जब पिछले साल नवंबर में भारत की सियासत बड़े परिवर्तन के लिए पर तोल रही थी, ठीक उसी वक्त बीजिंग में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अपने तीसरे प्लेनम में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अर्थव्यवस्था को रिफ्रेश करने की जुगत में लगी थी. चीन के सुधार पुरोधा देंग जियाओपिंग ने आर्थिक सुधारों को चीन की (माओ की क्रांति के बाद) दूसरी क्रांति भले ही कहा हो लेकिन देंग से जिनपिंग तक आते-आते 35 साल में चीनी नेतृत्व को यह एहसास हो गया कि ज्यादा घिसने से सुधारों का मुलम्मा भी छूट जाता है. इसलिए कम्युनिस्ट पार्टी की महाबैठक से सुधारों का जो नया एजेंडा निकला वह ‘‘मेड इन चाइना’’ की ग्लोबल धमक पर नहीं बल्कि देश की भीतरी तरक्की पर केंद्रित था.
दुनिया अचरज में थी कि विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अपनी देसी इकोनॉमी में ऐसा क्या करने वाली है जिससे 1.35 अरब लोगों की आय में बढ़ोतरी होती रहेगी? संयोग से राष्ट्रपति जिनपिंग के दिल्ली पहुंचने से पहले दुनिया को चीन की ‘‘तीसरी क्रांति’’ के एजेंडे का मोटा-मोटा खाका मिल गया है. चीन 2025 तक अपने जीडीपी को दोगुना करने वाला है. यह करिश्मा इंटरनेट इकोनॉमी से होगा, जो चीन के जीडीपी में 2,200 अरब डॉलर का योगदान करेगी. यकीनन, कंप्यूटर तकनीकों के बड़े पैरोकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने चीनी दोस्तों से यह जरूर जानना चाहेंगे कि चीन इन्क्लूसिव ग्रोथ के लिए कैसा डिजिटल डिजाइन बना रहा है.
पिछले साल जब चीन ने अपनी ग्रोथ का फॉर्मूला बदलने का फैसला किया तो दुनिया को हैरत हुई थी. लेकिन अब ग्लोबल निवेशकों को चीन के विराट डिजिटल मंसूबे की जानकारी मिलने लगी है. ग्लोबल कंसल्टेंसी फर्म मैकेंजी ने अपनी एक ताजा रिपोर्ट में इस बदलाव का ब्लूप्रिंट पेश किया है. इंटरनेट इकोनॉमी चीन के ग्रोथ इंजन का ईंधन होगी, जो उत्पादकता, इनोवेशन और खपत बढ़ाने की अगुआई करते हुए 2025 तक जीडीपी की बढ़ोतरी में 22 फीसदी तक योगदान करेगी. 2010 तक चीन की इंटरनेट आधारित अर्थव्यवस्था का जीडीपी में हिस्सा 3.3 फीसदी था, जो 2013 में 4.4 फीसदी पर पहुंचने के साथ अमेरिका से ज्यादा बड़ा हो गया है. 2013 में 70 करोड़ सक्रिय स्मार्ट डिवाइसेज (फोन-टैबलेट) के साथ चीन अब 63 करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं का देश है. जहां ताओबाओ और टीमॉल जैसे ई-कॉमर्स मार्केटप्लेस पर अब प्रतिदिन 6 अरब डॉलर के सौदे होते हैं.
सुधारों के पिछले दौर में चीन ने अपनी विशाल श्रम शक्ति के जरिए ग्लोबल बाजारों को ‘‘मेड इन चाइना’’ उत्पादों से पाट दिया था लेकिन कमजोर उत्पादकता, औसत क्वालिटी और नए प्रयोगों की कमी ने चीन को सस्ते माल की फैक्ट्री में बदल दिया. अब इंटरनेट उत्पादकता बढ़ाने और इनोवेशन का जरिया होगा. चीनी कंपनियां अगले साल तक अपनी कमाई का चार फीसदी हिस्सा डिजिटल तकनीकों पर खर्च करेंगी. विशेषज्ञ आंक रहे हैं कि नए इंटरनेट एप्लीकेशंस से अगले दशक में चीन की श्रम उत्पादकता 22 फीसदी तक बढ़ जाएगी. फॉरेस्टर और आइरिसर्च के मुताबिक, चीनी लोगों ने ई-कॉमर्स पर 296 अरब डॉलर खर्च कर पिछले साल ही अपने मुल्क को अमेरिका से बड़ा ई-कॉमर्स बाजार बना दिया था, इस साल मोबाइल कॉमर्स में भी चीन अमेरिका से आगे होगा. कम लागत, सरप्लस उत्पादन और विशाल वितरण तंत्र पर आधारित इंटरनेट इकोनॉमी चीन की अर्थव्यवस्था को देसी खपत की ताकत दे रही है.
अगले कुछ वर्षों में चीन के माइक्रो मल्टीमनेशनल्स ग्लोबल चर्चा का विषय होंगे. छोटे और मझोले उद्योग चीन के जीडीपी में 70 फीसदी का योगदान करते हैं और इस विशाल अर्थव्यवस्था में रोजगार और इनोवेशन का सबसे बड़ा जरिया हैं. चीन के मैन्युफैक्चरिंग साम्राज्य की सबसे छोटी इकाइयों में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना चीन के नए सुधारों का बड़ा फोकस होने वाला है ताकि अलीबाबा जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के जरिए इन्हें निर्यात बाजार और ग्लोबल बाजारों से जोड़कर माइक्रो मल्टीनेशनल बनाया जा सके. डिजिटल ग्रोथ की यह विशाल परियोजना शुरुआत में कई पारंपरिक रोजगारों को खत्म करेगी लेकिन चीन की सरकार ने रोजगार के नुकसान और नए अवसरों के सृजन का हिसाब-किताब लगा लिया है. मैकेंजी की रिपोर्ट के मुताबिक, इंटरनेट इकोनॉमी 2025 तक करीब 3.1 करोड़ रोजगार खत्म करेगी लेकिन 4.6 करोड़ नए रोजगार तैयार भी करेगी.
कम्युनिस्ट पार्टी के तीसरे प्लेनम के बाद जिनपिंग ने सुधारों का नया एजेंडा घोषित करते हुए चीनी ग्रोथ को असंतुलित, बदहवास और सामाजिक विभेद से भरा यूं ही नहीं कहा था. 1992 आने तक देंग जियाओपिंग भी कह उठे थे कि अगर चीन ने अपनी आबादी की जिंदगी बेहतर नहीं की तो सुधार अंधी गली में गुम हो जाएंगे. चीन में ग्रोथ के फायदों का बंटवारा समान रूप से नहीं हुआ है, इसलिए विशाल आबादी में समृद्धि के कुछ द्वीप असंतोष का उत्पादन कर रहे हैं. चीन को अपनी प्रगति का अगला एजेंडा तय करने के लिए किसी ऐसे फॉर्मूले की तलाश थी जिसके जरिए आर्थिक ग्रोथ के फायदों को बड़ी आबादी में बांटा जा सके. इंटरनेट और डिजिटल तकनीकों में चीन को अपनी ग्रोथ को इनक्लूसिव (समावेशी) बनाने का नुस्खा मिल गया है. 2025 में दुनिया इस बात से चमत्कृत नहीं होगी कि चीन ने एक दशक में अपना राष्ट्रीय उत्पादन (जीडीपी) दोगुना यानी लगभग 20 ट्रिलियन डॉलर कर लिया, हैरत इस बात पर होगी कि यह करिश्मा डिजिटल तकनीकों के सहारे हुआ है. चीन की इस तीसरी क्रांति के मजमून में भारत के लिए ढेर सारे सूत्र छिपे हैं.
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अंशुमान तिवारी