Holi 2026: प्रह्लाद ही नहीं, श्रीकृष्ण से जुड़ी ये कथा भी बताती है रंगों के त्योहार का रहस्य, जानें

Holi 2026: जल्द ही होली का त्योहार आने वाला है. इस पर्व से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं जिसमें से एक कहानी पूतना राक्षसी से संबंधित है. तो आइए पढ़ते हैं होली से जुड़ी ये खास कथा.

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कैसे शुरू हुई होली खेलने की परंपरा? (Photo: ITG) कैसे शुरू हुई होली खेलने की परंपरा? (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 26 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:34 PM IST

Holi 2026: रंगों का त्योहार होली आने वाला है और हर कोई इसे लेकर काफी उत्साहित भी रहता है. इस दिन घरों में तरह-तरह के पकवान तैयार किए जाते हैं. होली सिर्फ रंग खेलने का त्योहार नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी कई पौराणिक कथाएं भी हैं, जिन्हें बड़े-बुजुर्ग बच्चों को अक्सर सुनाते हैं. आमतौर पर हम होली पर प्रह्लाद और हिरण्यकश्यपु की कथा सुनते हैं, लेकिन इसके अलावा भी कई रोचक कहानियां हैं, जिनका संबंध होली से माना जाता है. उन्हीं में से एक कथा कंस, पूतना और श्रीकृष्ण से संबंधित है, जो आपने नहीं सुनी होगी. 

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पूतना राक्षसी के वध की कथा

होली की एक कथा भगवान श्रीकृष्ण और पूतना से भी जुड़ी है. प्राचीन समय में कंस नाम का एक अत्याचारी राजा था, जो अपनी प्रजा पर बहुत अत्याचार करता था. हालांकि, वह अपनी बहन देवकी से बहुत प्रेम करता था. जब देवकी की शादी वासुदेव से हुई तो उसी दौरान एक आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान कंस का वध करेगी. यह सुनकर कंस डर गया और उसने देवकी-वासुदेव को कोठरी में कैद कर दिया. इतना ही नहीं, उसने उनकी एक-एक करके सभी संतानों का वध भी किया था. 

जब आठवीं संतान के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तो भगवान की कृपा से वासुदेव उन्हें गोकुल पहुंचाने में सफल रहे. जैसे ही कंस को इस बात का पता चला, उसने पूतना नाम की राक्षसी को भेजा, जिसे रूप बदलने की शक्ति प्राप्त थी. पूतना ने कई नवजात शिशुओं को मारा था और अंत में वह श्रीकृष्ण तक भी पहुंच गई. वह सुंदर स्त्री का रूप धारण कर नंद बाबा के घर आई और श्रीकृष्ण को विष मिला दूध पिलाने की कोशिश की. लेकिन बालगोपाल कृष्ण ने ही उसका वध कर दिया. 

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इसी घटना के बाद श्रीकृष्ण का रंग गहरा नीला बताया जाता है. कहा जाता है कि अपने रंग को लेकर श्रीकृष्ण चिंतित हुए थे कि क्या राधा उन्हें स्वीकार करेंगी. तब माता यशोदा ने उन्हें समझाया कि वे राधा को भी उसी रंग में रंग दें. इसके बाद श्रीकृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ रंग खेला और यहीं से रंगों वाली होली की परंपरा शुरू हुई मानी जाती है. यही कारण है कि फाल्गुन पूर्णिमा के दिन होली का पर्व बड़े उत्साह और प्रेम के साथ मनाया जाता है.

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