सावन शुरू होते ही भगवान् शिव यानी भोलेबाबा के भक्त उनका अभिषेक करने के लिए गंगाजल लेने कांवड़ लेकर निकल पड़ते हैं. भगवा वस्त्र में बम बम भोले का जयकारा लगाते कांवड़िए शिव भक्ति में लीन नजर आते हैं. कंधे पर कांवड़ उठाए नंगे पैर सड़क पर चलते कांवड़ियों को देखकर मन में ये ये सवाल आना स्वाभाविक है कि आखिर श्रद्धा से जुड़ी इस परंपरा की शुरुआत कब और किसने की? अगर नहीं, तो यहां जानें कांवड़ यात्रा से जुड़ी सभी मन्यताओं के बारे में.
इस यात्रा को श्री राम ने शुरू किया-
मान्यताओं के अनुसार भगवान राम को पहला कांवड़ ले जाने वाला माना जाता है. कहा जाता है कि भगवान श्रीराम ने झारखंड के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल भरकर देवघर स्थित बैधनाथ धाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था.
श्रवण कुमार ने की थी कांवड़ की शुरुआत-
कुछ लोगों को मानना है कि पहली बार श्रवण कुमार ने त्रेता युग में कांवड़ यात्रा की शुरुआत की थी. अपने दृष्टिहीन माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराते समय जब श्रवण कुमार हिमाचल के ऊना में थे तब उनसे उनके माता-पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा के बारे में बताया. इस इच्छा को पूरा करने के लिए श्रवण कुमार उन्हें कांवड़ में बैठाया और हरिद्वार लाकर गंगा स्नान कराए. वहां से वह अपने साथ गंगाजल भी लाए. माना जाता है तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई.
रावण को भी बताया जाता है पहला कांवड़िया-
पुराणों के अनुसार इस यात्रा शुरुआत समुद्र मंथन के समय हुई थी. मंथन से निकले विष को पीने की वजह से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया था जिसके बाद उन्हें नीलकंठ कहकर पुकारा जाने लगा. विष के प्रभाव को दूर करने के लिए शिवभक्त रावण ने घोर तप किया. इसके बाद दशानन कांवड़ में जल भरकर लाया और पुरा महादेव में शिवजी का जलाभिषेक किया. इसके बाद शिवजी विष के प्रभाव से मुक्त हो गए. कहते हैं तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हो गई.
परशुराम थे पहले कांवड़िया-
कुछ धार्मिक विद्वानों का तो ये भी मानना है कि सबसे पहले भगवान परशुराम ने कांवड़ से गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के बागपत के पास स्थित 'पुरा महादेव' का जलाभिषेक किया था. वह शिवलिंग का अभिषेक करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाए थे. इस कथा के अनुसार आज भी लोग गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर पुरा महादेव का अभिषेक करते हैं. अब गढ़मुक्तेश्वर को ब्रजघाट के नाम से जाना जाता है.
जब देवताओं ने किया शिव का जलाभिषेक-
हिंदू मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन में विष के असर को कम करने के लिए शिवजी ने ठंडे चंद्रमा को अपने मस्तक पर सुशोभित किया था. इसके बाद सभी देवताओं ने भोलेनाथ को गंगाजल चढ़ाया. तब से सावन में कांवड़ यात्रा का प्रचलन शुरू हुआ.
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