देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने ज़िन्दगी के पिंजरे को तोड़ने की इजाजत दी थी. 13 साल से खामोश पड़े हरीश की आखरी रस्म अदायगी भी पूरी हो चुकी थी. 13 मार्च की रात हरीश के घर में उनकी आखरी रात थी, लेकिन शायद उन्हें इसकी खबर नहीं थी. यह कहानी एक लंबे संघर्ष की आखिरी पड़ाव को दर्शाती है, जहां न्याय और इजाजत ने इंसान को उसकी आज़ादी दिलाई.