बिहार चुनाव: पल-पल बदलती बाजी का बाजीगर

बिहारी गौरव से लेकर डीएनए अभियान तक, नीतीश-लालू मोदी के पुराने सिपहसालार के भरोसे ही उन्हें धूल चटाने की उम्मीद में हैं.

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30 अगस्त को पटना में स्वाभिमान रैली में (बाएं से) सोनिया गांधी, नीतीश और लालू 30 अगस्त को पटना में स्वाभिमान रैली में (बाएं से) सोनिया गांधी, नीतीश और लालू

ज्योति मल्होत्रा

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  • 07 सितंबर 2015,
  • अपडेटेड 6:02 PM IST

अगस्त की 30 तारीख को पटना के गांधी मैदान के बाहर “सुधा” आइसक्रीम और पानी की बोतलें बेचते ठेलों के पीछे साफ-सुथरी मेजों की कतार बरबस सबका ध्यान खींच रही है. हर उम्र के लोग जानना चाह रहे हैं कि आखिर यहां चल क्या रहा है. मेजों पर जिपलॉक वाली प्लाटिस्क की छोटी-छोटी थैलियां रखी हैं. करीब से देखने पर पता चलता है कि इनमें नाखून की कुछ कतरनें हैं. वहां जमा लोग काउंटर के पीछे बैठे लोगों की ओर अपना सिर बढ़ाते हैं, जिनसे वे कुछ बाल काट लेते हैं और एहतियात से प्लास्टिक के दूसरे पाउच में रख देते हैं. इन दोनों पाउचों में “एक बिहारी के डीएनए के नमूने” हैं. ये बिहार की उस लड़ाई के ताजातरीन हथियार हैं, जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले सामाजिक न्याय गठबंधन और बीजेपी के नेतृत्व वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एनडीए गठबंधन के बीच चल रही है.

इन पाउचों को एक पोस्टकार्ड के साथ नत्थी किया जाएगा. उस पर पीएम मोदी के नाम-पते की बगल में नमूना देने वाले का नाम-पता लिखा जाएगा. पोस्टकार्ड की दूसरी तरफ छपा हैः मुझे बिहारी होने पर गर्व है, हमारे डीएनए में कोई खराबी नहीं है. ऐसे 1,000 पोस्टकार्ड के बक्सों को जल्दी ही स्पीड पोस्ट से 7, रेस कोर्स रोड, नई दिल्ली के पते पर रवाना कर दिया जाएगा.

मोदी ने 25 जुलाई को मुजफ्फरपुर की अपनी पहली रैली में नीतीश पर हमला बोलते हुए कह दिया था, “नीतीश कुमार के सियासी डीएनए में ही कुछ गड़बड़ी है.” तब किसने सोचा था कि हल्के-फुल्के ढंग से कही यह बात आरजेडी-जेडी(यू) खेमे में “आहत बिहारी गौरव” को लेकर जबरदस्त लामबंदी का औजार बन जाएगी. नीतीश ने दावा किया कि उनकी बेइज्जती पूरे बिहार की बेइज्जती है. फिर क्या था, लालू यादव और सोनिया गांधी इसमें उनके साथ आ खड़ी हुईं.

मुजफ्फरपुर में मोदी के तंज के बाद नीतीश और प्रशांत किशोर भागलपुर के दूरदराज के इलाकों में लोगों से मेल-मुलाकात कर रहे थे. किशोर ही मुख्यमंत्री के जनसंपर्क से लेकर चुनाव अभियान और मीडिया तक संभाल रहे हैं. उनके एक करीबी सूत्र बताते हैं, “एक यादव किसान नीतीश के खिलाफ मोदी के तंज पर बेहद नाराज दिखाई दे रहा था. उसने कहा कि “वो हमको दोगला न कहा है.” तब हमने खुद से पूछना शुरू किया कि क्या लोग मोदी की बात से इतने ज्यादा गुस्से में हैं. “मेरे बिहारी डीएनए में कोई गड़बड़ी नहीं” अभियान यहीं से शुरू हुआ.”

किशोर ने दिसंबर 2011 से लेकर 2014 के लोकसभा के चुनाव की जीत तक गुजरात में मोदी के साथ बेहद नजदीक रहकर काम किया था और अभी हाल तक वे बीजेपी से जुड़े अहम मसलों पर अनौपचारिक बहस-मुबाहिसों में भी मदद करते थे. उन्होंने नीतीश और लालू दोनों को भरोसा दिलाया है कि मोदी ने जो बेइज्जती की है, उसमें एक नए “ब्रांड बिहार” का बीज छिपा है और इसके सहारे जाति और विकास दोनों की भट्ठियों को एक साथ धधकाया जा सकता है. किशोर को लगा कि “स्वाभिमान” का टैग मोदी के “परिवर्तन” कार्ड को सीधी चुनौती देगा. नीतीश की उपलब्धियां और लालू की जातियों की गोलबंदी, दोनों मिलाकर मोदी और उनके गठबंधन सहयोगियों को नाकों चने चबा सकती है. इतना ही नहीं, यह नीतीश-लालू और उनसे भी ज्यादा उनके कार्यकर्ताओं को जोश से भर देगी.

लालू की आक्रामक और हाल में ताकतवर हुई यादव बिरादरी के लिए “बिहार के डीएनए की बेइज्जती” में मोदी की “56 इंच के सीने” की बमबारी करने का मुकाबला करने की कूवत है. बीते हफ्ते पटना की रैली में आरजेडी के नौजवान कार्यकर्ता बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को दी गई लालू की चुनौती पर जोश से भरे थे. लालू ने शाह को “यदुवंशियों को तोडऩे के लिए” ललकारा था.

किशोर के युवा साथियों ने इंडियन पोलिटिकल ऐक्शन कमिटी (आइपीएसी) बनाई है, जो नीतीश का चुनावी मशीनरी चला रही है. इससे जुड़े युवा कहते हैं कि बिहार जैसे सियासी तौर पर जागरूक सूबे में शाह से कोई भयभीत नहीं है. इसी तर्ज पर एक नारा गढ़ा गयाः “झांसे में न आएंगे, नीतीश को जिताएंगे.” पूरे पटना में यह इश्तहार लगवा दिए गए. मीडिया और विज्ञापन के अलावा किशोर की टीम ने सोशल मीडिया और मोबाइल के जरिए डिजिटल संदेशों की मुहिम चला दी. उन्होंने हरेक निर्वाचन क्षेत्र के आंकड़ों और विश्लेषण पर जोर दिया. मुहिमों में “हर घर दस्तक” भी शामिल है. इसमें पार्टी का संदेश पहुंचाने के लिए कार्यकर्ता कम से कम 10  घरों में जाते हैं. वे करीब एक करोड़ घरों तक जा चुके हैं.

मजे की बात यह है कि किशोर के साथी भी कभी मोदी के साथ काम कर चुके हैं. ऋषि राज सिंह यूपी में शाह के अभियान में शामिल थे, तो प्रतीक जैन पर महाराष्ट्र की जिम्मेदारी थी. नीतीश का अभियान मोदी के अभियान से कैसे अलग है, यह पूछने पर दोनों हंस पड़े. जैन ने कहा, “यहां हमें हर काम खुद करना पड़ता है. पटना में रैली के लिए हमने मंच पर झाड़ू लगाई, स्पीकर और एलसीडी स्क्रीन लगवाई, पानी-कुर्सियों का इंतजाम तक किया. यह भी बताया कि किसके बाद किस वक्ता को बोलना चाहिए.” टीम के एक और सदस्य शशांक मेहता कहते हैं, “मोदी के अभियान में संसाधनों की कोई कमी नहीं थी. यहां फूंक-फूंककर कदम रखना पड़ता है.”

पिछले आम चुनाव में जेडी(यू) और आरजेडी ने बीजेपी के खिलाफ  चुनाव लडऩे के साथ-साथ एक दूसरे के खिलाफ  भी चुनाव लड़ा था. यानी 17 फीसदी मुस्लिम, 12 फीसदी महादलित और 27 फीसदी बेहद पिछड़ी जातियों के बेहद अहम वोट बंट गए थे. नीतीश इससे इस कदर डर गए थे कि उन्होंने मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़ उस पर जीतनराम मांझी को बैठा दिया. यह कदम और विनाशकारी साबित हुआ. दिल्ली में राज्यसभा सदस्य पवन वर्मा के घर पर दिसंबर, 2014 में जब किशोर और नीतीश पहली बार मिले, तो किशोर ने उन्हें पहली बात यही कही कि उनका मुख्यमंत्री की गद्दी पर लौटना जरूरी है. उसके बाद घटनाएं तेजी से घटीं. नीतीश ने डरा-धमकाकर मांझी को हटाया और फिर मुख्यमंत्री बन गए. वे पहली बार सोनिया गांधी से मिले और लालू के साथ सुलह को राजी हुए. कभी दुश्मन रहीं तीनों पार्टियों को समझ में आ गया कि अगर वे साथ-साथ डूबना नहीं चाहते, तो उन्हें साथ मिलकर तैरना पड़ेगा. नीतीश मानते हैं, “हकीकत यह है कि हमें बीजेपी को हराना है, हम किस दुश्मनी की बात कर रहे हैं.”

अप्रैल 2015 आते-आते बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के फौरन बाद किशोर ने नीतीश के चुनाव अभियान की कमान संभालने का फैसला कर लिया. इससे बीजेपी में खलबली मच गई थी. किशोर अंदर की बहुत सारी बातें जानते थे. वे वही शख्स थे, जिन्होंने बचपन में मोदी के चाय बेचने पर कांग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर की भद्दी टिप्पणी को सिर के बल पलटते हुए “चाय पर चर्चा” का राष्ट्रीय अभियान छेड़ दिया था. कई सौ निर्वाचन क्षेत्रों में एक साथ मोदी की चमकती इमेज दिखाने और बहसें करवाने का थ्रीडी होलोग्राम का विचार भी उन्हीं के दिमाग की उपज था. नीतीश के साथ वह क्या करेंगे? किशोर ने आधिकारिक रूप से कुछ भी कहने से मना कर दिया, पर इतना कहना काफी होगा कि उनकी आइपीएसी की 800 लोगों की फौज जुटी है. इसमें आइआइटी और आइआइएम की डिग्रियों से लैस युवा शामिल हैं. पटना के स्ट्रैंड रोड पर इसका मुख्यालय है. यह सीएम हाउस के करीब है.

किशोर अहमदाबाद में मोदी के घर में ही रहकर काम करते थे. पटना में भी वे नीतीश के घर से काम करते हैं. उन्होंने नीतीश की उपलब्धियों को निखार कर सामने रखा है ताकि बीजेपी के आरोपों की हवा निकालने को तैयार आंकड़े उनके हाथ में हों. कभी-कभार जेडी(यू) में विरोध की बुदबुदाहटें सुनी जा सकती हैं कि एक गैर-सियासी युवा उतना बड़ी समाजवादी पार्टी में इतना असरदार कैसे हो गया. मगर बेहद सधी रणनीति के साथ पार्टी का अभियान शुरू होता देख ये बुदबुदाहटें खामोश पड़ गईं.

इसमें कोई शक नहीं कि बिहार की जंग में दांव काफी ऊंचे लगे हैं. मोदी-शाह की जीत न सिर्फ बीजेपी की ताकत को अगले कई साल के लिए पक्का कर देगी, बल्कि विपक्ष को नेस्तनाबूद भी कर देगी. वहीं अगर जेडी(यू)-आरजेडी गठबंधन जीता, तो बीजेपी के अपराजेय पार्टी होने के बारे में अंतहीन लफ्फाजियों पर रोक लग जाएगी. वाकई, बिहार एक बार फिर दिखाएगा कि भारत किधर जा रहा है.

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