घरेलू मोर्चे पर विदेश नीति का औजार

भारत में दुनिया की दिलचस्पी तभी कायम रह पाएगी जब नरेंद्र मोदी वादे के मुताबिक सशक्त, समृद्ध और समावेशी भारत मुहैया करा पाएंगे.

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तन्वी मदान

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  • 19 जनवरी 2015,
  • अपडेटेड 5:49 PM IST

नरेंद्र मोदी ने जब पदभार ग्रहण किया था, उस समय विदेश नीति को बहुत अहमियत वाला क्षेत्र नहीं माना जा रहा था. अंदाजा यही था कि चुनाव प्रचार के दौरान जिन घरेलू मसलों पर जोर था, उन्हें ही तरजीह दी जाएगी. इसके बावजूद उनके एजेंडे पर विदेश नीति अहम रही है, जिसे उनके तमाम विदेश दौरों, विदेशी नेताओं के भारत दौरों, शिखर सम्मेलनों और संकट प्रबंधन की कुछ कवायदों से देखा जा सकता है. इस साल बराक ओबामा का दौरा बता रहा है कि दूसरे देशों के साथ यह संलग्नता बनी रहने वाली है. इसकी आलोचना भी हुई है. कुछ ने इसे वक्त जाया करना कहा तो कुछ ने घरेलू नीति से विचलन की बात कही है. लेकिन सचाई यह है कि भारत की विदेश नीति उसकी राष्ट्रीय रणनीति का एक पेचीदा और अपरिहार्य हिस्सा रही है. कोई भी सरकार विदेश नीति को दरकिनार नहीं कर सकती, खासकर ऐसी सरकार जिसने ‘सशक्त’ और ‘समृद्ध’ भारत का वादा किया हो.
इसके कई कारण हैं. पहली वजह भारत की खास किस्म की भौगोलिकता. 15,000 किमी से ज्यादा लंबी विदेशी सीमा और 7,500 किमी की समुद्रतटीय सीमा के साथ भारत अलग-थलग आत्मतुष्ट होकर पड़ा नहीं रह सकता. भारत उस महासागर के साथ लगा हुआ है जिसे ‘इस धरती का सबसे व्यस्त और अहम अंतरराष्ट्रीय मार्ग’ कहा गया है. पश्चिमी और पूर्वी एशिया के बीचोबीच होने के चलते यह एक ओर अस्थिरता तो दूसरी ओर अनिश्चय से घिरा हुआ है. ऐसे में, दुनिया भारत की चौखट पर प्रायः आ खड़ी होती है, कभी किसी संकट के रूप में तो कभी किसी अवसर की तरह. दूसरी वजह आर्थिक है. भारत की अर्थव्यवस्था अब दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ पहले से कहीं ज्यादा गहरे जुड़ी हुई है. विश्व व्यापार संगठन के मुताबिक 2011-2013 के बीच इसका व्यापार और जीडीपी का अनुपात 53 फीसदी से ज्यादा रहा था. 2013-14 में भारत को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के तौर पर 36 अरब डॉलर की आमद हुई जबकि 2008 से 2012 के बीच बाहर जाने वाला एफडीआइ 15 अरब डॉलर रहा था. तीसरी वजह ऊर्जा है. भारत ने 2012 में अपनी जरूरत का तीन-चौथाई कच्चा तेल और एक-तिहाई प्राकृतिक गैस आयात की थी. आज वह दुनिया में कोयला आयात करने वाले देशों में तीसरे स्थान पर है. ईंधन के अलावा भारत की ऊर्जा केंद्रित कंपनियां अब बाहर से अपस्ट्रीम एसेट, प्रौद्योगिकी और पूंजी की तलाश में हैं जिसमें गैर-जीवाश्म ईंधन क्षेत्र भी शामिल है.
एक और कारण सामरिक है. भारत की अवस्थिति और इतिहास इस बात की जरूरत पैदा करते हैं कि वह सैन्य सक्षमताओं के अतिरिक्त तमाम किस्म की साझेदारियों में भी निवेश करे. आज भारत सैन्य हार्डवेयर का सबसे बड़ा आयातक है और अगर वह घरेलू उत्पादन में इजाफा करना चाहता है तो विदेशी प्रौद्योगिकी और निवेश अनिवार्य हैं.
पांचवां कारण है करीब एक करोड़ से ज्यादा प्रवासी भारतीय और उनके अलावा भारतीय मूल के करीब 1.2 करोड़ लोग जो बाहर पढ़-लिख रहे और काम-धंधा कर रहे हैं. यह आबादी 70 अरब डॉलर की पूंजी देश में भेजती है, जो कि दुनिया में किसी भी प्रवासी समुदाय की अपने देश में भेजी जाने वाली राशि में सबसे ज्यादा है और भारत के जीडीपी का करीब चार फीसदी है. एक अन्य कारण है विरासत. हर अगली सरकार ने किसी एक देश या देशों के समूह पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए विविधीकरण की रणनीति अपनाई है तथा एक साथ कई देशों के साथ रिश्ते स्थापित किए हैं. यह रणनीति बहुत मेहनत की मांग करती है और इसे लगातार पोषित करते रहने की जरूरत होती है.
इसके बाद खुद मोदी की बात आती है. प्रधानमंत्री बनने से पहले ही वे पर्याप्त घूम चुके थे और उनके ‘गुजरात मॉडल’ का एक अहम तत्व एफडीआइ को आकर्षित करना था. बिला शक प्रधानमंत्री विदेश नीति को राजनैतिक लाभ के औजार की तरह देखते हैं. वे न तो ऐसे पहले और न ही ऐसे आखिरी नेता होंगे जो विदेश में देश की छवि को बहाल कर के और खुद को प्रासंगिक प्रदर्शित कर के घरेलू मोर्चे पर अपनी विश्वसनीयता को मांजने की कोशिश में लगा हो. असल में, चुनाव के दौरान और उसके बाद भी मोदी ने वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा हासिल करने के सवाल को अपना लक्ष्य बनाया है.
सवाल उठता है कि दुनिया के साथ संवाद करने के लिए इंतजार क्यों नहीं किया जा सकता? पहली बात तो यह कि दुनिया भारत का इंतजार नहीं करेगी. कई देश भारत को एक अवसर के तौर पर देखते हैं खासकर तब जबकि अन्य रणनीतिक और आर्थिक विकल्प उतने आकर्षक न हों. इस मौके से अधिकतम लाभ लेने के लिए मोदी को कुछ चुनौतियों से निबटना होगा. उनके विदेश नीति के नजरिए को मौजूदा संस्थाओं, व्यक्तियों और प्रक्रियाओं के सहारे साकार नहीं किया जा सकता. सरकार को अपने व्यापक लक्ष्यों से जुड़े स्पष्ट नीतिगत उद्देश्यों की पहचान करनी होगी और फिर समयबद्ध तरीके से विशिष्ट एजेंडे का रोडमैप अहम रिश्तों, मुद्दों और पहल के संदर्भ में तैयार करना होगा. इसके लिए अनिवार्य संसाधनों, उपकरणों, ढांचों और क्षमताओं का दोबारा मूल्यांकन भी करना होगा और नीति नियोजन की क्षमता बढ़ानी होगी. यह बताना होगा कि भारत के लिए बाकी दुनिया इतनी अहम क्यों है अन्यथा आत्मनिर्भरता का कोई भी मुहावरा इस तथ्य को धुंधला कर देगा कि भारत एक परस्पर जुड़ी दुनिया में जीता है और उस पर निर्भर भी है.
बुनियादी चुनौती तो करदिखा पाने की है. यह सरकार भारत में दुनिया की दिलचस्पी को टिकाए रख सकेगी या नहीं, और क्या यह भी सुनिश्चित कर सकेगी कि भारत की प्रतिष्ठा उनकी निगाह में बनी रहे? यह इस पर निर्भर करेगा कि मोदी अपने वादे के मुताबिक सशक्त, समृद्ध और समावेशी भारत मुहैया करा पाते हैं या नहीं. जब तक सरकार इन अपेक्षाओं को पूरा करती दिखती है, भारत सबका चहेता बना रहेगा. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो भारत को लेकर शिकायतों का दौर फिर शुरू हो जाएगा.

(तन्वी मदान वॉशिंगटन डीसी में ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन के इंडिया प्रोजेक्ट की निदेशक हैं)

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