सेक्‍स सर्वे: औरत तो बस औरत है

नहीं. भारत में सेक्स पर बात मुमकिन नहीं. उस देश में, जिसने दुनिया को कामसूत्र दिया. जिस देश ने मैथुन मुद्राओं को कोणार्क और खजुराहो के मंदिरों की दीवारों पर उकेरा. आज भारत की आबादी 1.21 अरब है. यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती जनसंख्या है. फिर भी, सेक्स यहां अनुचित और निषिद्ध है.

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सेक्‍स सर्वे सेक्‍स सर्वे

राधारानी मित्रा

  • नई दिल्‍ली,
  • 26 नवंबर 2011,
  • अपडेटेड 10:56 AM IST

नहीं. भारत में सेक्स पर बात मुमकिन नहीं. उस देश में, जिसने दुनिया को कामसूत्र दिया. जिस देश ने मैथुन मुद्राओं को कोणार्क और खजुराहो के मंदिरों की दीवारों पर उकेरा. आज भारत की आबादी 1.21 अरब है. यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती जनसंख्या है. फिर भी, सेक्स यहां अनुचित और निषिद्ध है.
फोटो: सेक्‍स सर्वे से जानिए कैसे बदल रहा है भारतीय समाज 

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पांचेक साल पहले जनवरी महीने की एक ठिठुरती सुबह मैंने अपनी आंटी को यह बताने के लिए फोन किया कि मैं विज्ञापन एजेंसी की अपनी नौकरी छोड़ रही हूं और बीबीसी की अंतरराष्ट्रीय विकास संचार शाखा बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट में शामिल हो रही हूं. वे बड़ी खुश हुईं, बोलीं: ''आज तुम्हारे पिताजी होते तो बहुत खुश होते.'' फिर जोड़ा, ''और वहां तुम्हारा काम क्या होगा?'' ''मुझे कंडोम पर काम करना है.'' ''क्या?'' उन्हें जैसे सदमा लगा हो. तौबा-तौबा करके उन्होंने फोन रख दिया.

अब वे उन मित्र-दोस्तों और रिश्तेदारों का सामना किसी मुंह से करेंगी, जो मेरी इस नई नौकरी के बारे में सवाल करेंगे? बेचारी मेरी मां को कैसा लग रहा होगा? मैं जानती थी कि ट्रस्ट अगले दो साल कंडोम के बारे में लोगों की धारणा बदलने का जो अभियान चलाने जा रहा है, उसमें ठीक ऐसी ही स्थितियों का सामना करना पड़ेगा.

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अभियान शुरू हुआ तो लोगों का बदलता हुआ रवैया देखने को मिला. शुरुआत में ही मैं एक ऐसी महिला से मिली, जिसने मुझे चौंका दिया. वे मेरी आंटी से हर नजरिए से बेहद अलग थीं. वे महाराष्ट्र के एक छोटे-से जिले सतारा की रहने वाली थीं. वे हमारी कंडोम 'पहेली' प्रतियोगिता की विजेताओं में से एक थीं-उन्होंने उस 'पहेली' को हल किया था, जिसका जवाब 'कंडोम' शब्द था. पुरस्कार वितरण समारोह के लिए वे अपने पति के साथ खासी दूरी तय करके मुंबई आई थीं. उन्होंने पुरस्कार के रूप में एक सुंदर-सा मोबाइल फोन हाथ में लिया, और मुझे देखकर शर्माते हुए मुस्कराईं. मैंने पूछा, ''क्या आप हर किसी को बताएंगी कि आपने यह पुरस्कार कैसे हासिल किया?'' वे खुलकर मुस्कराते हुए बोलीं: ''इसमें भी कोई दो राय है! कंडोम, आखिरकार एक शब्द ही तो है.''

दो महिलाएं, और दोनों के नजरिए में जमीन और आसमान का फर्क. लेकिन बात जहां सेक्स की हो, तो उस लिहाज से इसे पढ़ने वाले पाठकों को इन दो दृष्टिकोणों के बीच भी असंख्य-अनेक और भी रंग नजर आ जाएंगे.

पिछले कुछेक वर्षों में इन विषयों पर कुछ काम किए होने के नाते मुझे तमाम प्रवृत्तियों को जानना, व्यवहार-बरताव को उधेड़कर समझ्ना और पूरी परख के लिए अन्वेषण करना था. भारत में दूसरे और किसी भी काम की तरह यह काम भी बेहद जटिल है, इतना जटिल जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती. पर यह बोझ्लि और उबाऊ कभी नहीं हो सकता. सेक्स में बोझ्लि और उबाऊ भला कुछ होता है.

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सोलह से 18 साल के (शहरी, ए/बी/सी श्रेणी के) लोगों में जोखिम की संभावनाओं की थाह लेने के लिए अक्तूबर 2009 में बीबीसी डब्लूएसटी-पीक्यूआर के एक गुणात्मक अध्ययन से कुछ दिलचस्प तथ्य सामने आते हैं. (12 से 20 की उम्र के) किशोर तेजी से 'बड़े होना' चाहते हैं. इसलिए नहीं कि वे जिम्मेदारियां बांटना चाहते हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें वयस्कता में ज्‍यादा मस्ती और आजादी दिखती है. वे 'वयस्क' होना चाहते हैं और उनके मां-बाप को इस बात का एहसास है.

ऐसे में मां-बाप और बच्चे एक बराबरी की जमीन पर आ खड़े होते हैं. बड़े होते बच्चों को मनमर्जी करने की ज्‍यादा छूट दी जाने लगती है. और इसी के साथ कुछ और आजादियां उन्हें हासिल होती हैं. मसलन, पैसा, मोबाइल फोन, सोशल नेटवर्क, रिलेशनशिप और सेक्स के प्रति लापरवाह रवैया. सुरक्षित सेक्स को किसी भी और बात की तुलना में गर्भ ठहरने से बचाव के रूप में ज्‍यादा देखा जाता है.

सिर्फ सतही सेक्स शिक्षा और सीखने के खासकर इंटरनेट से अन्य चित्रात्मक स्त्रोतों के अलावा, अध्ययन के ज्‍यादातर उत्तरदाताओं का दावा था कि उनके मां-बाप उनसे 'इस सब बारे में' बात नहीं करते हैं. दो साल बाद, सर्वेक्षण में पता चलता है कि ऐसे अभिभावक, जिनका कम से कम एक बच्चा 18 साल से कम का है, में से लगभग एक-चौथाई सोचते हैं कि उनके बच्चे सेक्स की दृष्टि से सक्रिय हैं. जो लोग ऐसा सोचते हैं, उनमें से ज्‍यादातर इस सत्य को बस स्वीकार कर लेते हैं. लेकिन ऐसे भी अभिभावक हैं, जो इसे नियति मान लेने की बजाए सेक्स संबंधी मसलों पर बच्चों से बात करते हैं और उन्हें शिक्षित करते हैं. स्वाभाविक तौर पर, पिताओं के मुकाबले माताएं ऐसा ज्‍यादा करती हैं (10 फीसदी पुरुषों की तुलना में 21 फीसदी).
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बीस साल से कम उम्र के इन बच्चों की तुलना इनसे थोड़ी-सी बड़ी उम्र के उन पुरुषों और स्त्रियों से कीजिए, जो रहने, पढ़ने या काम के सिलसिले में घर से निकलकर कहीं और आ गए हैं. उनकी जिंदगी इंटरनेट से कोई कम आसान नहीं हुई है (जब आपके पास आई-फोन नहीं होता है, तब भी आप कंप्यूटर के सामने तो बैठते ही हैं) लेकिन वे जिन चुनौतियों का सामना करते हैं, वे कहीं ज्‍यादा भारी-भरकम होती हैं. पिछले दो-एक साल में अंतरजातीय विवाहों पर खाप पंचायतें बैठीं, अपहरण और हत्या हुई हैं, सेक्स के जुनून में अपराध हुए हैं और बलात्कार के मामलों में खासी तेजी आई है. वे चाहे आधे-अधूरे किशोर हों या शहर में रह रहे 20 के आसपास के युवक-युवती, दोनों ही अस्पष्ट-से दिशा-निर्देशों, विरोधाभासी सामाजिक परंपराओं, जड़ जमाए पूर्वाग्रहों, ढीली कानून क्रियान्वयन मशीनरी और जटिल पाखंडों के भंवर में फंस जाते हैं.










पर यह कौन कहता है कि इस मुल्क में सब कुछ एकतरफा ढंग से चलता है? कुछेक साल पहले की बात है. एक रेडियो विज्ञापन का प्रसारण इसलिए बंद कर दिया गया क्योंकि इसमें 'कंडोम' शब्द का प्रयोग था. वह सुरक्षित सेक्स का प्रचार कर रहा था, इस बात की कोई अहमियत ही नहीं. ज्‍यादा अहम यह हो गया कि वह 'स्वच्छंदता' का प्रचार करता देखा जा रहा था! लेकिन 2008-09 में, राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के सहयोग से चलाए गए एक अभियान में, बिना किसी वाद्य यंत्र के कंडोम की रिंगटोन बेहद लोकप्रिय हो गई.

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दुनिया में ऐसा पहली बार किया गया था और एक साल के भीतर उसे डाउनलोड करने के करीब 8,00,000 आग्रह मिले. आपको पसंद आए या नहीं, यह उचित हो या नहीं, पर वह शब्द जनता के बीचोबीच मौजूद था. जो उसे चोखी और मजेदार चीज मानते थे, उन लोगों के मोबाइल पर वह शौक से बज रहा था. हां, उसे लेकर मुंह बनाने वालों के लिए वह जरूर असुविधा पैदा कर रहा था.

यह जानना दिलचस्प होगा कि यह कैसे कारगर होती है. (या नहीं होती है). यह वही मुल्क है जहां आइटम नंबर को मान्यता मिली हुई है. शादी-ब्याह के मौके पर कोई भी संगीत शीला, मुन्नी या जलेबी बाई की धुन पर जमकर देह झ्मकाने के बिना पूरा नहीं होता. ग्लैमरस सज-धज वाले पुरुष और स्त्रियां इन कानफोड़च्, भड़कीले बॉलीवुड गीतों पर नाचते हैं, दो लोगों के मिलन का जश्न मनाते हुए, जैसे कि वह संतान उत्पत्ति की कोई प्राचीन प्रथा हो. ज्‍यादा से ज्‍यादा संख्या में हिम्मत दिखाने वाले टेलीविजन विज्ञापनों को इस कारण बंद किया जा रहा है क्योंकि वे कामुक ढंग से अश्लील होते हैं.

खबरिया चैनल टीआरपी बढ़ाने के लिए सेक्स के जुनून में किए गए अपराधों का गर्मागर्म रूपांतरण दिखाते हैं. हमारी जिंदगी में सेक्स की कहीं कोई कमी नहीं है. लेकिन अगर आप लिव-इन रिलेशनशिप में हैं, तो आपको किराए पर जगह पाने में काफी समस्या का सामना करना पड़ेगा. अगर एक कंडोम अविवाहित बेटे की जेब से टपक पड़ा तो उसे देखकर कोई पहाड़ नहीं टूटेगा लेकिन वही अगर अविवाहित बेटी के पास मिल जाए तो? समस्या. शादी के पहले के सेक्स और स्वच्छंद संसर्ग के लिए भारत में पुरुषों और स्त्रियों के लिए अलग-अलग नियम होते हैं.

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दरअसल यहां दिए गए सर्वेक्षण के नतीजे आपकी सहज समझ की धारणाओं को सामने लाते हैं. यह अनुमान लगाना कोई बड़ी बात नहीं कि शादी के पहले सेक्स अभी भी कोई स्वीकृत चीज नहीं है. जवाब देने वालों में से 58 फीसदी विवाह पूर्व सेक्स के खिलाफ हैं और इसका विरोध स्त्रियों में कहीं ज्‍यादा है.

इसी से मिलता-जुलता यह निष्कर्ष भी है कि 60 फीसदी से भी ज्‍यादा उत्तरदाताओं को लिव-इन रिलेशनशिप को स्वीकार करने में समस्या है. इसमें कोई हैरानी नहीं कि युवा, शहरी तकनीकी शिक्षा प्राप्त जनसंख्या वाले बंगलुरू में इसे स्वीकार करने वाले अपेक्षाकृत ज्‍यादा हैं. यह जानने के लिए भी कोई बहुत दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है कि (74 फीसदी) मां-बाप समलैंगिक बच्चों को स्वीकार नहीं करेंगे. आज तक मैं सिर्फ एक ऐसी मां से मिल पाई हूं जो अपने बच्चों को हाल ही में दिल्ली में हुए गे-प्राइड मार्च में लेकर गई थी.

सेक्स तक बढ़ती पहुंच को भटकाने वाला माना जाता है. इसके लिए किसे दोषी माना जाए? बेशक महिलाएं! स्त्री को ही सारी समस्या की जड़ माना जाता है. आधे से ज्‍यादा उत्तरदाता मानते हैं कि विवाहेतर संबंधों की घटनाएं ज्‍यादा विवाहित महिलाओं के बाहर निकल कर काम पर जाने के कारण बढ़ रही हैं. इसमें कोई हैरत नहीं कि महिलाओं की तुलना में यह सोच पुरुषों में ज्‍यादा लोकप्रिय है; उन्हीं पुरुषों में जो शीला-मुन्नी वगैरह-वगैरह के बारे में शायद दिन में ही सपने देखते हों. और इसे देखिए, यह तुक्केबाजी नहीं: एक दूसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि महिलाओं की तुलना में पुरुष फंतासियों में ज्‍यादा जीते हैं.

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20 फीसदी से ज्‍यादा पुरुष दावा करते हैं कि उन्होंने पैसे देकर सेक्स किया है-इनमें सबसे ज्‍यादा हैदराबाद (31 फीसदी) और दूसरे स्थान पर मुंबई (20 फीसदी) है. लिहाजा यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए कि करीब दो साल पहले दो युवतियों को लेकर बने एक रेडियो विज्ञापन ने हलचल मचा दी थी और इसके बारे में अखबार में छप गया था. उनमें से एक सहेली डेट पर जाने के बारे में बातचीत करती सुनाई देती है.

यह डेटिंग सेक्स के बिना ही खत्म हो गई थी क्योंकि उस जोड़े के पास कंडोम नहीं था. शुक्र है कि आलोचकों के बावजूद, इस विज्ञापन का प्रसारण बंद नहीं किया गया और सुरक्षित सेक्स की जीत हुई.

वे दिन गए, जब प्यार में फूल एक-दूसरे की तरफ उछाले जाते थे और बॉलीवुड एक चुंबन के साथ रोमांस पूरा कर लेता था; जब खुलेआम एक दूसरे के हाथ पकड़ लेना लोगों की नाराजगी का सबब बनता था; जब रात के 10 बजे के बाद तक रुकना एक युवती की प्रतिष्ठा धूमिल कर देता था. आज सेक्स यह समझ पैदा करने की कोशिश कर रहा है कि उसे कहां होना या रहना चाहिए-परदे में या खुले में. सेक्स आखिर कितना 'सेक्सी' है? यह तमाम खासियतों वाला सबसे नया स्मार्टफोन है, या पिछले जमाने की फिल्मों में दिखाई गई क्लासिक अभिनेत्री की टांगों जैसा? कोई ठोस जवाब नहीं हैं, कभी हो भी नहीं सकते. आपको मेरी आंटी और सतारा वाली महिला-दोनों ही अपने बनते-बिगड़ते विचारों के साथ मिलेंगी.

दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती जनसंख्या के लिए सेक्स एक बहु-आयामी, शानदार, रहस्यमय कच्चा हीरा है. यह एक कभी न बदलने वाली पहेली-भारत को प्रतिबिंबित करता है, जिससे होकर इस पहेली की तस्वीर अलग-सी हो जाती है.

राधारानी मित्रा बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट में नेशनल क्रिएटिव डायरेक्टर और कार्यकारी निर्माता हैं.

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