प्रति समाज और शासन व्यवस्था की कोई जिम्मेदारी बनती है या नहीं? मुझे लगता है कि दोनों की जिम्मेदारी है. अगर भारतीय समाज यह कहता है कि गीता प्रेस या उसके मुखपत्र कल्याण ने उनके जीवन की दिशा बदल दी है तो जाहिर है कि समाज निर्माण में उसकी महती भूमिका रही है. अब अगर ऐसा है तो समाज का भी यह दायित्व बनता है कि उसके विषय में सोचे.    
(प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हैं)

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