नई दिल्ली। कांग्रेस ने दो साल फहले हुई नोटबंदी को आजाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला करार दिया है. संसद मार्ग पर नोटबंदी की दूसरी बरसी पर विरोध प्रदर्शन के बाद कांग्रेस मीडिया प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने नोटबंदी के लिए प्रधानमंत्री द्वारा बताए तीनों कारणों को खारिज कर दिया.
दो साल पहले, 8 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी ने 'नोटबंदी' को आर्थिक क्रांति का नया सूत्र बताते हुए तीन कारण दिए थे- सारा काला धन पकड़ा जाएगा, फर्जी नोट पकड़े जाएंगे, आतंकवाद व नक्सलवाद खत्म हो जाएगा.
सुरजेवाला ने कविताई शैली में आरोप लगाया कि जहां एक तरफ नोटबंदी ने किसान, नौजवान, महिलाएं, छोटे व्यवसायी व दुकानदार की कमर तोड़ डाली, तो दूसरी तरफ कालेधन वालों की हो गई 'ऐश', जिन्होंने रातों रात 'सफेद' बना लिया सारा 'कैश'.
सुरजेवाला ने सरकार के सामने कुछ सवाल भी पूछे,
1- सारा 'कालाधन' कहां गया? - 24 अगस्त, 2018 की आरबीआई रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के दिन चलन में 15.44 लाख करोड़ नोटों में से 15.31 लाख करोड़ पुराने नोट तो बैंकों में जमा हो गए, यानि 99.9 प्रतिशत. बाकी बचा पैसा भी रॉयल बैंक ऑफ नेपाल व भूटान तथा अदालतों में केस प्रॉपर्टी के तौर पर जमा है. तो फिर कालाधन कहां गया?
10 दिसंबर, 2016 को मोदी सरकार ने देश की सुप्रीम कोर्ट को कहा था कि 15.44 लाख करोड़ पुराने नोटों में 3 लाख करोड़ कालाधन है, जो जमा नहीं होगा और जब्त हो जाएगा. पर यह नहीं हुआ.
2. नकली नोट कहां गए? साल 2017-18 आरबीआई रिपोर्ट के मुताबिक 15.44 लाख करोड़ के पुराने नोटों में से मात्र 58.30 करोड़ ही नकली नोट पाए गए, यानि 0.0034 प्रतिशत. क्या सरकार बताएगी कि फिर नकली नोट कहां गए?
3.क्या उग्रवाद व नक्सलवाद खत्म हो गया? - नोटबंदी के बाद अकेले जम्मू-कश्मीर में 86 बड़े उग्रवादी हमले हुए, जिनमें 127 जवान शहीद हुए व 99 नागरिक मारे गए. नक्सलवाद ने तो और भी पैर पसारे. नोटबंदी के बाद फरवरी, 2018 तक 1030 नक्सलवादी हमले हुए, जिनमें 114 जवान शहीद हुए. हाल में ही 30 अक्टूबर, 2018 को छत्तीसगढ़ नक्सली हमले में शहीद हुए 4 जवानों व 1 पत्रकार की शहादत सबको याद है. कल ही 8 नवंबर, 2018 को छत्तीसगढ़ नक्सली हमले में एक जवान और शहीद हो गया. तो क्या मोदी सरकार ने देश को जानबूझकर गुमराह किया?
4.क्या नए नोट छापने व बांटने की कीमत नोटबंदी की बचत से 300 प्रतिशत अधिक है? - आरबीआइ के मुताबिक साल, 2016-17 व 2017-18 में नए नोट छापने तथा लिक्विडिटी ऑपरेशन की कीमत 30,303 करोड़ रु. है, जबकि नोटबंदी में मात्र, 10,720 करोड़ रु. वापस जमा नहीं हो पाए (वो भी अगर रॉयल बैंक ऑफ भूटान व नेपाल में जमा पुराने नोटों की गिनती न की जाए). क्या सरकार बताएगी कि इतने बड़े आर्थिक नुकसान के लिए कौन जिम्मेवार है?
5क्या देश में पूर्णतया डिजिटल भुगतान लागू हो गया? - 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी के समय देश में 17.71 लाख करोड़ 'कैश' चलन में था. 28 अक्टूबर, 2018 को चलन में कैश की मात्रा बढ़कर 19.61 लाख करोड़ हो गई है. तो फिर डिजिटल भुगतान कैसे बढ़ा?
6. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ इंडियन इकॉनॉमी की रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी से सीधे तौर पर 15 लाख नौकरियां गईं तथा देश की अर्थव्यवस्था को 3 लाख करोड़ का नुकसान हुआ. यही नहीं बैंकों की लाईनों में 120 से अधिक लोगों की मौत हो गई. सूरत (गुजरात) से लेकर तिरुपुर (तमिलानाडु) तक व आसनसोल (पश्चिम बंगाल) तक सब धंधे चौपट हो गए, महिलाओं की सारी बचत लूट ली गई. क्या यह सीधे तौर पर आर्थिक आतंकवाद नहीं?
कांग्रेस ने आरोप लगाया कि ऐसा लगता है कि नोटबंदी 'कालाधन सफेद बनाने' का एक बड़ा घोटाला था ? क्योंकि
नोटबंदी से ठीक पहले भाजपा व आरएसएस ने सैकड़ों करोड़ रु. की संपत्ति पूरे देश में खरीदी. क्या भाजपा व आरएसएस को नोटबंदी के निर्णय की जानकारी पहले से थी?
सुरजेवाला ने आरोप लगाया कि नोटबंदी से ठीक पहले सितंबर, 2016 में बैंकों में यकायक 5,88,600 करोड़ रुपया अतिरिक्त जमा हुआ. इसमें से 3 लाख करोड़ फिक्स्ड डिपॉजि़ट में मात्र 15 दिन में जमा हुआ (1 सितंबर से 15 सितंबर, 2016). क्या इससे साबित नहीं होता कि नोटबंदी की एडवांस जानकारी दे दी गई थी? क्या कारण है कि 5,88,600 करोड़ रुपया जमा कराने वाले किसी व्यक्ति की जाँच नहीं हुई? आज तक भाजपा व आरएसएस ने यह नहीं बताया कि 1 मार्च, 2016 से 8 नवंबर, 2016 के बीच में उनके बैंक खातों में कितना पैसा जमा हुआ? क्या इसकी जाँच नहीं होनी चाहिए?
अपनी बात का अंत भी सुरजेवाला ने फिर कविताई अंदाज में किया.
'नोटबंदी घोटाले' ने किया सबको बेज़ार,
किसान हों, नौजवान हों, व्यवसायी या दुकानदार,
रोजी गई, गया रोजगार - अर्थव्यवस्था का बंटाधार.
इस शेरो-शायरी से कांग्रेस के बढ़ते आत्मविश्विस का पता लगता है. खासकर नोटबंदी का हासिल सरकार की ऐसी कमजोर नस है जिसे लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस लगातार दबाती रहेगी.
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संध्या द्विवेदी / मंजीत ठाकुर