बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है महाराष्‍ट्र

महाराष्‍ट्र की धरती बूंद बूंद को तरस रही है. सूरज की सीधी किरणें जमीन का सीना चीरने पर आमादा हैं. चालीस साल में कुदरत का ऐसा कहर कभी नहीं देखा गया. ऐसा अकाल पहले कभी नहीं पड़ा, इंसान इतना बेबस कभी नहीं दिखा.

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  • नई दिल्‍ली/पुणे,
  • 01 अप्रैल 2013,
  • अपडेटेड 4:16 PM IST

महाराष्‍ट्र की धरती बूंद बूंद को तरस रही है. सूरज की सीधी किरणें जमीन का सीना चीरने पर आमादा हैं. चालीस साल में कुदरत का ऐसा कहर कभी नहीं देखा गया. ऐसा अकाल पहले कभी नहीं पड़ा, इंसान इतना बेबस कभी नहीं दिखा.

अभी गर्मी का प्रचंड रूप सामने नहीं आया है और अभी से ही महाराष्ट्र के 35 में से 16 जिले अकालग्रस्त हैं. करीब 11 हजार गांवों को सूखे ने अपनी चपेट में ले रखा है. राज्य की 30 फीसदी यानी करीब सवा ग्यारह करोड़ जनता पानी की बूंद-बूंद के लिए तरस रही है.

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खेत-खलिहानों में सब्जियों व फसलों के लिए पानी की बात तो छोड़ ही दीजिए, लोगों को पीने का पानी भी बड़ी मुश्किल से मिल रहा है. महाराष्ट्र के 16 में से 5 जिलों की हालत बेहद खराब है.

वे पांच जिले हैं:
1. जालना
2. उस्मानाबाद
3. बीड़
4. सोलापुर
5. यवतमाल

कुदरत नाराज है, लिहाजा हर दिन पानी की किल्लत भी बढ़ती ही जा रही है.

सबसे खराब हालत है मराठवाड़ा की, जहां सिर्फ दस फीसदी पानी बचा है. नासिक डिविजन में 23 प्रतिशत पानी है और अमरावती में 30 फीसदी. पुणे डिविजन के बांधों में सिर्फ 31 प्रतिशत पानी बचा है और नागपुर डिविजन में 36 फीसदी. कोंकण डिविजन में 53 फीसदी पानी है.

यानी मराठवाड़ा की हालत सबसे ज्यादा खराब है और मराठवाड़ा में कुल आठ जिले हैं.

1. औरंगाबाद
2. नांदेड़
3. लातूर
4. जालना
5. बीड़
6. परभनी
7. उस्मानाबाद
8. हिंगोली

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ऐसा नहीं है कि मराठवाड़ा पहली बार पानी की कमी से जूझ रहा है लेकिन इस बार के भीषण अकाल ने चालीस साल के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं.

सूखे से निपटने के लिए सरकार हर मुमकिन कोशिश कर रही है. साल 2012-13 में करीब 2100 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं. लेकिन कुदरत के आगे सारी कोशिशें बेकार ही साबित हो रही हैं.

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