Being सलमान: मुझे कैसी लगी 'बजरंगी भाईजान'

बतौर सलमान का सुपरफैन 'किक' की रिलीज के पूरे 355 दिन बाद बड़े पर्दे पर सलमान के दीदार हुए हैं. इसमें कोई दोराय नहीं है कि 2009 में 'वांटेड' और फिर '2010' में दबंग ने सिनेमा का सलमान जॉनर विकसित किया.

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Film 'Bajrangi Bhaijaan' Film 'Bajrangi Bhaijaan'

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 21 जुलाई 2015,
  • अपडेटेड 9:45 AM IST

फिल्म का नाम: बजरंगी भाईजान
डायरेक्टर: कबीर खान
स्टार कास्ट: सलमान खान, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, करीना कपूर, हर्षाली मल्होत्रा, ओम पुरी
रेटिंग: 4/5

बतौर का सुपरफैन 'किक' की रिलीज के पूरे 355 दिन बाद बड़े पर्दे पर सलमान के दीदार हुए हैं. इसमें कोई दोराय नहीं है कि 2009 में 'वांटेड' और फिर '2010' में दबंग ने सिनेमा का सलमान जॉनर विकसित किया. औसत कहानी के बावजूद सलमान जॉनर की फिल्में सुपरहिट साबित हुईं. लेकिन 'बजरंगी भाईजान' कहीं से भी इस नवविकसित जॉनर की फिल्म नहीं है.

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की शुरुआत कश्मीर की बर्फीली वादियों से होती है, वहीं 2 घंटे 43 मिनट बाद वह बर्फ आंखों की कोर में पिघलती महसूस होती है. बीते छह वर्षों में यह पहला मौका है, जब‍ सलमान की फिल्मों ने मनोरंजन करने के साथ ही दर्शकों खासकर उनके फैंस को रूलाया है. यूं तो भावुकता का पाठ 'किक' में भी पढ़ाया गया था, लेकिन तब 'डेविल का हैंगओवर' ज्यादा था.

का टीजर 28 मई को और ट्रेलर 18 जून को रिलीज हुआ. फिल्म को लेकर उत्सुकता बढ़ी, हालांकि कहानी का आकलन तभी हो गया. ऐसे में मुझ जैसे सैंकड़ों फैंस के लिए फिल्म को लेकर उत्सुकता बनाए रखने की एकमात्र रेसिपी सलमान थें. 17 जुलाई को थि‍एटर में जब पर्दे पर सलमान की एंट्री हुई तो खूब तालियां बजी, लेकिन अंत आते-आते तालियों से ज्यादा रूमाल जरूरत बन गई. ऐसे में बहुत संभव है‍ कि फैंस के एक बड़े वर्ग को इस बार थोड़ी निराशा हुई हो.

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...लेकिन बदल गया मिजाज
यह फिल्म 2009 के बाद से सलमान खान और उनकी फिल्मों को लेकर बने तमाम पूर्वाग्रहों को तोड़ती है. फिल्म की कहानी स्वीट और सिंपल है, जिसमें मारधाड़ और करिश्माई स्टंट्स की कोई गुंजाइश नहीं थी. यह अच्छा है कि न तो कबीर खान और न ही सलमान ने ऐसा कोई रिस्क ही उठाया. ऐसे में लंबे अरसे बाद अपने हीरो को एक संजीदा किरदार में देखकर अच्छा लगता है. उससे भी अधि‍क खुशी तब होती है, जब अब तक सलमान के धुर विरोधी रहे आलोचक दबे हुए शब्दों में ही सही फिल्म की सफलता और इसमें सलमान की सराहना करते हैं.

डायरेक्टर साहब अगली बार यहां ध्यान देना
की सफलता को देखते हुए सलमान खान ने हाल ही घोषणा की है कि वो कबीर खान के साथ तीसरी फिल्म करने वाले हैं. कबीर खान अच्छे डायरेक्टर हैं. सलमान खान के साथ उनकी ये दूसरी फिल्म थी, लेकिन जो कमी 'एक था टाइगर' में खली वही इस फिल्म के साथ भी है. कबीर साहब, जब आपके पास कहने के लिए इतना कुछ है तो आप पर्दे पर शुरुआती माहौल बनाने में इतना समय क्यों लगा देते हैं.

'एक था टाइगर' की तरह 'बजरंगी भाईजान' की शुरुआत भी धीमी है. फिल्म जब तक अपनी रौ में आती है थोड़ी उबाऊ लगने लगती है. लेकिन अंत आते-आते सबकुछ बढ़िया हो जाता है.

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'प्रेम' की वापसी के संकेत
इस बार फिल्म में सलमान का अभि‍नय पक्ष भी देखने को मिला है और वह अपनी 'दबंग' छवि से बाहर निकलने के लिए प्रयासरत दिखते हैं. आगे दिवाली पर उनकी 'प्रेम रतन धन पायो' आने वाली है. इसमें भी उनका किरदार कुछ-कुछ ऐसा ही है. यानी सबकुछ ठीक रहा तो पर्दे पर एक बार फिर 'प्रेम' की वापसी होने वाली है.

नवाजुद्दीन की एंट्री फिल्म को गति देती है. सलमान एक एक्टर से कहीं ज्यादा एंटरटेनर हैं. वह यह जानते हैं कि पर्दे पर नवाजुद्दीन की एक्टिंग उन्हें फ्रेम से गायब कर सकती है, लेकिन इसके बावजूद जिस तरह उन्होंने लगातार दूसरी बार नवाजुद्दीन का साथ चुना है, यह उनकी महानता है. क्योंकि जाहिर तौर पर कोई भी बड़ा एक्टर अपने सामने खुद से बेहतर कलाकार को पनपने नहीं देना चाहता. नवाजुद्दीन अगली ईद रिलीज 'सुल्तान' में सलमान का साथ देंगे.

शाहिदा/मुन्नी के किरदार में हर्षाली फिल्म की जान है. वह वाकई फिल्म की ट्रम्प कार्ड है. बिना कुछ बोले हुए भी हर फ्रेम में उसकी मासूमियत सब पर भारी पड़ती है. करीना के हिस्से ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन वह सुंदर लगी हैं.

फिल्म में हर पहर के लिए एक गीत है. सलमान की एंट्री से लेकर दरगाह पर इबादत और रास्तों की मशक्कत तक, हर समय कोई न कोई गीत चलता रहता है. ऐसे में बीच में कहीं 'आज की पार्टी' वाला ट्रैक भी लगाया ही जा सकता था.

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...क्योंकि सबकुछ सिनेमा नहीं होता

फिल्म में कुछ सीन ऐसे भी हैं जो गले नहीं उतरते. मसलन, अंतीम सीन में लोगों द्वारा सीमा पर लटके ताले को तोड़ना और नैतिक बनकर अपनी-अपनी सीमा में ही खड़े रहना. पाकिस्तानी सेना का व्यावहारिक अंदाज से इतर आवाम और सरकार के सामने सरेंडर करना या फिर शुरुआती सीन में शाहिदा का ट्रेन से उतरना, लेकिन ऐन मौके पर ट्रेन की सुरक्षा में पहरा दे रहे घुड़सवार दल का गायब हो जाना.

खैर इतना चलता है क्योंकि सबकुछ असल जैसा हो तो वो सिनेमा कैसे कहलाएगा और फिर मनोरंजन भी एक बात होती है. लेकिन यह भी सच है कि जिंदगी सिनेमा नहीं. यह फिल्म में भी रिलीज हुई है. सरहद से लेकर सियासत तक पाकिस्तान की सेना और सरकार से कोई उम्मीद पालना अब बेमानी सा हो गया है, ऐसे में उम्मीद यह है कि कम से कम सरहद पार हमारे भाइयों को भी 'बजरंगी भाईजान' भावनात्मक डोर में बांधेगी और वो भी शाहिदा, पवन कुमार चतुर्वेदी और चांद मुहम्मद के बहाने पल रहे सियासी तानाबाना से इत्तफाक रखेंगे क्योंकि दोनों मुल्कों के रिश्तों में कभी तो सुबह आएगी...

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