रक्षा क्षेत्र में देसीकरण के मामले में कितने कोस चले हैं हम

सरकार की ''मेक इन इंडिया" नीति की राह में एक और बड़ा रोड़ा निजी क्षेत्र को दिए गए ऑर्डरों का अभाव है.

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मेक इन इंडिया मेक इन इंडिया

संध्या द्विवेदी / मंजीत ठाकुर

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  • 08 मई 2018,
  • अपडेटेड 8:22 PM IST

पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने कहा था, उनका मंत्रालय देसीकरण के लक्ष्य पर काम कर रहा है. उन्होंने कहा, ''डॉ. कलाम की रिपोर्ट के मुताबिक हमारा लक्ष्य 70 फीसदी देसीकरण है. इसमें चार से पांच साल लगेंगे. इस सरकार के कार्यकाल के अंत तक हम 60 फीसदी के आंकड़े को छू लेंगे."

केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद ''मेक इन इंडिया" की दिशा में सिलसिलेवार कई उपायों को लागू किया है, इसमें रक्षा क्षेत्र को 49 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खोले जाने (और कुछ मामलों में इससे ज्यादा) से लेकर देसी उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए इंडीजीनियसली डिजाइंड, डेवेलप्ड ऐंड मैन्युफैक्चर्ड (आइडीडीएम) श्रेणी का निर्माण शामिल है.

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सार्वजनिक क्षेत्र के बाहर आवश्यक चुनौतियां और निवेश—प्रौद्योगिकी, उत्पाद विकास सक्षमता और इन्फ्रॉस्ट्रक्चर के सृजन के लिए—बहुत भारी हैं और इनमें वक्त लगेगा. फिलहाल निजी क्षेत्र की भागीदारी बेहद मामूली है, जो कुल रक्षा क्षेत्र में 5 फीसदी से भी कम है.

इसीलिए सरकार ने निजी क्षेत्र की कंपनियों को इस उम्मीद से इस क्षेत्र में प्रवेश करवाया है, ताकि वे दोयम दर्जे के खिलाड़ी से स्वतंत्र रक्षा इकाइयों में तब्दील हो सकें और अपने बलबूते रक्षा उपकरणों की आपूर्ति कर सकें.

पिछले दो वर्षों के दौरान सरकार ने डीपीएसयू को दी जाने वाली प्राथमिकता को वापस ले लिया है, जैसे सीमा और उत्पाद शुल्क में रियायत वगैरह, ताकि निजी क्षेत्र उसके साथ बराबरी से प्रतिस्पर्धा में आ सके. नीतिगत मोर्चे पर तो काफी हलचल है लेकिन क्रियान्वयन के स्तर पर सुस्ती बरकरार है.

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कम से कम तीन बड़े अनुबंध—लैंडिंग प्लेटफॉर्म डॉक्स का निर्माण (ऐसे जहाज जो सैन्य टुकड़ियों और सैन्य वाहनों का परिवहन कर सकें); बैटलफील्ड मैनेजमेंट सिस्टम्स का विकास, जिसकी मदद से चल सैन्य कतारें एक-दूसरे से संचार के माध्यम से जुड़ी रह सकती हैं; और आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों का निर्माण—अब भी दिए जाने बाकी हैं, हालांकि इनकी अवधारणा एक दशक से ज्यादा पुरानी हो चुकी है.

रक्षा मंत्रालय का कहना है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि उसे अब भी रणनीतिक साझेदारी के संबंध में एक अहम नीति को मंजूरी देनी है, जिसे 2016 में उसके द्वारा गठित एक कार्यबल ने प्रस्तावित किया था.

रणनीतिक साझेदारी के तहत रक्षा प्लेटफॉर्म, नेटवर्क, हथियार और सामग्री के व्यापक क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की कंपनियों और विदेशी साझीदारों के बीच संयुक्त उपक्रम कायम करने की परिकल्पना की गई है.

रक्षा मंत्रालय के नौकरशाहों के बीच घूमने के बाद अब इस फाइल को वित्त मंत्रालय के पास उसकी राय लेने के लिए भेजा गया है—जिसे निजी क्षेत्र के एक सीईओ ''खांटी अफसरी टालमटोल" का नाम देते हैं.

नई दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज ऐंड एनॉलिसिस में सैन्य व्यय पर काम करने वाले एक शोधकर्ता लक्ष्मण कुमार बेहरा कहते हैं, ''मेक इन इंडिया के लक्ष्यों को पूरा करने की राह में सबसे बड़े अवरोधों में एक नौकरशाही की उदासीनता है."

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सरकार की ''मेक इन इंडिया" नीति की राह में एक और बड़ा रोड़ा निजी क्षेत्र को दिए गए ऑर्डरों का अभाव है. कम-से-कम ऐसे 10 प्रस्ताव जो अरबों डॉलर के हैं और जिनका उद्देश्य सेना को आधुनिक इनफैन्ट्री कॉम्बैट वाहनों, संवार प्रणाली, होवित्जर, हेलिकॉप्टर और लड़ाकू जेट से युक्त करना है, अब भी पाइपलाइन में हैं.

सशस्त्र बलों की जरूरतें बहुत ज्यादा हैं. सेना के तीनों अंगों के मुख्यालय इंटिग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के अप्रैल 2013 में किए गए एक अध्ययन टेक्नोलॉजी, पर्सपेक्टिव ऐंड कैपेबिलिटी रोडमैप्य में उच्च प्रौद्योगिकी वाले सैन्य उपकरणों की भारत को जरूरत का मूल्यांकन किया गया था, जिनमें ड्रोन, प्रिसीशन वीपन, राडार, बंदूकें, सेंसर और विमान शामिल थे. अगले 15 साल के दौरान यह जरूरत करीब 100 अरब डॉलर की बताई गई है.

एयरो इंडिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने कहा था कि सैन्यबलों को करीब 400 लड़ाकू जेट और 800 से 1,000 हेलिकॉप्टरों की जरूरत अगले एक दशक में पड़ेगी.

उन्होंने कहा, ''अगले 10 साल में हमें 5,000 हेलिकॉप्टर इंजनों की जरूरत होगी और हमें 400 एलसीए इंजन (हल्के लड़ाकू विमान) भी चाहिए होंगे.... ये सभी मिलकर भारी संभावनाओं को खोलते हैं." मामला यह है कि जब तक इनके ऑर्डर नहीं दिए जाते, तब तक तो ये संख्याएं हवा में ही लटकी रहेंगी.

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एक फरवीर 2018 को पेश हुए रक्षा बजट में फौज की मांग और आवंटित रकम के बीच फर्क है. दरअसल सेना ने 37,121 करोड़ रु. मांगे थे जबकि उसे मिले 21,338 करोड़ रुपए. यानी मांग और आपूर्ति में 15.783 रु. का अंतर.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस बजट के साथ देसीकरण के सपने को पूरा किया जा सकता है. भारत के निजी क्षेत्रों को रक्षा के देसी उपकरण बनाने क्या रकम मुहैया करवा पाएंगे. क्या केंद्र सरकार के इस कार्यकाल के अंत तक हम रक्षा क्षेत्र में 60 फीसदी देसीकरण के आंकड़े को छू लेंगे ?

इस मुद्दे पर विस्तर रिपोर्ट प्रतिरक्षाः देसी नहीं, विदेशीकरण शीर्षक से 28 फरवरी 2017 को प्रकाशित हुई थी.

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