सारे दुखों की जड़ है तुलना करने की आदत!

हममें से अधिकतर लोग दूसरों से अपनी तुलना कर करके दुखी रहते हैं. तुलना करना ही इंसान के जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी है.

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दूसरों से ना करें तुलना दूसरों से ना करें तुलना

प्रज्ञा बाजपेयी

  • नई दिल्ली,
  • 04 अप्रैल 2018,
  • अपडेटेड 9:03 AM IST

हर इंसान के अंदर कुछ कमजोरियां और कुछ अच्छाइयां होती हैं. लेकिन इंसानी फितरत है कि वह हमेशा खुद को कम करके आंकता है और जो उसके पास है उससे कभी संतुष्ट नहीं रहता है. हममें से अधिकतर लोग दूसरों से अपनी तुलना कर करके दुखी रहते हैं. तुलना करना ही इंसान के जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी है. अधिकतर दुखों की जड़ भी हमारी तुलना करने की आदत ही है. आइए एक कहानी से समझिए तुलना करने की भयंकर बीमारी कैसे हर किसी को दुखी किए हुए है...

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एक कौआ था. वह बहुत खुश रहता था और अपनी जिंदगी से पूरी तरह संतुष्ट था. एक दिन उसने एक हंस देखा. वह सोचने लगा: यह कितना सफेद और सुंदर है और मैं कितना बदसूरत हूं! यह हंस पक्का दुनिया में सबसे खुशहाल पक्षी होगा. उसने यह बात हंस से कही.

हंस बोला: मुझे भी लगता था कि मैं सबसे खुशहाल पक्षी हूं. फिर मुझे तोता दिखा, जो दो रंग का होता है और बेहद सुंदर लगता है. मुझे लगता है कि वह सबसे खुश होगा. कौवा तोता के पास पहुंचा. कौवे ने तोते से कहा: तुम इतने सुंदर हो. तुम तो बहुत खुश होगे.

तोता ने कहा- नहीं यार, मोर को देखो, वह कितना कलरफुल और सुंदर है!  कौआ एक ज़ू में पहुंचा. उसने देखा कि बहुत-सारे लोग मोर के पिंजड़े को घेरे खड़े हैं. जब लोग चले गए तो कौवा मोर के पास पहुंचा और बोला, तुम इतने सुंदर हो. रोजाना सैकड़ों लोग तुम्हें देखने आते हैं, लेकिन मुझे तो देखते ही भगाने लगते हैं. मुझे लगता है कि तुम सबसे खुशहाल पक्षी हो. मोर बोला: मुझे भी लगता था कि मैं दुनिया का सबसे सुंदर और खुशहाल पक्षी हूं. लेकिन मेरी सुंदरता की वजह से मुझे ज़ू में बंद कर दिया गया. मैंने पाया है कि कौआ ही ऐसा पक्षी है, जो ज़ू में नहीं है. ऐसे में पिछले कुछ दिनों से मैं सोच रहा हूं कि काश! मैं कौआ होता तो आजाद होकर कहीं भी जा पाता.

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सच है, जो भगवान से हमें जो मिला है, अक्सर हम उसका मूल्य नहीं समझते और दूसरों से तुलना कर परेशान होते रहते हैं. यही सारे दुखों की जड़ है.

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