श्रीगणेश ने गजानन रूप आदिश्वर महादेव की कृपा से पाया है. भाद्रपद शुक्ल षष्ठी पर गणपति के इसी रूप की पूजा किया जाना समस्त दोषों का हरण करने वाला है. इसी स्वरूप में ब्रह्मा ने उन्हें गणाध्यक्ष पुकारा. वे गणेश कहलाए. श्रीगणेश का यह मंगलकारी रूप ही त्रिलोक में मान पाया.
माता पार्वती ने लंबोदर को सुरक्षा का जिम्मा सौंपा और स्वयं स्नान को चलीं गईं. मां की आज्ञा पाकर बाल गणेश पूरे मनोयोग से भवन की सुरक्षा में जुट गए. इसी समय शिवजी का घर आना हुआ. गणेश ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया. शिव ने उन्हें समझाया. मनाया. मगर वे नहीं मानें. इससे पिता-पुत्र में विवाद बढ़ने लगा और भीषण युद्ध छिड़ गया.
लंबोदर की असीम शक्तियां शिव को अधीर करने लगीं. उनके सभी गण बालगणेश से परास्त हो गए. क्रोध में भोलेनाथ ने उन पर त्रिशूल का भीषण प्रहार किया. इससे लंबोदर का मस्तिष्क से अलग हो गया. गणेश की करुण पुकार जब माता ने सुनीं तो वे शीघ्र बाहर आईं. यहां उन्होंने शिव के समक्ष बेटे को निर्जीव पाया और तुरंत समझ गईं कि क्या हुआ होगा. इससे वे दुःख से भर गईं.
पार्वती की आंखों में अश्रु देख शिव को अपनी भूल का अहसास हुआ. उन्होंने नंदीश्वर को ऐसे बालक सिर लाने को कहा जो जिसकी माता उससे विपरीत दिशा में सिर करे हो. शिवाज्ञा पा नंदी नन्हें गज का सिर ले आए. इसे शिव ने गणेश के धड़ से जोड़ उन्हें पुनर्जीवित किया.
शिवजी ने गजानन गणेश को आशीष दिया कि उनकी कीर्ति समस्त लोकों में फैलेगी. ब्रह्मा ने बालगणेश के पराक्रम से प्रभावित हो उन्हें समस्त गणों का गणाध्यक्ष पुकारा. वे गणपति कहलाए. गणपति त्रिलोक में अग्रपूज्य हैं. इनके आवाहन के बिना कोई पूजा विधिवत नहीं मानी जाती.
शिवजी ने गजानन गणेश को आशीष दिया कि उनकी कीर्ति समस्त लोकों में फैलेगी. ब्रह्मा ने बालगणेश के पराक्रम से प्रभावित हो उन्हें समस्त गणों का गणाध्यक्ष पुकारा. वे गणपति कहलाए. गणपति त्रिलोक में अग्रपूज्य हैं. इनके आवाहन के बिना कोई पूजा विधिवत नहीं मानी जाती.