Apsara Rambha Katha: पौराणिक कथाओं में अप्सराओं को स्वर्ग लोक की बेहद सुंदर, कला में निपुण और दिव्य स्त्रियां बताया गया है. देवराज इंद्र के दरबार में हजारों अप्सराएं थीं, लेकिन उनमें कृतस्थली, पुंजिकस्थला, मेनका, रम्भा, प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, वर्चा, उर्वशी, पूर्वचित्ति और तिलोत्तमा खास और प्रमुख मानी जाती थीं. इन्हीं में से एक थीं रंभा, जिन्हें सबसे प्रमुख अप्सरा माना जाता था.
कौन थी रंभा?
रंभा अपनी खूबसूरती और आकर्षण के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थीं. कहा जाता है कि उनका नाम सुनते ही लोग मोहित हो जाते थे. एक मान्यता के अनुसार, उनका जन्म समुद्र मंथन से हुआ था, इसलिए उन्हें लक्ष्मी स्वरूप भी कहा जाता है. वहीं, कुछ कथाओं में उनके माता-पिता कश्यप ऋषि और प्रधा बताए गए हैं. रामायण से जुड़ी एक कथा में रंभा का जिक्र नलकुबेर की पत्नी के रूप में मिलता है. इसी दौरान रावण ने उनके साथ गलत व्यवहार करने की कोशिश की थी, जिसके बाद रंभा ने उसे श्राप दे दिया था.
जब शिला बन गईं थी रंभा
एक अन्य कथा के अनुसार, जब ऋषि विश्वामित्र कठोर तपस्या कर रहे थे, तब इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए रंभा को भेजा था. लेकिन ऋषि ने यह चाल समझ ली और क्रोधित होकर रंभा को हजार साल तक पत्थर बने रहने का श्राप दे दिया था. बाद में अलग-अलग कथाओं में बताया गया है कि किसी ऋषि के प्रयास से रंभा इस श्राप से मुक्त हुई थीं.
अप्सरा रंभा के नाम पर रखा जाता है व्रत
रंबा के नाम पर एक खास व्रत भी रखा जाता है, जिसे रंभा तीज कहा जाता है. यह ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है. इस दिन महिलाएं सुख-समृद्धि और अच्छे जीवनसाथी की कामना के लिए व्रत रखती हैं और पूजा करती हैं. कुल मिलाकर, रंभा को सौंदर्य, आकर्षण और कला की प्रतीक माना जाता है. उनकी कथा हमें यह भी सिखाती है कि कभी-कभी बिना गलती के भी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन धैर्य और समय के साथ हर मुश्किल का हल निकल आता है.
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