टीकमगढ़। गर्मी का पारा जिस रफ्तार से चढ़ रहा है उससे कई गुना रफ्तार से पानी धरती की कोख से सूख रहा है. बुन्देलखंड में पानी का संकट इस कदर बढ़ गया है कि लोग पानी की तलाश में अपने राज्य की सीमा को भी लांघकर पड़ोसी राज्यों तक की जमीन नाप रहे हैं.
बुंदेलखंड के 13 जिलों की बात करें तो टीकमगढ़ जिले में हालात सबसे खराब हो गए हैं. यहां के ग्रामीण कहीं चार किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के इलाके में पहुंचकर पीने के पानी का जुगाड़ कर रहे हैं तो कहीं पानी के इंतजार में घंटों लाइन में खड़े रहने को मजबूर हैं.
यहां के अटरिया गांव में हैंडपंप, कुआ, तालाब सब सूख गए हैं. लोगों के लिए प्यास मौत का सबब बनने लगी है. टीकमढ़ के खरगापुर थाना क्षेत्र के गांव गुना में तो कुए की पाड़ टूटने से पांच लोग कुए में जा गिरे.
इस घटना में एक महिला की मौत भी हो गई. छतरपुर के पाटन गांव में एक तेंदुए का शव मिलने के बाद वन विभाग के अफसरों ने इसकी मौत के पीछे का कारण भी प्यास को ही बताया है.
यहां के मुख्य वन संरक्षक राघवेन्द्र सिंह के मुताबिक पन्ना टाइगर रिजर्व में पानी का संकट खड़ा हो गया है. यहां पक्षियों और जंगली जानवरों को पानी से परेशानी हो रही है. मादा तेंदुए का पोस्टमार्टम किया गया है जिसमें पता चला कि उसकी मौत प्यास से हुई है.
टीकमगढ़ के समाजसेवी पवन घुवारा कहते हैं, पीने के पानी का संकट खड़ा हो गया है. तालाब और पुराने जितने भी कुएं थे वह सब सूख गए हैं.
हैंडपम्पों में पानी नहीं है. ऐसे में इंसानों के साथ जानवरों के जीवन पर खतरा है. बुंदेलखंड के सर्वाधिक पानी के संकट वाले जिलों की यदि हम बात करें तो टीकमगढ़ जिला इसमें सबसे आगे नजर आता है.
पूरे जिले में पानी का भारी संकट है. सरकार ने भी इस जिले को अति सूखाग्रस्त जिलों में शामिल किया है. पानी के हालात इतने खराब हो चुके हैं कि लोगों को अपनी प्यास बुझाने के लिए पानी के लिए पूरे दिन यात्रा करनी पड़ रही है.
इस गांव में ग्रामीण कामकाज छोड़ सुबह से बच्चों सहित पानी की तलाश में निकल जाते हैं. इस गांव के ग्रामीण बृजेन्द्र कुमार कहते हैं, गांव में कहीं भी पानी नहीं है. वह सुबह से ही अपने परिवार सहित पानी भरने के लिए निकल जाते हैं.
उत्तर प्रदेश के पथरिया गांव में एक कुएं में जो थोड़ा बहुत पानी है उसी से काम चल रहा है. एक और ग्रामीण बंदू कहते हैं, पूरा गांव खाली हो गया है. यहां लोग अब रहना नहीं चाहते. पानी ने जीवन मुश्किल कर दिया है.
पार्वती आदिवासी की अपनी अलग दास्तान है. वो तो निर्जन स्थान पर पहले से ही पानी भरने आती रहीं हैं. संकट गहराया तो अब पूरा गांव आने लगा है. पहले उनको आराम से पानी मिल जाता है और अब भीड़ बढ़ने लगी है तो यहां से पानी भरना भी आसान नहीं रह गया है.
उसके पति गिरजा को चिंता है. सभी लोग पानी भरेंगे तो ये कुआं भी सूख जाएगा. इसके बाद पानी की तलाश और लंबी हो जाएगी. सभी पानी को लेकर परेशान हैं. सुबह और शाम सिर पर बर्तन रखे महिलाओं और बच्चों की कतारें बताती हैं कि संकट कितना गहरा है और सरकार कितनी असंवेदनशील.
जैसे पानी के इस मौजूदा संकट से निजात पाने को कोई हल ही न हो. टीकमगढ़ जिले का यह कोई इकलौता गांव नहीं है. यहां के अधिकांश गांव में यही हालात हैं. पानी की तलाश ने दो राज्यों की सीमा को एक कर दिया है.
मध्य प्रदेश के लोग उत्तर प्रदेश के गांव में पानी के लिए दस्तक देने लगे हैं. यदि वहां भी पानी के श्रोत सूख गए तो फिर क्या होगा. यकीनन हालात विकट हो जाएंगे.
जर्जर कुओं की तलहटी में जिंदगी दांव पर लगाकर उतरते हैं लोग
उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के पथराई गांव के निर्जन खेतों में स्थित कुओं की हालत भी जर्जर है. यहां कुओं की तलहटी में ही पानी बचा है. अटरिया के ग्रामीणों के लिए यही एक सहारा है. जहां जर्जर कुओं की तलहटी में शेष बचे पानी के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर पानी भरने के लिए लोग कुओं में उतरते हैं. पानी इतना नहीं बचा है कि उसे रस्सी के सहारे खींचा जा सके. लोगों का कहना है कि तलहटी में जाने में डर तो लगता है लेकिन और कोई रास्ता भी तो नहीं.
सूख गया है गांव का ट्यूबवैल
पानी की इस समस्या से जूझ रही महिलाओं का कहना है कि पानी की तलाश के लिए वह सुबह से बिना खाना पीना बनाए और दुधमुहे बच्चों को घरों में छोडकर निकल पडती हैं. गांव के बाहर लगे टयूबबैल पर बैठकर घंटो पहले बिजली आने का इंतजार करती रहती हैं.
बिजली के आने पर दस बीस मिनट ही टयूबबैल से पानी निकलता है और टयूबबैल पानी देना बंद कर देता है, इसके अलावा कभी-कभार बिजली के इंतजार में उनका पूरा दिन टयूबबैल पर ही गुजर जाता है.
मुन्नालाल की मानें तो पानी की इस समस्या के चलते इस गांव में कोई भी अपनी बेटी गांव में लडकों की शादियां भी नहीं हो रही हैं.
सरकारी योजनाएं हो गईं फेल
टीकमगढ़ के अटरिया गांव में ऐसा भी नहीं कि पीने के पानी के लिये शासन स्तर पर कोई प्रयास नही किये गये हों, लेकिन वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए.
गांव में तीन चार हैण्डपंपों के अलावा पेयजल योजना के तहत कुओं का निर्माण कराया गया था और पानी की टंकी और गांव में नल लगाए गए थे, लेकिन जहां कुएं पूरी तरह से सूखे पड़े है तो वहीं हेण्डपंम्पों ने पानी देना बंद कर दिया है.
इसके अलावा गांव में करीब 04 साल पहले जब नलजल योजना संचालित की गई थी, लेकिन यह योजना भी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी.
गांव के सरपंच मानिक लाल अहिरवार कहते हैं, इस योजना को शुरू तो किया गया था, लेकिन दो तीन दिनों में ही इसके पाइट टूट गए. टंकी में ही पानी नहीं चढ़ा. योजना फेल हो गई. अब ललितपुर के गांव ही पानी के लिए सहारा हैं.
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संध्या द्विवेदी / मंजीत ठाकुर